यूके में बीते कुछ सालों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी. इसमें सिर्फ इमिग्रेंट्स ही नहीं, बल्कि वे लोग भी शामिल हैं जो इस्लाम अपना रहे हैं. इस्लामिक आबादी बढ़ने के साथ ही साथ यहां शरिया अदालतों की संख्या भी बढ़ी. इन दिनों पूरे ब्रिटेन में 85 अदालतें हैं जो मुस्लिमों से जुड़े फैसले लेती हैं. ये कोर्ट कई विवादित कस्टम्स चला रही हैं, जैसे तीन तलाक और पुरुषों के लिए बहुविवाह. दूरदराज से भी मुस्लिम इन अदालतों में आ रहे हैं. यहां तक कि ब्रिटेन को पश्चिम में शरिया अदालतों की राजधानी तक कहा जा रहा है.
कैसी है यूके की अपनी कानूनी व्यवस्था
फिलहाल यहां का लीगल सिस्टम तीन खांचों में बंटा हुआ है, जो भौगोलिक आधार पर है
- इंग्लैंड और वेल्स का कानूनी ढांचा कॉमन लॉ पर आधारित है, यानी यहां जजों के फैसले अहम होते हैं. साथ ही एक-से मामलों के निर्णय एक होते हैं.
- स्कॉटलैंड का कानूनी ढांचा सिविल और कॉमन लॉ का मिलाजुला रूप है. इसमें कानून पहले से ही लिखित रूप में होता है और जज को सिर्फ उसका पालन करना होता है.
- नॉर्दर्न आयरलैंड में लॉ काफी हद तक इंग्लैंड और वेल्स से मिलता-जुलता है.
क्या है शरिया
शरिया का यहां की अदालतों या कानूनी प्रोसेस से कोई वास्ता नहीं. ये एक तरह की समानांतर व्यवस्था है, जो इस्लामिक कानून मानने वालों के लिए चल रही है. शरिया कानून को आसान भाषा से इस्लाम से प्रेरित बंदोबस्त कह सकते हैं. एक सच्चे मुस्लिम को अपना जीवन कैसे चलाना चाहिए, या फैसले कैसे लेने चाहिए, शरिया में यही बताया जाता है. वैसे यह एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब है- सही रास्ता. ज्यादातर मुस्लिम-बहुल देशों में कानून इसी पर आधारित हैं.
ब्रिटेन में कब आई शरिया अदालत
यूके में हाउस ऑफ कॉमन्स की वेबसाइट के मुताबिक, इसकी शुरुआत अस्सी के दशक से हो चुकी थी. साल 1982 में ईस्ट लंदन में पहली शरिया कोर्ट बनी. इसका कहना था कि कोर्ट यूके में रहते मुस्लिमों की मैट्रिमोनियल समस्याओं को इस्लाम के अनुसार सुलझाएगी. इसे इस्लामिक शरिया काउंसिल भी कहा जाता है. इसके बाद से अब तक लगभग 85 ऐसी अदालतें तैयार हो चुकीं. यह वैसे अनौपचारिक बॉडी है जो चैरिटी के तौर पर रजिस्टर्ड है, लेकिन ब्रिटेन की कोर्ट के समानांतर ही काम करने लगी है. इन अदालतों में अब भी तीन तलाक को मंजूरी है. साथ ही पुरुष एक समय पर एक से ज्यादा शादियां कर सकते हैं.
पारिवारिक मामलों के लिए एप भी आ चुका
इस्लामिक अदालतों के तौर-तरीकों को ऑनलाइन भी समझा जा सके, इसके लिए वहां मुज नाम से एक एप भी है. शरिया कोर्ट्स से जुड़ा ये एप मुस्लिमों के लिए डिजाइन किया गया है जो मुख्य तौर पर उन्हें इस्लामिक वसीयत बनाने में मदद करता है. साथ ही पॉलीगेमी पर दस्तावेज भी इसकी मदद से तैयार किए जा रहे हैं.
ब्रिटेन में बहुविवाह अवैध है जिसपर सजा भी है, वहीं इस्लामिक मुज एप में एक ऑप्शन है, जिसमें पुरुष पॉलीगेमी प्लान भी बना सकते हैं. वसीयत की बात करें तो इसमें भी फर्क है, जिसके तहत बेटियों को बेटों की आधी जायदाद मिलती है. फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामिक काउंसिल हर साल लगभग नौ सौ मामलों की सुनवाई कर रही है.
कट्टर फैसले लेती रही
अब ब्रिटेन के मानवाधिकार कार्यकर्ता इस काउंसिल के तौर-तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं कि इसकी वजह से ब्रिटेन में रहती महिलाएं पीछे जा रही हैं. बता दें कि इस्लामिक काउंसिल की शुरुआत करने वाले हैथम अल-हद्दाद अपनी बेहद कट्टर सोच के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने ये बयान तक दे दिया था कि पति अपनी पत्नी की पीटे तो इसपर किसी को सवाल करने की जरूरत नहीं. ये उनका आपसी मामला है, वे खुद सुलझा लेंगे.
चिंता की बात ये है कि यूके स्थित शरिया कोर्ट्स की पैठ अब जर्मनी और अमेरिका तक हो चुकी है. वहां से भी मामले यहां की काउंसिल में आ रहे हैं, और सुनवाई भी हो रही है. डर है कि इससे शरिया अदालतों का असर और बढ़ेगा, जिससे सीधे तौर पर मानवाधिकार को नुकसान होगा.
क्या पश्चिमी देशों में और कहीं भी यह बंदोबस्त
वेस्ट में ब्रिटेन अकेला देश हैं, जहां शरिया काउंसिल चल रही है. मुस्लिम आबादी के बीच कई और पश्चिमी देशों में इसकी कोशिश हुई लेकिन विवाद के बाद मामला बंद हो गया. मसलन, कनाडा के ऑन्टारियो में शरिया कोर्ट की बात हुई थी, शुरुआत भी हुई लेकिन भारी विवाद के बीच साल 2005 में इसे बंद करना पड़ा. अब इनपर कानूनी रूप से प्रतिबंध है. फ्रांस और जर्मनी में भी इसका आधिकारिक अस्तित्व तो नहीं, लेकिन पारिवारिक मामले सुलझाने के लिए मुस्लिम समुदाय धार्मिक बॉडीज का सहारा लेता है. दूसरी तरफ यूके में 85 कोर्ट्स चल रही हैं. यही वजह है कि विवाद बढ़ रहा है.