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चीन की कमजोरी, समंदर में भारत की ताकत... छोटा सा मालदीव क्यों है हिंदुस्तान के लिए अहम?

मालदीव को सबसे खास बनाती है उसकी भौगोलिक स्थिति. हिंद महासागर में 90 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला मालदीव रणनीतिक लिहाज से काफी खास है. भारत ही उसका सबसे करीबी पड़ोसी है. लेकिन वहां सरकार बदलने के बाद अब उसके भारत से दूर जाने की आशंका भी होने लगी है.

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मालदीव का 99 फीसदी से ज्यादा का इलाका समंदर में है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
मालदीव का 99 फीसदी से ज्यादा का इलाका समंदर में है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मालदीव में सरकार बदल चुकी है. मोहम्मद मुइज्जू ने 17 नवंबर को राष्ट्रपति पद की शपथ ली. मुइज्जू के शपथ समारोह में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू पहुंचे थे. जबकि, पांच साल पहले 2018 में जब इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने शपथ ली थी, तब उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए थे.

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बहरहाल, मुइज्जू का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए थोड़ी चिंता भी बढ़ा सकता है. उसकी वजह भी है. मुइज्जू ने अपना पूरा चुनाव 'इंडिया आउट' कैंपेन पर लड़ा था. दरअसल, मुइज्जू मालदीव से भारतीय सैनिकों को हटाना चाहते हैं.

राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने फिर यही बात दोहराई. उन्होंने किरेन रिजिजू से मुलाकात के दौरान मालदीव से भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने की बात कही. 

इतना ही नहीं, मुइज्जू की सरकार ने भारत के साथ हुए 100 से ज्यादा समझौतों की समीक्षा करने का भी फैसला लिया है.

मुइज्जू को चीन का समर्थक माना जाता है. हालांकि, मुइज्जू खुद को किसी देश का समर्थक बताते नहीं हैं. चीन समर्थक' सवाल पर मुइज्जू ने कहा था, 'मेरी सबसे पहली प्राथमिकता मालदीव और उसकी स्थिति है. हम मालदीव समर्थक हैं. कोई भी देश जो हमारी प्रो-मालदीव नीति का सम्मान करता है और उसका पालन करता है, वो मालदीव का करीबी दोस्त माना जा सकता है.'

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मुइज्जू से पहले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह राष्ट्रपति थे. सोलिह की सरकार में भारत और मालदीव के रिश्ते और भी ज्यादा मजबूत हुए थे. उन्हें चीन का विरोधी माना जाता था. 

मालदीव हिंद महासागर में 90 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. हालांकि, इसका 300 वर्ग किलोमीटर से भी कम इलाका जमीनी है. इसके 1200 से ज्यादा छोटे-छोटे द्वीप समंदर में फैले हुए हैं.

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू.

मालदीव की सियासत और भारत...

1965 में मालदीव को ब्रिटेन से आजादी मिली. 2008 तक यहां सिंगल पार्टी सिस्टम ही था. उसके बाद जनमत संग्रह करवाया गया और तब से ही हर पांच साल के लिए राष्ट्रपति चुना जाता है.

1968 से 1978 तक इब्राहिम नासिर यहां के राष्ट्रपति रहे. उसके बाद मौमून अब्दुल गयूम को राष्ट्रपति चुनाव गया. गयूम ने 2008 तक यानी 30 साल मालदीव की सत्ता में रहे. इस दौरान 1988 में सेना ने उनका तख्तापलट करने की भी कोशिश की. उस समय भारत ने सेना भेजकर गयूम की सरकार बचाई थी.

2008 में नया संविधान लागू किया गया और मल्टी पार्टी सिस्टम आया. 2008 में मोहम्मद नाशिद सत्ता में आए. उनके शपथ समारोह में भारत के तब के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी शामिल हुए थे. नाशिद की सरकार का रुझान भारत की ओर था, लेकिन वो बाद में चीन की साइड होते चले गए.

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2013 में अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने. यामीन की सरकार चीन की कट्टर समर्थक थी. उनकी सरकार में ही मालदीव जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल हुआ था.  

