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क्या राजनैतिक दलों पर भी लागू हो सकता है POSH एक्ट, यौन उत्पीड़न पर सुनवाई के लिए फिलहाल क्या इंतजाम?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की, जिसमें मांग है कि कामकाज की जगह पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़ा पॉश (POSH) एक्ट राजनैतिक पार्टियों पर भी लागू होना चाहिए. लेकिन राजनैैतिक दल कोई संस्था नहीं, ऐसे में इसमें पॉश लाया जाए तो क्या-क्या चीजें बदलनी होंगी?

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सुप्रीम कोर्ट में राजनैतिक दलों को लेकर एक याचिका आई. (Photo- India Today)
सुप्रीम कोर्ट में राजनैतिक दलों को लेकर एक याचिका आई. (Photo- India Today)

महिलाओं पर हिंसा की खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई की, जिसके तहत पॉश (POSH) एक्ट को राजनैतिक पार्टियों पर भी लागू करने की बात है. दफ्तरों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर लगाम कसने में यह एक्ट काफी असरदार माना जाता रहा. राजनीति में काम करने वाली महिलाओं पर ये एक्ट लागू नहीं होता, बल्कि जांच के लिए अलग कमेटी होती है. 

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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे पहले इलेक्शन कमीशन से कॉन्टैक्ट करें क्योंकि वही ऐसी बॉडी है, जो पार्टियों पर दबाव बना सकती है कि वे यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने के लिए एक मजबूत सिस्टम बनाएं. 

POSH एक्ट क्या है, कहां लागू होता है

देश में वर्कप्लेस पर महिलाओं का यौन उत्‍पीड़न रोकने के लिए साल 2013 में कानून बनाया गया था. इसे पॉश एक्ट यानी प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट कहा जाता है. इसकी धारा 3(1) में कहा गया है कि कोई भी महिला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार न हो. यानी ये एक्ट सिर्फ वर्कप्लेस पर लागू होता है, वो भी जब पीड़ित पक्ष महिला हो. वैसे वर्कप्लेस में लंबा-चौड़ा दायरा लिया हुआ है. इसमें पब्लिक प्लेस में काम करने वाली संस्थाएं, कंपनियां तो हैं ही, साथ ही प्राइवेट सेक्टर में संगठन, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम, खेलों के संगठन और ऐसी सारी जगहें शामिल हैं, जिनसे एक कर्मचारी का काम के दौरान वास्ता पड़ता रहता है. 

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posh act to hear sexual harassment case at workplace is it applied to political parties photo Getty Images

लेकिन जब बात राजनैतिक दलों की हो रही हो तो इस एक्ट को लागू करने की संभावना बहुत हल्की है. सुप्रीम कोर्ट में याचिका की सुनवाई से पहले केवल एक ही बार कोर्ट ने इसपर बात की थी. केरल हाई कोर्ट ने टीवी, फिल्म, मीडिया और राजनीतिक संगठनों में इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी बनाने की मांग वाली कई याचिकाओं पर चर्चा की थी. 

राजनीतिक दलों के मामले में, अदालत ने माना कि यहां पर एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई का रिश्ता नहीं होता है, और न ही राजनैतिक पार्टियां किसी संस्थान या कंपनी का हिस्सा होती हैं, जो पॉश अधिनियम के तहत आ सकें. इस तरह से मान लिया गया कि पार्टियां इससे बाहर रह सकती हैं. 

पॉश के तहत क्या है यौन उत्पीड़न

साल 2013 के कानून के तहत उत्पीड़न में कोई एक या एक से ज्यादा गलत व्यवहार शामिल हैं, जो सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से किया जाए. मसलन, शारीरिक निकटता या इसकी कोशिश, सेक्सुअल फेवर की मांग, गलत टिप्पणियां, पोर्नोग्राफी दिखाना या दिखाने की कोशिश, किसी भी तरह की फिजिकल, वर्बल या नॉन-वर्बल बातचीत या काम करना, जो दूसरे पक्ष को असहज करे. 

posh act to hear sexual harassment case at workplace is it applied to political parties photo India Today

अभी क्या कर रहे हैं दल

फिलहाल राजनैतिक पार्टियां आंतरिक मसलों के लिए अपनी कमेटी बनाती हैं. जैसे कांग्रेस की बात लें तो उसके पास कंस्टीट्यूशन एंड रूल्स है, जिसमें कमेटी के पदाधिकारी, सबऑर्डिनेट्स ये सब शामिल हैं. हायर लेवल के पास ये अधिकार है कि वो कमेटी के बाकी सदस्यों के नैतिक आचरण पर नजर रख और जरूरत पड़ने पर एक्शन भी ले. इसी तरह से बीजेपी के पास डिसिप्लिनरी एक्शन कमेटी है जो नेशनल और स्टेट दोनों स्तर पर काम करती है.

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दोनों ही प्रमुख पार्टियों की नियमावली में अनुशासन तोड़ने पर तो बात है लेकिन यौन उत्पीड़न की अलग से श्रेणी नहीं. ये केवल कुछ ब्रॉड श्रेणियों में आ सकता है, जैसे ऐसा काम करना जिससे पार्टी की गरिमा को चोट पहुंचे. साथ ही इन कमेटीज में महिला सदस्यों या बाहरी लोगों को शामिल करना भी जरूरी नहीं, जो कि पॉश की अहम शर्त है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे. 

क्या पॉश एक्ट पार्टियों पर लागू हो सकता है

साल 1951 का जन प्रतिनिधित्व अधिनियम राजनीतिक पार्टियों के रजिस्ट्रेशन पर नजर रखता है. ये कहता है कि देश के नागरिकों का कोई भी संघ या समूह, जो खुद को राजनीतिक पार्टी कहता है, उसे चुनाव आयोग के साथ पंजीकरण के लिए आवेदन देना होगा. एप्लिकेशन में पार्टी का नाम, हेडक्वार्टर, पदाधिकारियों, कर्मचारियों सबका जिक्र हो. अगर अदालत या चुनाव आयोग राजनैतिक दलों पर पॉश एक्ट लागू करना चाहे तो उन्हें ये भी तय करना होगा कि इस केस में एम्प्लॉयर कौन है. वर्कप्लेस पर यौन उत्पीड़न के मामलों से निपटने के लिए इंटरनल कमेटी बनाने का जिम्मा उसी पर होता है. 

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