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कौन सा देश बीमार लोगों को छुट्टियां देने के मामले में सबसे बढ़िया है, क्या ज्यादा पेड छुट्टियां मिलने पर कर्मचारी बहानेबाज हो जाते हैं?

पिछले साल फ्रांस में लोग सबसे ज्यादा बीमार पड़े. ये वे लोग हैं, जिन्होंने बीमारी के नाम पर दफ्तर से छुट्टियां लीं. पूरे देश की आधी से ज्यादा वर्कफोर्स ने साल में कम से कम 1 दिन की सिक लीव ली. ये वेकेशन लीव से अलग है, जो वहां जमकर ली जाती है. छुट्टियां देने के मामले में यूरोप के कई देश सबसे उदार हैं, वहीं जापान में सिक लीव जैसी कोई चीज नहीं.

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यूरोपियन यूनियन पेड सिक लीव खुलकर देता है, जबकि बहुत से देश इसमें पीछे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
यूरोपियन यूनियन पेड सिक लीव खुलकर देता है, जबकि बहुत से देश इसमें पीछे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

कोविड महामारी के बाद से दुनिया में हेल्थ को लेकर देश ज्यादा चौकस हुए. यूरोपियन यूनियन के कई देशों ने अपने यहां पेड सिक लीव की संख्या बढ़ा दी ताकि लॉन्ग कोविड से जूझ रहे लोग पूरी तरह से ठीक होकर ही काम पर लौटें. इसका अलग असर देखने को मिल रहा है. पहले से कहीं ज्यादा लोग बीमार पड़ने लगे हैं, या फिर ये कहा जाए कि बीमार लोग अब अपनी वेकेशन लीव की बजाए सिक लीव का ही इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इसका दूसरा साइड भी है. ये दिख रहा है कि छुट्टियों के मामले में सबसे उदार देश के लोग भी पूरी ईमानदारी से काम करते हैं. 

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शुरुआत जापान से करते हैं. जरूरत से ज्यादा काम के लिए कुख्यात जापान के बारे में कहा जाता है कि वहां के लोग काम से छुट्टी पाने पर बीमार हो जाते हैं. 70 के दशक में वहां एक शब्द आया- करोशी, जिसका मतलब है ज्यादा काम करने से मौत. काम को लेकर जापानियों का जुनून ऐसा था कि वहां की सरकार को इसपर काबू पाने नियम लाना पड़ा ताकि लोगों को जबरन छुट्टी पर भेजा जा सके. इसके बदले छोटे-मोटे पर्क्स भी दिए जाने लगे. 

काम के लिए जुनूनी इस देश में पेड सिक लीव नहीं मिलती. या मिलती भी है तो तभी जब कर्मचारी मौत से जूझ रहा हो, या हादसे में जख्मी हो चुका हो. जापान में इसे shoubyouteate कहते हैं, मतलब इंजुरी एंड सिकनेस अलावंस.

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कम छुट्टियों वाले देश में कर्मचारी प्रीमैच्योर वर्क रिटर्न करने लगते हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

ये लॉन्ग टर्म सिकनेस के लिए है. अगर कोई दो-तीन दिन के बीमार हुआ हो, जैसे वायरल हो जाए या पेट खराब हो, तब जापान में बीमारी की छुट्टी नहीं मिलती. लंबी छुट्टियों में भी पूरी जांच-पड़ताल के बाद 60% तनख्वाह दी जाती है. वहीं जापान में काम कर रही इंटरनेशनल कंपनियों में छुट्टियों का अलग नियम होता है. 

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किस देश में कितनी हैं छुट्टियां?

मार्केट रिसर्च कंपनी डेटास्कोप के मुताबिक, यूरोप में फ्रांस में जहां बीते साल सबसे ज्यादा लोग बीमार पड़े, वहां पर GDP का लगभग 10 प्रतिशत पेड सिक लीव और पब्लिक हेल्थ पर जाता है. दूसरी तरफ जर्मनी ऐसा देश है, जहां की सरकार और प्राइवेट कंपनियां दोनों ही बीमार की बहुत परवाह करती हैं. ये पूरे यूरोप में नंबर 1 देश है, जहां 11 प्रतिशत GDP में लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ बीमार कर्मचारियों के लिए है. इसके बाद नीदरलैंड, स्वीडन, स्पेन और फिर लग्जमबर्ग आते हैं. 

क्या ज्यादा छुट्टियां मिलने पर लोग ज्यादा बीमार पड़ते हैं? 

ये सवाल लगातार होता रहा. माना जाता रहा कि अगर पेड सिक लीव मिलेगी तो लोग बीमार हों, या न हों, छुट्टियां लेंगे ही. लेकिन ऐसा नहीं है. जर्मनी एक उदाहरण है, जहां भरपूर छुट्टियों के बाद भी लोग जरूरत जितनी ही लीव लेते हैं. छुट्टियां न मिलने पर बल्कि ज्यादा गड़बड़ियां होती हैं. लोग बीमार हों, तब भी आधी बीमारी से उठकर ऑफिस चले आते हैं. इससे न तो वे काम ठीक से कर पाते हैं, और न ही सेहत सुधार पाते हैं. वर्कप्लेस पर प्रीमैच्योर रिटर्न से ये होता है कि कर्मचारी दोबारा बीमार पड़ जाए और अबकी बार लंबी छुट्टियां लेनी पड़ जाए. 

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अमेरिका में पेड वेकेशन लीव्स कम ही मिलती हैं, लेकिन तब भी वहां लोग खूब छुट्टियां मनाते हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

ये भी दिखता है कि जो देश अपने कर्मचारियों का ज्यादा ध्यान रख रहे हैं, वे वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स की लिस्ट में 30 नंबर के भीतर आते हैं. ये संयोग नहीं. 

एक तरफ दुनिया के देश सिक लीव बढ़ाने या ज्यादा उदार पॉलिसी की बात कर रहे हैं, वहीं अमेरिका ऐसा विकसित देश हैं, जहां पेड छुट्टियां लगभग नहीं मिलतीं. वॉशिंगटन के थिंक टैंक सेंटर फॉर इकनॉमिक एंड पॉलिसी रिसर्च की मानें तो हर 4 में से 1 अमेरिकी वर्कर के पास साल की एक दिन भी पेड छुट्टी नहीं होती, सिवाय थैंक्सगिविंग या क्रिसमस जैसी पेड हॉलीडेज के. लेकिन वहां घूमने के काफी शौकीन हैं. ऐसे में लोग अक्सर तनख्वाह कटवाकर सैर-सपाटा करते हैं.

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