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हसीना के जाते ही पुरानी दुश्मनी छोड़ मेल-मिलाप करने लगे बांग्लादेश और पाकिस्तान, क्यों है भारत के लिए खतरा?

शेख हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश में बहुत कुछ बदल रहा है. अब तक एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन लगते ढाका और इस्लामाबाद करीब आ रहे हैं. इसी महीने दोनों देशों के नेताओं ने इजिप्ट में मुलाकात की, जो पिछले कुछ महीनों में दूसरी भेंट थी. बांग्लादेश की आजादी के बाद से पहली बार उनके बीच समुद्री व्यापार भी शुरू हुआ, और सैन्य प्रैक्टिस की भी बात हो रही है.

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 बांग्लादेश और पाकिस्तान दूरियां मिटाते दिख रहे हैं. (Photo- Getty Images)
बांग्लादेश और पाकिस्तान दूरियां मिटाते दिख रहे हैं. (Photo- Getty Images)

अगस्त की शुरुआत में शेख हसीना की सत्ता जाने के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार आ गई, जिसके नेता मोहम्मद यूनुस हैं. उनकी विदेश नीति ढाका की पुरानी पॉलिसी से एकदम अलग लग रही है. एक तरफ वे भारत से तनाव को उकसा रहे हैं, दूसरी तरफ पाकिस्तान से दशकों पुरानी दुश्मनी को मिटा रहे हैं. कई अहम मुद्दों पर नई दिल्ली को किनारे रख ढाका ने इस्लामाबाद का साथ देना शुरू कर दिया. तो क्या महज भारत से तनाव इन देशों को एकजुट कर रहा है, या वजह कुछ और है?

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कैसे पनपे भारत-विरोधी सेंटिमेंट्स

साल 1971 में भेदभाव के आधार पर पूर्वी पाकिस्तान ने खुद को पाकिस्तान से अलग देश घोषित कर दिया. भारी युद्ध हुआ, जिसमें भारत ने बांग्लादेश का साथ दिया. इसके बाद ही ढाका स्वतंत्र हो सका. सत्तर के दशक से अब तक पाकिस्तान और बांग्लादेश एक-दूसरे से छिटके रहते थे, वहीं भारत के साथ ढाका के अच्छे रिश्ते रहे. लेकिन इस साल की शुरुआत से कुछ बदला. बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियां आरोप लगाने लगीं कि भारत की मदद से शेख हसीना ने चुनाव जीता. वहां भारतीय सामानों के बहिष्कार की बात होने लगी. बढ़ते-बढ़ते गुस्सा प्रोटेस्ट तक पहुंचा और फिर सत्तापलट ही हो गया. 

अब अंतरिम सरकार के नेता मोहम्मद यूनुस हैं, जो उन सारी पार्टियों से जुड़े हुए हैं, जो अपनी कट्टरता, और खासकर भारत विरोधी रवैए के लिए जानी जाती हैं. अगस्त से अब तक देश में हिंदुओं पर हिंसा की भी खबरें आ रही हैं. कुल मिलाकर पड़ोसी देश में भारत से दूरी के सारे संकेत हैं. इसके साथ ही ढाका की इस्लामाबाद से दशकों पुरानी दुश्मनी खत्म होती दिख रही है.

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किस तरह से दे रहे दुश्मनी भुलाने के संकेत

फरवरी 2025 में कराची पोर्ट पर पाकिस्तानी नौसेना के साथ बांग्लादेश का युद्धाभ्यास ‘अमन-2025’ होने वाला है. बता दें कि हसीना की सत्ता के दौरान पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की सैन्य प्रैक्टिस पर पाबंदी थी. 

दोनों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी मजबूत हो रहे हैं. कुछ समय पहले पाकिस्तानी कार्गो ने चटगांव पोर्ट पर लंगर डाला. ये समुद्री व्यापार आगे और बढ़ने वाला है. द डिप्लोमेट की रिपोर्ट के अनुसार, पाक लीडर शरीफ ने दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को याद करते हुए जोर दिया कि आने वाले दिनों में दोनों के बीच बिजनेस और बढ़ेगा.

बायलैटरल संबंध बढ़ाने के अलावा दोनों देश सार्क (SAARC) को एक बार फिर जिंदा करने पर जोर दे रहे हैं. सार्क की आखिरी मीटिंग साल 2014 में नेपाल में हुई थी. साल 2022 में इस्लामाबाद में समिट होने की बात थी लेकिन उरी टैरर अटैक के खिलाफ गुस्सा दिखाते हुए पीएम नरेंद्र मोदी के सम्मेलन के बहिष्कार के बाद बाकी देशों ने भी अपना नाम वापस ले लिया था. अब बांग्लादेश और पाकिस्तान अगर मिलकर इसे रिवाइव करें तो भारत के लिए ये चिंता की बात होगी क्योंकि साउथ एशियाई देशों में फिलहाल भारत सबसे मजबूत स्थिति में है तो लीडरशिप की कमान उसके हाथों में होनी चाहिए. 

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लीडर पर है पाकिस्तान से जुड़े दल का असर

बांग्लादेश के अचानक पाकिस्तान से गलबहियां करने के पीछे वहां के राजनैतिक हालात भी हैं. वहां अंतरिम सरकार पर जमात-ए-इस्लामी की छाप है. इस चरमपंथी पार्टी को चुनावों में भाग लेने से बैन कर दिया गया था. हालांकि यूनुस सरकार ने आते ही इसपर से सारी पाबंदियां हटा लीं. ये पार्टी पाकिस्तान से अपने करीबी रिश्तों के लिए जानी जाती है. इस्लामाबाद में भी इसकी विंग है, जिसके कनेक्शन हमास से लेकर कई आतंकी समूहों तक हैं. यानी फिलहाल बांग्लादेश में पाकिस्तान की वापसी या कम से कम उसकी दोस्ती के सारे फैक्टर मौजूद हैं. 

अंतरिम सरकार अब खुद को पक्की सरकार बनाने की कोशिश करती लग रही है. आने के 100 दिन पूरे होने पर अंतरिम नेता यूनुस ने एक वीडियो जारी किया लेकिन इसमें बांग्लादेश में आगामी चुनाव की कोई बात नहीं हुई. वहीं कायदा ये है कि इंट्रिम सरकार तीन महीनों के भीतर इलेक्शन कराती है. अब देश में पलते भारत-विरोधी सेंटिमेंट्स को हवा देकर वे जमीन पक्की करते दिख रहे हैं. इसी कड़ी में वहां से लगातार शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग भी हो रही है. 

कौन-कौन अब भी पाकिस्तान के खिलाफ

हसीना की पार्टी अवामी लीग पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के हरदम खिलाफ रही. हालांकि सत्तापलट के साथ हसीना समेत इस दल के सारे बड़े नेता या तो गायब हो चुके, या हिरासत में हैं. ऐसे में उसका विरोध कोई मायने रखेगा, इसमें शक है. ढाका में 1971 मुक्ति संग्राम में मारे गए लाखों सैनिकों के परिवार हैं. साथ ही बहुत से संगठन भी हैं, जो पाकिस्तानी हिंसा का शिकार हुए लोगों के लिए काम कर रहे हैं. वे पाकिस्तान के सख्त खिलाफ हैं, खासकर ये देखते हुए कि उस दौरान हुए रेप और कत्लेआम के लिए पाक सरकार ने आज तक आधिकारिक माफी नहीं मांगी. लेकिन अभी जैसी स्थिति है, उसमें कोई खुला विरोध करने की शायद ही हिम्मत करे.

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