अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चौंकाने के लिए जाने जाते हैं. कभी नीम, कभी शहद रहते इस लीडर ने पुरानी परिपाटी से अलग रूस के साथ करीबी संबंध रखने की इच्छा जताई. सार्वजनिक मौकों पर भी वे कई बार मॉस्को के लीडर व्लादिमीर पुतिन की तारीफ कर चुके. जल्द ही दोनों की मुलाकात हो सकती है. अगर ट्रंप और पुतिन एक मंच पर आए तो ग्लोबल पावर डायनेमिक्स में कई बड़े बदलाव होंगे. हो सकता है कि दुनिया वापस दो खेमों में बंट जाएं.
रूस को क्यों दिखाया बाहर का रास्ता
पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि रूस को जी7 गुट से बाहर निकालना बड़ी गलती थी. बता दें कि जी7 पहले जी8 हुआ करता था. ये दुनिया के ताकतवर इकनॉमीज का गुट था, जिसमें अमेरिका के अलावा कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल थे. साल 1998 में रूस को भी इसमें हिस्सा बनाया गया. लेकिन साल 2014 में मॉस्को ने जब यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा किया, तब इंटरनेशनल कानून तोड़ने के अपराध में उसे गुट से बाहर कर दिया गया.
क्या रूस के बाहर निकलने से गुट का नुकसान
हां. सीधे तौर पर सदस्य देशों ने ऐसा नहीं कहा लेकिन ये हुआ जरूर. असल में यहां से हटने पर रूस ने चीन से दोस्ती बढ़ा ली. ब्रिक्स और शंघाई संगठन में उसकी भागीदारी बढ़ी. मॉस्को चूंकि तेल और गैस के साथ सैन्य मामलों में भी बड़ा खिलाड़ी रहा, तो इसका असर भी ग्लोबल डायनेमिक्स पर पड़ने लगा. रूस के पाले में कई देश आ गए. जो सीधे-सीधे नहीं आए, वे संतुलन के नाम पर अमेरिका और रूस दोनों से व्यापार करने लगे. अब ट्रंप इस पुरानी भूल को सुधारने के इशारे दे रहे हैं. वे शीत युद्ध से पहले के संबंधों में वापस लौटने के इच्छुक दिखते हैं.
क्या हुआ था शीत युद्ध के दौरान
कोल्ड वॉर वो स्थिति है, जिसमें देश एक दूसरे पर सीधा हमला नहीं करते, लेकिन तनाव रहता है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद तत्कालीन सोवियत संघ (अब रूस) और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने लगा. इसकी वजह राजनैतिक-आर्थिक विचारधारा थी. अमेरिका पूंजीवाद पर यकीन करता, जबकि सोवियत कम्युनिस्ट विचारधारा पर. दोनों को यकीन था कि उनके सिस्टम से दुनिया ज्यादा सही ढंग से चल सकेगी. धीरे-धीरे ये बात तनाव की वजह बनने लगी.
दुश्मनी का क्या है बैकग्राउंड
वॉर के बाद सोवियत संघ और अमेरिका सबसे ताकतवर देश बचे थे. दोनों ही बाकी दुनिया को अपनी तरह से चलाने की कोशिश करने लगे. यहां तक कि ब्रिटेन, जिसे दोनों ही देश पहले साम्राज्यवादी मानते, अमेरिका ने उससे हाथ मिला लिया और ब्रिटेन, यूरोप के साथ मिलकर नाटो बना लिया. दूसरी तरफ सोवियत संघ ने ईस्टर्न यूरोप के साथ वॉरसा समझौता कर लिया. इससे दुनिया बिना युद्ध के ही दो खेमों में बंट गई. कुछ सालों के भीतर अमेरिका सुपर पावर बन गया, वहीं रूस अपनी पुरानी ताकत की परछाई था.
ताकतवर लीडर से आने से लौटने लगी शक्ति
पुतिन के लौटने के बाद रूस एक बार फिर ग्लोबल कैनवास पर बड़ी जगह घेरता दिखा. साल 2017 में अमेरिका में ट्रंप के आने के बाद इसमें और रंग भरा. ट्रंप ने अपने पहले ही टर्म में पुतिन के लिए नर्म रुख दिखाया. याद दिला दें कि ट्रंप की पहली जीत को लेकर रूस पर आरोप लगा था कि उसने इलेक्शन में दखल दिया है. ट्रंप ने इसे खारिज तो किया, लेकिन पुतिन की तारीफ करने से भी नहीं चूके. दोनों ने चार सालों में कुल पांच आधिकारिक मुलाकातें कीं. इसके अलावा कई इंटरनेशनल बैठकों में भी बातचीत हुई.
