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PM मोदी के भाषण से फिर चर्चा में अर्बन नक्सल, क्या है इसका मतलब, क्यों माना जा रहा खतरनाक?

राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के दौरान 'अर्बन नक्सल' शब्द का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उनकी सोच अर्बन नक्सल वाली है. उनका घोषणा पत्र माओवाद को बढ़ावा देता है. इसके बाद से सत्ता और विपक्ष में घमासान जारी है. अर्बन नक्सल- ये टर्म पहले भी कई बार कहा-सुना जा चुका. खासकर सोशल मीडिया पर ये खूब ट्रेंड होता है.

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सोशल मीडिया से लेकर नेताओं के भाषणों में भी अर्बन नक्सल कहा जा रहा है.
सोशल मीडिया से लेकर नेताओं के भाषणों में भी अर्बन नक्सल कहा जा रहा है.

पीएम मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सीधे उसके घोषणपत्र को घेरे में ले लिया. उन्होंने वेल्थ रीडिस्ट्रीब्यूशन पर बात करते हुए कहा कि वे लोग सत्ता में आते ही मां-बहनों के मंगलसूत्र भी लेकर उन्हें दे देंगे, जिनके ज्यादा बच्चे हैं. पीएम ने साथ में जोड़ा कि कांग्रेस पर अर्बन नक्सल सोच का कब्जा हो चुका. जानिए, क्या है ये और शहरी लोगों से इसका क्या कनेक्शन है. 

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पहली बार कब हुई थी चर्चा

साल 2018 में पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव दंगों के मामले में देश के अलग-अलग हिस्सों से कई बुद्धिजीवियों को हिरासत में लिया. इनमें वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, स्टेन स्वामी, साई बाबा, वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण परेरा जैसे नाम शामिल थे. पुलिस के मुताबिक, इनके पास से एक पत्र बरामद हुआ, जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का जिक्र भी था. इन्हें अर्बन नक्सल कहा गया. हालांकि ये टर्म दंगों से एक साल पहले ही चर्चा में आ चुकी थी.

फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने मई 2017 में एक इंटरव्यू के दौरान ऐसे लोगों को अर्बन नक्सल कहा था, जो शहरों में रहते हुए सत्ता-विरोधी गतिविधियों को हवा देते हैं. ठीक तुरंत बाद उन्होंने एक किताब लॉन्च की, जिसका शीर्षक ही था- अर्बन नक्सल. 

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किताब का विमोचन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने किया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि एक रिसर्च में पाया गया है कि दुनिया में कम से कम 21 ऐसे संगठन हैं जो भारत में पेशेवरों और शिक्षाविदों की शक्ल में लोगों को भेजते हैं. ये लोग माओवाद का अध्ययन कर अपने देश लौट जाते हैं. वे माओवाद के समर्थन के साथ-साथ उनकी फंडिंग का भी ध्यान रखते हैं.

उन 21 संगठनों का नाम-पता कुछ नहीं बताया गया. लेकिन अर्बन नक्सल शब्द इसके बाद से जमकर इस्तेमाल होने लगा. यहां तक कि कोई शहरी इंटेलेक्चुअल अगर मौजूदा सत्ता के खिलाफ कोई हिंसक बात करे तो उसके आसपास के लोग भी उसे ऐसी उपाधि दे डालते हैं. 

what is urban naxal term in indian politics photo India Today
भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपियों को अनौपचाैरिक तौर पर अर्बल नक्सल कहा गया. सांकेतिक फोटो

ये टर्म एकदम हवा-हवाई भी नहीं

साल 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का एक दस्तावेज चर्चा में आया था. अर्बन पर्सपेक्टिव नाम से इस डॉक्युमेंट में एक खास रणनीति का जिक्र है. इसमें शहरी लीडरशिप में कोई मुहिम चलाई जाती है, जो सत्ता के विरोध में रहती है. ये पॉलिसी का विरोध भी हो सकता है, या किसी खास पार्टी या नेता का भी. इसके पीछे सोच ये है कि शहरी कनेक्शन होने की वजह से नेता काफी पढ़े-लिखे होंगे, और जरूरत पड़ने पर इंटरनेशनल स्तर पर जाकर भी अपने को सही साबित कर सकेंगे. 

