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यहूदियों से दोगुनी आबादी वाला वो समुदाय, जिसे अरब देश कर रहे परेशान, क्यों नहीं बन पा रहा अलग मुल्क?

दुनिया में सवा करोड़ से कुछ ज्यादा आबादी वाले यहूदियों के पास अकेला देश इजरायल है. इसपर कब्जे को लेकर भी अरब मुल्क होड़ में हैं. वहीं कुर्द समुदाय के हाल इजरायलियों से भी बदतर हैं. मुस्लिम धर्म को मानने वाले इन लोगों की संख्या यहूदियों से दोगुनी से भी ज्यादा है, लेकिन इनके हिस्से कोई देश नहीं. इसकी वजह भी यही मुस्लिम देश हैं.

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एक सदी से ज्यादा वक्त से कुर्दिश लोग अलग देश की डिमांड कर रहे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
एक सदी से ज्यादा वक्त से कुर्दिश लोग अलग देश की डिमांड कर रहे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

आतंकी गुट हमास के हमले के बाद से इजरायल लगातार जवाब दे रहा है. अब इस जंग में पड़ोसी देश भी शामिल हो चुके. अरब समेत ज्यादा मुस्लिम-बहुत देश लगातार यहूदियों को पीछे हटने की सलाह दे रहे हैं. यहां तक कि उसके खिलाफ साइकोलॉजिकल लड़ाई तक छिड़ गई है. ये तो हुई ज्यूइश लोगों की बात, लेकिन कुर्द भी एक जाति है. लगभग 4 करोड़ की आबादी वाले ये लोग इराक, तुर्की और सीरिया में रिफ्यूजियों की तरह जीने को मजबूर हैं. जानिए, क्यों इन्हें अपना देश नहीं मिल पा रहा. 

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हिंदुस्तान से माना जाता है संबंध 

कुर्द कहां से आए, इसपर कोई बहुत साफ बात नहीं मिलती. हालांकि अलग-अलग इतिहासकार दावा करते हैं कि इस्लाम के आने से पहले कुर्द बुतपरस्त हुआ करते थे, यानी मूर्तिपूजा करते. ये भारत और ईरान के मिश्रित तौर-तरीके मानने वाले थे. 7वीं सदी में इनका इस्लाम से संपर्क हुआ और जल्द ही ये लोग इस्लाम को मानने लगे. फिलहाल ज्यादातर कुर्द सुन्नी हैं, इसके अलावा शिया, और सूफी भी हैं. 

कहां रहते हैं ये लोग

ज्यादातर कुर्दिश जाति इराक, ईरान, तुर्की और सीरिया में रह रहे हैं. ये इन सभी देशों की सीमाओं के हिस्से में रहते हैं, जिसे इन्होंने कुर्दिस्तान नाम दिया हुआ है. हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई भी देश इसे मान्यता नहीं देता. वजह साफ है. इस देश को मान्यता देने के लिए इन सभी मुल्कों को अपना कम-ज्यादा टुकड़ा खोना होगा. 

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why are kurds stateless amid israel palestine hamas war photo Getty Images

अलग देश की जरूरत भी क्या थी?

जब कुर्दिश सुन्नी या शिया हैं और मुस्लिम-बहुल देशों में ही रह रहे हैं तो उन्हें अलग मुल्क की जरूरत ही क्या है, ये सवाल उठता रहा. इसकी वजह भी इन्हीं देशों में छिपी है. एशियाई मूल के इन लोगों का धर्म तो बदल दिया गया, लेकिन कहीं न कहीं रीति-रिवाज थोड़े अलग रहे. इसी आधार पर उनके साथ भेदभाव होने लगा. यहां तक कि उन्हें देश का नागरिक मानने तक से मना कर दिया गया. इसी बात पर नाराज कुर्द जाति ने 20वीं सदी की शुरुआत से अपने अलग मुल्क की मांग शुरू कर दी. 

इस तरह शुरू हुआ भेदभाव

पहले विश्व युद्ध के दौरान इन लोगों ने ब्रिटिश और फ्रेंच सेना का साथ दिया. इसके बदले में उन्हें भरोसा दिलाया गया कि वे अलग देश बनाने में उनकी मदद करेंगे. इसी दौरान ट्रीटी ऑफ सर्व्स बना, जो कुर्दिस्तान बनाने की बात करता था. हालांकि तुर्की की तत्कालीन सरकार ने इस संधि को सिरे से नकार दिया. यहां तक कि कुर्द या कुर्दिस्तान जैसे शब्द बोलने पर भी पाबंदी लगा दी गई. कुर्दिश तौर वाले टेलीविजन प्रोग्राम्स का टीवी पर प्रसारण रोक दिया. बाकी देशों ने भी तुर्की का साथ दिया. 

why are kurds stateless amid israel palestine hamas war photo Unsplash

कुर्द्स पर लगातार हिंसा

- साल 1988 में इराक के हलाबजा शहर में तत्कालीन सरकार ने भारी नरसंहार किया. इस ऑपरेशन का नाम था- द स्पॉइल्स, यानी बिगड़े हुए लोग. इसमें अलग देश की मांग कर रहे लाखों कुर्दिश मारे गए. 

- इस तबाही का कहीं पक्का डेटा नहीं मिलता है क्योंकि इराक में ज्यादातर देशों की मानवाधिकार एजेंसियां नहीं पहुंच पाती हैं. 

- तुर्की में इनकी आबादी 20 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन कोई अधिकार नहीं. यहां तक कि कुर्दिस्तान की बात करने वाली पार्टियों को आतंकी समूह का दर्जा दिया गया है. 

- सीरिया में सवा लाख से ज्यादा कुर्दिश लोगों को देश ने नागरिकता देने से ही मना कर दिया क्योंकि वे यह साबित नहीं कर सके कि वे उस देश में 1945 या पहले से रह रहे हैं. 

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फिलहाल क्या हैं हालात

कुर्दिश और बाकी देशों में लगातार हिंसा चलती रही. इस बीच तुर्की कुछ नर्म पड़ा क्योंकि उसे यूरोपियन यूनियन की सदस्यता चाहिए थी. उसने कुर्दिश भाषा बोलने पर लगाई पाबंदी हटा ली. इस बीच कुर्दिश लीडरों ने अपना एक झंडा और मिलिट्री भी बना रखी है. इराकी सरकार ने सद्दाम हुसैन सरकार के गिरने के बाद कुर्दिस्तान को ऑटोनॉमी दी लेकिन ये ऊपरी तौर पर ही है. 

क्यों इजरायल लेता आया है कुर्दिशों का पक्ष

इजरायल कुर्दिश लोगों के हमेशा पक्ष में रहा. वहां कई बार इनकी मांग को लेकर छुटपुट प्रदर्शन होते रहे. वैसे इसमें इजरायल का सीधा कोई हित नहीं, लेकिन इसे दुश्मन का दुश्मन, दोस्त की तरह भी देखा जाता रहा. देश का थोड़ा-थोड़ा भाग जाने से तुर्की, सीरिया और इराक, ईरान जैसे देश कुछ कमजोर होंगे, जिससे उनका ध्यान इजरायल से हटेगा. 

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