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ईरान, गाजा, लेबनान और यमन- चौतरफा दुश्मनों से भिड़ा हुआ है Israel, मिडिल ईस्ट में कौन से देश साथी?

सालभर पहले फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास के हमले के साथ इजरायल की उससे लड़ाई शुरू हुई. अब ये युद्ध चार कोनों पर छिड़ चुका है. लेबनान के हिजबुल्लाह समेत यमन में हूती और ईरान के एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस ने तेल अवीव के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. इसमें मिडिल ईस्ट के लगभग सारे देश शामिल हो चुके, सिवाय चुनिंदा मुल्कों के.

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इजरायल को देश बतौर मान्यता मिलने में काफी समय लगा. (Photo- Getty Images)
इजरायल को देश बतौर मान्यता मिलने में काफी समय लगा. (Photo- Getty Images)

पिछले साल हमास के हमले पर भड़के इजरायल ने उसके चरमपंथियों के खिलाफ लड़ाई शुरू की, जो सिमटने की बजाए बढ़ती चली जा रही है. लेबनान में हिजबुल्लाह लीडर हसन नसल्लाह की मौत ने आग और भड़का दी. अब इजरायल चार कोनों पर चार ताकतों से लड़ रहा है. संघर्ष में सीधा योगदान न दे रहे देश भी किसी न किसी तरह से इसका हिस्सा हैं और इजरायल को घेरना चाहते हैं. वहीं जॉर्डन और इजिप्ट ने अब तक तेल अवीव से कूटनीतिक रिश्ता रखा हुआ है. अब्राहम संधि के तहत कुछ और देश भी उससे आंशिक तौर पर जुड़े. 

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सबसे पहले तो बात करें ईरान की

इस देश ने उन सारी मिलिशिया को सपोर्ट किया, जो इजरायल के खिलाफ हों. इनमें लेबनान का हिजबुल्लाह भी है, यमन के हूती भी, गाजा का हमास भी. इसके अलावा भी इरान और सीरिया में कई सशस्त्र समूह हैं, जो शिया मुस्लिम हैं और इजरायल को तहस-नहस करना चाहते हैं.

एक छतरी के नीचे है सारी मिलिशिया

ईरान की सरकार इन सबको एक अंब्रेला के नीचे रखती है, जिसका नाम है- एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस. ये ईरान और मिडिल ईस्ट के उन तमाम देशों का प्रॉक्सी नेटवर्क है जो तेल अवीव में अस्थिरता लाने पर काम करता रहा. फिलहाल इजरायल इन्हीं ताकतों से चार-चार फ्रंट पर जूझ रहा है. लेबनान में उसने जमीनी और हवाई दोनों हमले किए. हूती विद्रोहियों पर भी वो आक्रामक हो चुका. वहीं गाजा पट्टी पर चल रहे जमीनी अभियान के बारे में लंबे वक्त से बात हो रही है. 

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which arab nations are supporters of israel amid hezbollah hamas yemen war with tel aviv photo AP

अब इस जंग के बीच मिडिल ईस्ट के कई और देशों से भी इजरायल के खिलाफ बयान आ रहे हैं. बता दें कि तेल अवीव के आजादी की घोषणा करने के बाद से यानी साल 1948 से ही उसके सारे पड़ोसी नाराज रहे. हालांकि दो देश ऐसे थे, जहां गांठ काफी हद तक पिघल गई, यहां तक कि इजरायल और इन देशों के बीच डिप्लोमेटिक रिश्ते तक बने हुए हैं. 

पहले बात करते हैं इजरायल और इजिप्ट की

दोनों के बीच शुरुआत में काफी तनाव रहा. साल 1948 में आजादी के एलान के बाद ही इजरायल पर सारे अरब देशों ने हमला कर दिया. इसमें इजिप्ट भी शामिल था. दस सालों के भीतर ही स्वेज नहर के मुद्दे को लेकर दोनों के बीच तनाव हुआ. साल 1967 में खुद पर हुए हमले को नाकाम करते हुए इजरायल ने इजिप्ट के सिनाई द्वीप पर कब्जा कर दिया. सत्तर के दशक में भी एक जंग हुई. इसमें भी तेल अवीव ही जीता.