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स्थानीय लोगों, स्टूडेंट्स से भी पक्का कनेक्शन

कथित अर्बन नक्सल एक और काम करते हैं. वे लोकल स्तर पर भी पैठ रखते हैं. जैसे यूनिवर्सिटी या एनजीओ तक. स्टूडेंट्स या स्थानीय लोगों पर उनका सीधा असर रहता है. ऐसे में वे जो कहेंगे, काफी लोग सपोर्ट में आ जाएंगे. कुल मिलाकर सरकार को गिराने या उससे अपनी बात मनवाने के लिए पक्की रणनीति बनाई जा सकती है, जिसमें लोकल और इंटरनेशनल दोनों स्तर पर सहयोग हो. 

भीमा कोरेगांव केस की ही बात करें तो इसमें जिनको पकड़ा गया, उनमें से लगभग सभी बुद्धिजीवी जमात से थे. इस वजह से इंटरनेशनल स्तर पर भी मुद्दा उछला था. नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी ने भी तब आरोपियों को अर्बन नक्सल बताया था. जिस तरह से जांच हुई, उसमें माना गया कि शहरों में रहते इंटेलेक्चुअल हिंसा की स्टोरी रचते हैं, जिसपर देशविरोधी ताकतें फंडिंग करती हैं. ये लोग कथित तौर पर एक खास मांग के साथ दंगा-फसाद भड़काते हैं. 

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किनपर लगता है अर्बन नक्सल होने का आरोप

पढ़े-लिखे पत्रकार, कवि, कलाकार, स्थानीय लीडर, मानवाधिकार कार्यकर्ता, प्रोफेसर या इसी श्रेणी के लोग जो अपने पेशे की आड़ में कथित तौर पर नक्सल गतिविधियों को प्रमोट कर रहे हों, इस श्रेणी में आते हैं. लेकिन इसमें भी एक ट्विस्ट है. ये समाज का ऐसा हिस्सा है जो खुद को हमेशा ही तटस्थ बताता है, साथ ही हिंसा से दूर रहने की बात करता है. 

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क्या है नक्सल आंदोलन

साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के एक गांव नक्सलबाड़ी में जमींदारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन हुआ था. आंदोलनकारी लोग वो थे, जो चीन के क्रांतिकारी नेता माओ की आइडियोलॉजी को मानते. यानी हिंसा करके सत्ता को अपनी बात मानने पर मजबूर करना. इसमें राजनीति से जुड़े कुछ बड़े नाम भी शामिल थे. सबका इरादा एक था- जमींदारों से जमीन लेकर भूमिहीनों में बांट देना. कुछ ही समय में ये विचारधारा और तौर-तरीके देश के कई हिस्सों में फैल गए. चूंकि, आंदोलन नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ था इसलिए आंदोलनकारियों को 'नक्सली' भी कहा जाने लगा. बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दमन हो गया, लेकिन कई कम्युनिस्टों ने उस आंदोलन में अपनी आस्था जताते हुए अलग-अलग समूहों का गठन किया. 

अर्बन नक्सल कथित तौर पर वे लोग हैं, जो खूब पढ़े-लिखे हैं, जिनका असर है और जो शहरी हैं. वे नीचे से लेकर ऊपर तक पैठ रखते हैं. वे किसी मुहिम की रूपरेखा बनाते हैं, जिसे काफी ऐसे लोगों को सहयोग मिलता है, जो दमदार हों. इससे सफलता के रास्ते आसान हो जाते हैं. कुल मिलाकर, अर्बन नक्सल एक तरह की व्यंग्य या आरोप वाली टर्म हो चुकी, जिसे सत्ता में रहते लोग अच्छी नजर से नहीं देखते.

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