एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप भारत को अपना मित्र बता रहे हैं, दूसरी तरफ वहीं के थिंक टैंक यहां धार्मिक आजादी पर सवाल उठा रहे हैं. बात यहीं तक सीमित नहीं. अमेरिकी कमीशन ने देश की इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ तक को निशाने पर लेते हुए उसपर बैन लगाने की मांग कर डाली. बकौल कमीशन, रॉ की वजह से भी आजादी खतरे में आई. यहां तक कि देश को 'कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न' की लिस्ट में डाल दिया गया, मतलब वे मुल्क जहां मजहबी आजादी बहुत कम हो.
यहां कई सवाल आते हैं.
- अमेरिकी कमीशन क्या है और क्यों बाकी देशों की धार्मिक स्थिति पर काम कर रही है.
- यह संस्था कितनी निष्पक्ष है और कब-कब उसकी रिपोर्ट पर विवाद हुए.
- कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न की सूची में आने से भारत पर क्या असर हो सकता है.
- अमेरिकी कमीशन को भारत की खुफिया एजेंसी से क्या समस्या है?
क्या है ये आयोग और क्यों एक्टिव
यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) स्वतंत्र अमेरिकी एजेंसी है, जो नब्बे के दशक के आखिर से एक्टिव है. इसका काम दुनियाभर के देशों में धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखना है. इस आधार पर वो अमेरिकी सरकार को सुझाव देता है कि किस देश पर कड़ाई की जाए ताकि वो धार्मिक नाइंसाफी न करे. यह तो हुई ऊपर बात तो दिखाई देती है लेकिन क्या यह संस्था वाकई निष्पक्ष है या वाइट हाउस के लिए कूटनीतिक हथियार बन चुकी?
दरअसल कमीशन वैसे तो स्वतंत्र संस्था है लेकिन इसकी नींव सरकार ने ही रखी थी. साल 1998 में वहां एक कानून पास हुआ- इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट. इसी के तहत अमेरिकी कमीशन बना. इसका काम वैश्विक धार्मिक स्वतंत्रता पर रिसर्च कर सरकार को पॉलिसी लेवल के सलाह देना था. इस रिपोर्ट के आधार पर वाइट हाउस तय करता है कि उसे किन देशों पर दबाव बनाना है, और कहां उदार हो सकता है. आयोग खुद किसी देश के खिलाफ सीधी कार्रवाई नहीं कर सकता, लेकिन इसकी रिपोर्ट का अमेरिकी विदेश मंत्रालय पर असर जरूर पड़ता है.
किस आधार पर बनती है रिपोर्ट
अलग-अलग सोर्सेस, जैसे मीडिया हाउस, ह्यूमन राइट्स पर काम करने वाली संस्थाएं और अल्पसंख्यकों से बातचीत करके रिपोर्ट बनती है. जिन देशों में कथित तौर पर धार्मिक आजादी पर तलवार लटक रही हो, कमीशन ऐसे देशों को कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न की लिस्ट में डाल देती है. एक श्रेणी स्पेशल वॉच लिस्ट की है, जिसमें वो देश हैं, जहां आजादी पर खतरा तो है लेकिन कुछ कम.
इस बार 16 मुल्क इस सूची में हैं, जिसमें नॉर्थ कोरिया और पाकिस्तान के साथ, चीन, रूस और ईरान जैसे देशों को भी शामिल किया गया है. इसी लिस्ट में भारत भी है. साथ ही आयोग ने खुफिया एजेंसी रॉ पर विदेशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप लगा दिया.
रॉ पर क्यों साधा निशाना
धार्मिक स्वतंत्रता की कथित गिरती स्थिति का हवाला देते हुए आयोग ने कह दिया कि खुफिया एजेंसी रॉ की वजह से भी अल्पसंख्यकों पर हमले और भेदभाव बढ़े. बता दें कि रॉ देश की सबसे गोपनीय और प्रभावशाली खुफिया एजेंसी है जो विदेश में देश के सुरक्षा हितों पर काम करती रही.
रिपोर्ट में इसे निशाना बनाने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे, हाल के महीनों में खालिस्तानी अलगाववादियों पर सख्ती बढ़ी. कई देशों में चरमपंथी नेता या गैंगस्टर मारे गए. अमेरिका इस भारत की साजिश मानते हुए धार्मिक आजादी से जोड़ रहा है. ये भी हो सकता है कि रॉ पर सवाल उठाकर अमेरिका भारत पर दबाव बनाए और कुछ व्यापारिक या रणनीतिक रियायतें चाहें.
रिपोर्ट पर भारत ने नाराजगी जताते हुए उसे पक्षपातपूर्ण और एजेंडे पर काम करने वाला बताया. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उल्टा अमेरिकी कमीशन को एंटिटी ऑफ कंसर्न घोषित करने की मांग कर दी क्योंकि ये जानबूझकर ऐसी रिपोर्ट देता है.
घिरने पर भारत का रिएक्शन समझ में आता है लेकिन अमेरिकी आयोग पर अक्सर ही सवाल उठते रहे. यह बात सबसे ज्यादा होती है कि क्या यह कमीशन सच में निष्पक्ष है?
किन मसलों पर विवादित
- अमेरिका कथित तौर पर अपने करीबी सहयोगियों को बख्शता रहा. सऊदी अरब जैसे देशों में धार्मिक आजादी के गंभीर उल्लंघन होते रहे, लेकिन उन पर ज्यादा दबाव नहीं डाला जाता.
- आरोप है कि अक्सर कुछ खास देशों को निशाना बनाया जाता है, जैसे चीन, ईरान, भारत और रूस.
- कई बार आयोग की रिपोर्ट अमेरिकी सरकार की कूटनीतिक जरूरतों से मेल खाती है. अगर यूएस को लगे कि कुछ देश उसके आड़े आ रहे हैं, या उसके दबाव में नहीं रहते तब भी वो ऐसी रिपोर्ट देता है.
क्या कमीशन की रिपोर्ट से कोई असर पड़ता है
अगर कोई देश USCIRF की रिपोर्ट में कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न की लिस्ट में डाल दिया जाए तो इसका मतलब है कि अमेरिका उसे धार्मिक स्वतंत्रता तोड़ने वाले के तौर पर देखता है. इससे यूएस की विदेश नीति से लेकर आर्थिक रिश्तों पर भी असर हो सकता है. मसलन, चीन कई वर्षों से लिस्ट में है क्योंकि वहां उइगर मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा की खबरें आती रहती हैं, साथ ही वहां ईसाइयों की धार्मिक आजादी भी सीमित है.
इसके बाद अमेरिका ने चीन के खिलाफ मानवाधिकार प्रतिबंध लगाए, कई चीनी कंपनियों और अधिकारियों पर वित्तीय पाबंदियां लगाईं और डिप्लोमैटिक दबाव बढ़ा दिया. रही भारत की बात तो अमेरिकी कमीशन कई सालों से भारत को भी सीपीसी में डालने की बात करता रहा लेकिन वाइट हाउस इसे नजरअंदाज करता रहा क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते ठीकठाक रहे.