केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यूपीए सरकार के एक दशक के कामकाज को लेकर संसद में श्वेत पत्र जारी किया. इसमें कहा गया कि बीजेपी को विरासत में जो इकोनॉमी मिली, उसकी हालत काफी खराब थी. इसके बाद से हंगामा मचा हुआ है. भाजपा के जवाब में विपक्ष ने ब्लैक पेपर निकाल दिया, जो उल्टे सत्ता पर आरोप लगा रहा है. ये दोनों ही पेपर्स सरकारी दस्तावेज हैं, जो समय-समय पर या जरूरत के मुताबिक जारी होते आए हैं.
क्या है व्हाइट पेपर
ये सरकारी डॉक्युमेंट है, जो किसी खास मुद्दे पर जानकारी और फैक्ट्स देता है. इस पेपर का मकसद आगे चलकर पॉलिसी को आकार देना रहता है. सरकार जब भी श्वेत पत्र लाने का एलान करती, या लाती है तो साफ है कि वो किसी टॉपिक पर चर्चा या सुझाव लेना-देना चाहती है. ये पिछले सालों के खोया-पाया का हिसाब भी हो सकता है.
कब हुई शुरुआत
वैसे तो व्हाइट पेपर की शुरुआत को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि साल 1922 में सबसे पहले व्हाइट पेपर आया. तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने एक दंगे की सफाई देते हुए इसे जारी किया था. इसे तब चर्चिल व्हाइट पेपर भी कहा जाने लगा, जो कि बाद में व्हाइट पेपर ही रह गया.
सरकार के अलावा संस्थाएं भी श्वेत पत्र जारी कर सकती हैं. ये उन्हें आगे की रूपरेखा बनाने में मदद करता है. कॉर्पोरेट की दुनिया में भी व्हाइट पेपर की अहमियत है. इसके जरिए वे देखते हैं कि कोई प्रोडक्ट कैसा परफॉर्म कर रहा है, और उसमें क्या बदलाव लाना चाहिए. कई बार किसी विवाद की स्थिति में भी श्वेत पत्र जारी होता है, जैसे कोरोना के दौरान आरोप लगने पर चीन ने जारी किया था.
क्या खास होता है व्हाइट पेपर में
- इसमें किसी मुद्दे या पॉलिसी पर स्पेसिफिक बात रहती है
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- श्वेत पत्र में राय या पूर्वाग्रह नहीं होते, बल्कि फैक्ट्स पर बात होती है.
- कोई खास पॉलिसी लाने या उसमें बदलाव का इशारा रहता है.
- इसमें प्रपोजल और सिफारिश होती है कि क्या नया किया जाए.
- व्हाइट पेपर में एक्टपर्ट की राय भी होती है, जो डेटा पर आधारित हो.
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क्यों लाया गया व्हाइट पेपर
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण के दौरान ही इसपर बात की थी. उन्होंने कहा था कि जब मोदी सरकार को जिम्मेदारी मिली, देश में आर्थिक संकट था. इसके बाद के साल उससे उबरने में लगे. पेपर के जरिए ये बताया गया कि केंद्र ने कैसे उन परेशानियों को दूर करते हुए इकोनॉमी में मजबूती लाई. जल्द ही आम चुनाव आने वाला है इसलिए भी श्वेत पत्र लाने का ये समय चुना गया.
सेंटर के व्हाइट पेपर के खिलाफ विपक्ष ने ब्लैक पेपर निकाल दिया. इसमें मोदी सरकार पर आरोप हैं. यहां तक कि इन 10 सालों को अन्याय काल कहते हुए कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने किसानों की बदहाली, बेरोजगारी और सरकारी पदों में एससी, एसटी, ओबीसी पद खाली होने जैसे आरोप लगाए.
क्या है ये ब्लैक पेपर
श्वेत पत्र की तुलना में इसमें किसी मुद्दे या पॉलिसी पर राय ज्यादा दिखती है. ब्लैक पेपर में कोई विवादास्पद बात भी उठाई जा सकती है, साथ ही उसके प्रमाण भी होते हैं.
क्या खासियत है इसकी
- इसमें मुद्दे या नीति का विश्लेषण होता है, और राय दी जाती है.
- किसी चल रही पॉलिसी को लेकर सवाल उठाए जाते हैं.
- ब्लैक पेपर अक्सर चुनौती देने की भूमिका अदा करता है.
- इसमें वर्तमान नीतियों में चेंज की बात, और ऑप्शन सुझाए जाते हैं.
क्या और भी पेपर होते हैं
हां. कई और रंग के पेपर भी होते हैं. कलर के आधार पर तय होता है कि पत्र जारी करने का क्या मकसद हो सकता है.
ग्रीन पेपर में सरकारी काम का मसौदा होता है. ये काम का भरोसा नहीं, बल्कि रूपरेखा होती है कि इस तरह वो काम अंजाम तक पहुंचाया जाएगा.
ब्लू पेपर भी है, जो तकनीक पर फोकस करता है. इसके जरिए कोई सरकार या संस्था किसी खास तकनीकी पॉइंट पर बात करती है.
इसी तरह से पिंक पेपर भी है. इसमें पॉलिसी पर चर्चा होती है. लेकिन ये आम लोगों के लिए नहीं होता, बल्कि पॉलिसी बनाने वालों तक रहता है.
यलो पेपर भी है. ये वो दस्तावेज है जो फाइनल हो चुका, लेकिन जिसे प्रिंट किया जाना बाकी है. ये प्री-प्रिंट भी कहलाता है.