एक निश्चित आय के बाद हर कमाऊ व्यक्ति को टैक्स भरना होता है. सरकार तक पहुंचे ये पैसे तरक्की में लगाए जाते हैं. दुनिया के लगभग सभी देशों में यही नियम है. हालांकि कुछ देश ऐसे भी हैं, जो धार्मिक टैक्स भी लेते हैं, जैसे जर्मनी. यहां क्रिश्चियन और यहूदियों के हर महीने के वेतन में टैक्स का एक बड़ा हिस्सा चर्च और सिनेगॉग को चला जाता है.
हर महीने सीधे सैलरी से कटते हैं पैसे
जर्मनी में इसे चर्च टैक्स या वर्शिप टैक्स कहते हैं. इसमें सरकार से मान्यता प्राप्ता धार्मिक संस्था ये तय करती है कि जिस भी चर्च या सिनेगॉग में आप सदस्य बने हों, उसकी देखभाल के लिए आप वेतन का कुछ हिस्सा दें. इन्हीं पैसों से धार्मिक संस्थान के स्टाफ को भी तनख्वाह मिलती है. ये एक अच्छी-खासी रकम होती है, जो महीने के आखिर में कट जाती है.
जर्मनी में काम करते विदेशियों के लिए भी यही नियम
ये नियम सिर्फ स्थानीय जर्मन्स के लिए नहीं, बल्कि बाहर से आकर काम करने वालों पर भी लागू होता है. असल में एड्रेस का फॉर्म भरने के दौरान जैसे ही कोई यहूदी या ईसाई अपनी धार्मिक पहचान जाहिर करता है, उस पर चर्च टैक्स लागू हो जाता है. ये सीधे महीने के आखिर में डिडक्ट होता है. इसके बाद एम्प्लॉयर इस रकम को लोकल टैक्स ऑफिस में देता है.
छोड़ रहे चर्च की सदस्यता
साल 2020 में अकेले कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्चों को करीब 12 बिलियन पाउंड मिले. ये बहुत बड़ी रकम है लेकिन उससे पहले साल ये अमाउंट और भी ज्यादा था. तो क्या वजह है कि लोगों की तनख्वाह बढ़ रही है, लेकिन चर्च टैक्स की राशि कम हो रही है? इसका सीधा कारण ये है कि लोग अब उस सर्विस के लिए पैसे नहीं देना चाहते, जिसपर उन्हें खास भरोसा नहीं. ज्यादातर लोग चर्च या सिनेगॉग साल में एकाध बार जाते हैं. इसके लिए वे इतने पैसे डोनेट नहीं करना चाहते. यही वजह है कि जर्मनी में एकाएक धर्म छोड़कर खुद को नास्तिक बताने वालों की बाढ़ आ गई.
साल 2019 में वहां आधा मिलियन से ज्यादा लोगों ने चर्च की सदस्यता छोड़ दी. जर्मन रिसर्च संस्थान वेलट्नशाविंग के मुताबिक, कोरोना के समय में खराब हालत को देखते हुए बहुत से लोगों ने तय किया कि वे भी जल्द से जल्द धर्म छोड़ देंगे ताकि टैक्स देने की बजाए बचत कर सकें.
कैसे छोड़ सकते हैं सदस्यता?
लगभग कुछ नहीं. अगर कोई जर्मन, जो चर्च या सिनेगॉग का सदस्य बन चुका है, वो इसे छोड़ना चाहे तो एक निश्चित अमाउंट उस धार्मिक संस्थान को देना होता है, साथ ही एक फॉर्म भरा जाता है. इसके बाद एक एग्जिट सर्टिफिकेट आता है, और टैक्स कटना बंद हो जाता है.
चर्च या सिनेगॉग छोड़ने से क्या फर्क पड़ता है?
अगर कोई धार्मिक टैक्स देना बंद कर दे तो भी उसकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता. बस, इतना ही होता है कि अगर वे अपनी शादी या बच्चे के जन्म के बाद की रस्में चर्च में करना चाहें तो इसकी इजाजत नहीं मिलेगी. धार्मिक रस्में करने के लिए उन जगहों का सदस्य होना जरूरी है.
यौन शोषण के आरोप भी बने दूरी की वजह
टैक्स ही नहीं, एक और कारण है, जिसने जर्मन्स का चर्च पर से भरोसा कम कर दिया. चर्च के पादरी और बाकी स्टाफ पर बच्चों के यौन शोषण का आरोप लगा. साल 2018 में एक रिपोर्ट छपी, जिसमें दावा किया गया कि 1946 से लेकर 2014 तक हजारों पादरियों ने लगभग 4 हजार बच्चों का यौन शोषण किया. रिपोर्ट में ये भी माना गया कि ज्यादातर केस पुराने हैं, और लोग धार्मिक गुरुओं के खिलाफ कुछ कह नहीं पाते, इसलिए असल संख्या दब गई होगी.
बात काफी बढ़ी. यहां तक कि जर्मनी में पादरियों में कुछ सबसे सीनियर लोगों ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा तक दे दिया. हालांकि इस घटना ने जर्मन्स में धर्म के लिए यकीन कम कर दिया. लोगों को लगने लगा कि उनकी मेहनत की कमाई करप्ट लोग अपने ऐशोआराम पर खर्च कर रहे हैं.
लोग भ्रष्ट गुरुओं के हाथ में पैसे देने से कतराने लगे
एक गैर-सरकारी संस्था यूगव ने 2 हजार से कुछ ज्यादा वयस्कों से बातचीत करके ये जानना चाहा कि वे चर्च क्यों छोड़ चुके हैं. इसमें सबसे ज्यादा, कुल 49 फीसदी लोगों ने माना कि चर्च छोड़ने का कारण यौन उत्पीड़न के मामलों की चर्चा रही. वे परेशान थे कि जिन धार्मिक गुरुओं पर वे आंखें बंद करके भरोसा करते रहे, वही छोटे बच्चों का शोषण करते रहे. इसके बाद से ही खुद को नास्तिक घोषित करने वाले बढ़े. लेकिन रिसर्च में यहूदियों के बारे में ज्यादा डिटेल नहीं मिलती कि इस धर्म से कितने लोग छिटक रहे हैं.
इन देशों में भी चर्च टैक्स
यूरोप के कई और देश भी हैं, जहां धार्मिक टैक्स देना होता है, लेकिन ये अलग तरह से काम करता है. जैसे ऑस्ट्रिया, स्विटजरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क में चर्च टैक्स लेने से पहले बाकायदा लोगों की अनुमति ली जाती है. साथ ये टैक्सपेयर ये भी चुन सकता है कि वो अपने पैसे धार्मिक संस्थान को देगा, या फिर उससे जुड़े किसी रिसर्च में लगाएगा.