आखिरकार 2018 में जब इब्राहिम मोहम्मद सोलिह राष्ट्रपति बने. सोलिह का रुझान भारत की तरफ ज्यादा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके शपथ समारोह में भी गए थे. उनकी सरकार मालदीव और भारत के रिश्ते पहले से भी ज्यादा मजबूत हुए. 

भारत के लिए क्यों अहम है मालदीव?

मालदीव और भारत के बीच लगभग दो हजार किलोमीटर की दूरी है. भारत ही है जो मालदीव का सबसे करीबी पड़ोसी है.

मालदीव को अगर कुछ चीज खास बनाती है, तो वो है हिंद महासागर में बसा होना. मालदीव के छोटे-बड़े द्वीप उस शिपिंग लेन के बगल में है, जहां से चीन, जापान और भारत को एनर्जी सप्लाई होती है.

लगभग डेढ़ दशक पहले चीन ने हिंद महासागर में नौसैनिक जहाज भेजने शुरू कर दिए थे. इसके बाद ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स में मालदीव और भी अहम हो गया. यामीन की सरकार में मालदीव चीन के काफी करीब पहुंच गया था. यामीन की सरकार में मालदीव की आर्थिक स्थिति भी काफी बिगड़ गई थी. मानवाधिकारों के हनन के आरोपों के कारण भारत और पश्चिमी देशों ने मालदीव को कर्ज देने से इनकार कर दिया. आखिरकार चीन ने उसकी मदद की.

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यामीन की सरकार में चीन से भारी भरकम कर्ज लिया. एक वक्त तो ऐसा आया कि ये तक कहा जाने लगा कि जैसा राजपक्षे ने श्रीलंका के साथ किया था, वैसा ही यामीन ने मालदीव के साथ किया. 2018 के आखिर तक मालदीव के कुल बाहरी कर्ज में 70 फीसदी से ज्यादा अकेले चीन का था. 

इसके अलावा, मालदीव सार्क (SAARC) का सदस्य भी है. सार्क आठ दक्षिण एशियाई देशों का संगठन है. इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए भी भारत को मालदीव के साथ की जरूरत है.

2016 में उरी हमले के बाद जब पाकिस्तान में सार्क समिट हुई थी, तो भारत ने इसे बायकॉट करने की अपील की थी. तब मालदीव इकलौता ऐसा देश था, जिसने भारत का साथ दिया था. 

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह और पीएम मोदी. (फाइल फोटो)

मालदीव को भी है भारत की जरूरत

भारत भी हमेशा मालदीव का साथ देते आया है. और ये सिलसिला 1965 में मालदीव की आजादी के साथ ही शुरू हो गया था. भारत उन देशों में से एक था, जिन्होंने सबसे पहले मालदीव को मान्यता दी थी. 1972 में भारत ने मालदीव की राजधानी माले में अपना मिशन स्थापित किया था.

इतना ही नहीं, 26 दिसंबर 2004 को आई सुनामी के बाद भारत पहला देश था, जिसने मालदीव की मदद की थी. भारत ने उस समय तुरंत मालदीव को 10 करोड़ रुपये की मदद दी थी. 

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मालदीव अपनी कई सारी जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया मालदीव का बड़ा फाइनेंसर रहा है. एसबीआई की बदौलत ही मालदीव की अर्थव्यवस्था मजबूत होती गई.

मालदीव की रक्षा जरूरतें भी भारत पर टिकी हैं. दस साल में भारत ने मालदीव के डेढ़ हजार से ज्यादा सैनिकों को ट्रेनिंग दी है. इसके अलावा 2010 और फिर 2013 में भारत ने मालदीव को हेलिकॉप्टर भी गिफ्ट में दिए थे. 2020 में एक छोटा एयरक्राफ्ट भी दिया था.

इसके अलावा, मालदीव का बुनियादी ढांचा विकसित करने में भी भारत ने काफी मदद की है. भारत ने वहां अस्पताल से लेकर क्रिकेट स्टेडियम, ब्रिज, रोड, मस्जिद और कॉलेज तक बनाया है. एक अनुमान के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच भारत ने 1,100 करोड़ रुपये से ज्यादा की मदद की है. 

मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर टिकी है. बड़ी संख्या में भारतीय मालदीव घूमने जाते हैं. इतना ही नहीं, मालदीव और भारत के बीच सालाना 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार भी होता है.

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