अब दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ट्रंप पुतिन से मेलजोल की बात कर रहे हैं. रूस और यूक्रेन जंग खत्म होने को लेकर भी उन्होंने बड़े बयान दे दिए. पूर्व प्रेसिडेंट जो बाइडेन से अलग वे यूक्रेन को लेकर उतने उदार नहीं. उन्होंने न केवल उसे NATO में लेने से इनकार कर दिया, बल्कि रूस के क्रीमिया लौटाने के यूक्रेनी प्रस्ताव को भी लगभग खारिज कर दिया. सबसे बड़ी बात ये है कि इन दो देशों के बीच जंग है, और फैसला ट्रंप और पुतिन ले सकते हैं. कम से कम ट्रंप के हालिया बयानों से तो यही लगता है कि वे यूक्रेन को खास छूट देने के मूड में नहीं.
अगर ये दोनों देश फिर से नजदीक आते हैं, जैसा ट्रंप और पुतिन के तौर-तरीकों से लग भी रहा है, तो ग्लोबल पावर डायनेमिक्स पर बड़ा असर होगा.
इसका सबसे पहला असर नाटो पर हो सकता है
दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य गुट को ट्रंप लंबे समय से लताड़ रहे हैं. दरअसल अमेरिका इसका सबसे बड़ा फंडर है. अब वो मानता है कि बाकी देशों के सैन्य बंदोबस्त का खर्चा भी वो ही क्यों उठाए. यही वजह है कि ट्रंप नाटो से अपने हाथ खींचने की धमकियां देते रहे. वॉशिंगटन और मॉस्को पास आए तो नाटो लगभग बेअसर हो जाएगा. तब हो सकता है कि यूरोपियन देश सुरक्षा के लिए कोई दूसरी व्यवस्था करें. इससे यूरोप की रक्षा नीतियों में बड़ा बदलाव आ सकता है. जैसे वे आपस में मिलकर कुछ ऐसा बना लें जो यूएस से अलग हो.
ईस्ट यूरोप में बढ़ेगा मॉस्को का असर
दोनों देशों की पुरानी दुश्मनी छोड़ने पर पूर्वी यूरोप खतरे में आ सकता है. इस हिस्से में यूक्रेन समेत पोलैंड और बाल्टिक मुल्क हैं. अब तक यूएस उनकी मदद करता रहा. यूक्रेन जंग में ही उसने सैन्य और आर्थिक सहायता की थी. लेकिन रूस के करीब आने पर वो इससे दूरी बना सकता है क्योंकि जाहिर तौर पर दो नावों की सवारी वो नहीं करेगा. इसका फायदा रूस को मिलेगा. ईस्टर्न हिस्से में वो अपना असर बढ़ा सकता है.
दुनिया हो सकती है दो-फांक
अमेरिका-रूस दोस्ती में ग्लोबल पावर डायनेमिक्स एकदम बदल सकता है. बीते दशकों में अमेरिका के पाले में यूरोप और तमाम देश हैं. वहीं रूस के साथ कभी-कभार चीन और बाकी देश दिख जाते हैं. लेकिन अगर सांप-नेवला साथ आ जाएं तो काफी कुछ बदलेगा. चीन अब तक रूस से ही एनर्जी और सैन्य तकनीकें लेत रहा. पिक्चर बदलने पर चीन को दूसरे विकल्प खोजने पड़ सकते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि यूरोप और चीन साथी बन जाएं.
दोनों का करीब आना कई अच्छी चीजें भी लेकर आएगा. मसलन, एक-दूसरे को परेशान करने के लिए दोनों ही दूसरे देशों में प्रॉक्सी वॉर करते हैं. सीरिया, ईरान और कई अफ्रीकी देश दोनों के लिए जंग का मैदान बने हुए हैं. इनके संबंध सुधरने पर बाकी देशों के बीच शांति आ सकती है.