अक्सर दूसरों के मामले में पैर फंसाने वालों की तुलना दिल्ली-हरियाणा की तरफ मजाक-मजाक में चौधरी बनने से होती है. इस तरह से देखें तो अमेरिका हरदम ही कथित चौधरी की भूमिका में रहता है. वो न केवल देशों के बिल्कुल पर्सनल मामलों में घुसता है, बल्कि रोकटोक भी करता है और बात न बने तो धमकाने तक चला आता है. यहां कई सवाल उठते हैं. कब और किन हालातों में देश एक-दूसरे के मुद्दे पर बोल सकते हैं. और ये भी कि अमेरिका के पास इतने अधिकार कहां से आए.
खुद अमेरिकी एक्सपर्ट मानते हैं ये बात
अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट रॉबर्ट जर्विस ने करीब 2 दशक पहले एक किताब लिखी थी- द न्यू अमेरिकन इंटरवेंशनिज्म. वे कहते हैं- दूसरों के मामले में टांग अड़ाना भी एपल पाई की तरह ही अमेरिका की एक खूबी है. किताब भले पुरानी हो गई, लेकिन दूसरे मुल्कों में घुसने की अमेरिकी आदत लगातार बढ़ ही रही है. हाल ही में उसने यूक्रेन को रूस से लड़ाई के लिए और हथियार देने का वादा करते हुए रूस को चेतावनी दी है. कभी वो ताइवान के लिए लड़ने की बात करता है तो कभी उत्तर कोरिया से भिड़ता है.
किस बात का देता है हवाला
अमेरिका की विदेश नीति में इंटरवेंशन यानी हस्तक्षेप जरूरी चीज है. वो मानता है कि दुनिया में आजादी, मानवाधिकार और लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए सबकुछ किया जाना चाहिए. इसी फोकस के साथ वो देशों के अंदरुनी मुद्दों तक में रोकटोक करने लगता है.
सबसे ज्यादा हस्तक्षेप लड़ाई के रूप में
- साल 1776 से लेकर अब तक अमेरिका ने लगभग 4 सौ देशों में छोटी से लेकर बड़ी लड़ाइयां कीं.
- अपनी करीब ढाई सौ साल की हिस्ट्री में ये देश मुश्किल से 2 दशक शांति से रहा.
- साल 2001 से लेकर अगले दशकभर तक अमेरिका और उसके साथियों ने अलग-अलग देशों पर रोजाना 46 (औसतन) बम गिराए.
- यूगोस्लाविया में अमेरिकी-लेड नाटो की वजह से 8 हजार से ज्यादा नागरिक मारे गए और लाखों विस्थापित हुए.
- अफगानिस्तान और ईराक में लाखों लोग मारे गए. विस्थापन भी लंबे समय तक चलता रहा.
- पॉलिटिकल साइंटिस्ट्स के मुताबिक दूसरे वॉर के बाद से साल 2000 तक उसने कई देशों के 81 चुनावों में हस्तक्षेप किया.
आर्थिक बैन भी अपनाता रहा
युद्ध अकेला रास्ता नहीं, वो साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाता रहा. जैसे कई आर्थिक पाबंदियां लगा दीं. यहां तक कि अपने मित्र देशों पर भी पाबंदी लगाने के लिए दबाव बनाया. कई और भी तरीके हैं, जैसे किसी फायदे का लालच देना, किसी इंटरनेशनल क्लब का सदस्य बना लेना, कल्चर में सेंध लगाना और इलेक्शन के नतीजे को तोड़-मरोड़ देना. फॉरेन अफेयर्स ने साल 2020 में दावा किया कि सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी ने सबसे पहले 1948 में इटली में हो रहे चुनावों पर असर डाला था. इसके बाद से अमेरिका पर ये आरोप लगते रहे.
एनजीओ के नाम पर भी फर्जीवाड़े
जेनेवा स्कूल ऑफ डिप्लोमेसी में राजनैतिक मामलों पर एक्सपर्ट अल्फ्रेड दी जायास के मुताबिक अमेरिका अलग-अलग देशों में अपने एनजीओ को भी फंड करता है. इनमें से कई नकली एनजीओ होते हैं, जिनका काम विकास के नाम पर असल में देश में अस्थिरता पैदा करना है.
बीते 2 दशकों में वॉशिंगटन की पाबंदियां 10 गुना बढ़ गईं. अब केवल रूस और उत्तर कोरिया नहीं, बल्कि क्यूबा, वेनेजुएला, लीबिया, इराक, ईरान और सीरिया तक जा चुकी.
क्यों करता है ऐसा
20वीं सदी की शुरुआत से ही अमेरिका की इंटरवेंशन की पॉलिसी जोर पकड़ने लगी. ये अमेरिकी विदेश नीति का बड़ा हिस्सा बन गई. ये देश असल में किसी भी ऐसे देश को दबाता था, जो आगे बढ़ रहा हो, या जिसकी वजह से उसका दबदबा कम हो रहा हो. यूरोप और एशिया, दोनों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अमेरिका ने न सिर्फ दो वर्ल्ड वॉर्स में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, बल्कि 4 दशक तक रूस से कोल्ड वॉर भी करता रहा. इसके बाद उसने यूरोप से दोस्ती कर ली और सैन्य संगठन नाटो का अगुआ बन गया. अब लंबे समय तक अमेरिका से उसका ताज कोई नहीं छीन सकता.
अमेरिका को दूसरे देश भी ऐसा करने देते हैं क्योंकि फिलहाल वही सुपरपावर है. अगर कोई मुल्क उसे अपने यहां घुसने की इजाजत न दे तो वो नॉर्थ कोरिया या क्यूबा की तरह अलग-थलग पड़ सकता है. वजह ये है कि अमेरिका अकेले दुश्मनी नहीं लेता, बल्कि अपने साथियों को भी अपने दुश्मन से दुश्मनी के लिए उकसाता है.
कोई देश, कब किसी दूसरे के घर में दखल दे सकता है
यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल के पास इसके लिए एक टर्म है- रिस्पॉन्सिबलिटी टू प्रोटेक्ट (RtoP). अगर किसी देश के पड़ोस में हिंसा हो रही हो, हत्याएं हो रही हों, या नस्ल, रंग, लिंग के आधार पर भेदभाव हो रहा हो तो वो एक्शन ले सकता है. इसे ह्यूमेनिटेरियन इंटरवेंशन कहते हैं. हालांकि अमेरिका ने इसी नाम पर काफी तबाही मचाई. फिलहाल यूक्रेन के मामले में भी वो ह्यूमेनिटेरियन आधार पर मदद दे रहा है. एक्सपर्ट मानते हैं कि लड़ाई भले यूक्रेनी जमीन पर हो रही हो, लेकिन असल में अमेरिका और रूस लड़ रहे हैं.