पहला देश जिसने मान्यता दी

इस जंग के तुरंत बाद ही दोनों देशों में कैंप डेविड समझौता हुआ. इसमें अमेरिका ने मध्यस्थता की थी. इसके तहत इजरायल ने देश को अपने कब्जे वाला द्वीप लौटा दिया था. बदले में इजिप्ट ने भी इजरायल को एक देश बतौर मान्यता दी थी. ये पहला मौका था जब किसी अरब देश ने इजरायल के साथ शांति समझौता किया और उसे औपचारिक रूप से मान्यता दी. इसके साथ ही दोनों के बीच कूटनीतिक संबंध भी बहाल हुए जो अब तक बने हुए हैं.  समझौते की वजह से हालांकि इजिप्ट को बाकी पड़ोसियों की नाराजगी झेलनी पड़ी. यहां तक कि उसे फिलिस्तीन का गद्दार तक माना गया लेकिन समय के साथ इस लिस्ट में एक और देश जॉर्डन भी शामिल हो गया. 

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which arab nations are supporters of israel amid hezbollah hamas yemen war with tel aviv photo AFP

जॉर्डन ने भी अपनाया

अक्टूबर 1994 में जॉर्डन और इजरायल के बीच शांति समझौता हुआ, लेकिन इससे पहले दोनों के रिश्ते का इतिहास काफी उथल-पुथल भरा रहा. साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और पूर्वी येरूशलम पर कब्जा कर लिया था. वहीं साठ की लड़ाई में इजरायल ने उसे हराते हुए दोनों ही हिस्से वापस हासिल कर लिए. इसके बाद दोनों देशों की बीच दुश्मनी और बढ़ गई.

जॉर्डन की नाराजगी को हवा दी फिलिस्तीन के मुद्दे ने. ये देश लगातार फिलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने यहां पनाह देता रहा और उनकी आजादी पर बात करता रहा, जबकि इजरायल का इसपर अलग ही रुख रहा. यही सब बातें मिलकर दुश्मनी बढ़ाती ही गईं, जब तक कि शांति समझौते के लिए रास्ता नहीं बना. 

अमेरिका ने की थी मध्यस्थता

इस समझौते के पीछे भी लंबी प्रोसेस रही. बार-बार लड़ाई-भिड़ाई में अपना बहुत कुछ दांव पर लगा रहे अरब देशों ने महसूस किया कि उन्हें इजरायल को देश की तरह मान्यता दे देनी चाहिए ताकि मध्य पूर्व में तनाव घट सके. इस बात को आकार दिया अमेरिका ने. तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने शांति प्रक्रिया में अहम रोल निभाया.

आखिरकार अक्टूबर 1994 को जॉर्डन के राजा हुसैन और इजरायली पीएम यित्जाक रॉबिन ने क्लिंटन की मौजूदगी में शांति संधि पर दस्तखत किए. इसके बाद ही जॉर्डन और इजरायल के बीच कूटनीतिक संबंध बने. चूंकि कुछ सालों पहले ही इजिप्ट भी ये कदम उठा चुका था, लिहाजा इस बार ज्यादा हो-हल्ला नहीं हुआ, सिवाय कुछ चरमपंथी गुटों के शोर से. 

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which arab nations are supporters of israel amid hezbollah hamas yemen war with tel aviv photo Getty Images

कुछ सालों पहले ही मध्य पूर्व में एक बड़ा समझौता हुआ, जिसे अब्राहम संधि भी कहते हैं. इसके तहत यूएई, बहरीन, मोरक्को, और सूडान ने इजरायल के साथ आंशिक कूटनीतिक संबंध बनाए. माना जाए तो इनके बीच फिलहाल संबंधों की बर्फ पूरी तरह से नहीं पिघली है. 

इन अरब देशों ने इजरायल को नहीं माना आजाद मुल्क

- सऊदी अरब ने अब तक तेल अवीव को औपचारिक मान्यता नहीं दी है. 

- इराक ने अपनी पॉलिसी के तहत इजरायल के साथ किसी भी तरह के संबंध से हमेशा इनकार किया. 

- हिजबुल्लाह के गढ़ वाले लेबनान और इजरायल के बीच हमेशा ठनी रही. 

- सीरिया भी इजरायल को मान्यता नहीं देता है. 

- कतर और इजरायल के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे, फिलहाल कतर ने भी इससे दूरी रखी हुई है. 

- हूती विद्रोहियों के हेडक्वार्टर यमन ने भी इजरायल को मान्यता नहीं दी.

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