साल 2011 में सीरिया में शुरू हुए गृहयुद्ध के बाद लाखों सीरियाई और पड़ोसी मुल्कों से लोग भागकर यूरोप की शरण में आने लगे. तभी यूरोपियन यूनियन ने वादा किया कि वो अपने देशों में लगभग 2 लाख रिफ्यूजियों को रखेगा. ग्रीस, इटली और फ्रांस में उस समय सबसे ज्यादा लोग भरे हुए थे. बाकी देश भी लोगों को स्वीकार करने लगे, सिवाय पोलैंड के. वहां की सरकार को उसकी दक्षिणपंथी सोच के लिए जाना जाता था. उसने बयान दिया कि शरणार्थियों को रखना यानी अपनी ही तबाही के लिए बम फिट कर लेना.
पोलैंड ने सीधा बयान दिया...
यूरोपियन यूनियन के दबाव बनाने पर वहां एक के बाद एक तीन पोल्स कराई गईं, जिससे साबित हो सके कि सरकार ही नहीं, वहां की आबादी भी बाहरी लोगों से डरती है. लगभग तीन चौथाई लोगों ने मुस्लिम और ब्लैक लोगों को अपनाने से मना कर दिया. पोलिश पीपल्स पार्टी के चेयरमैन व्लादिस्लॉ कॉसिनिएक ने कहा- हम अनाथ बच्चों को अपनाएंगे, लेकिन युवाओं को अपने देश के लिए लड़ने दीजिए.
किस हाल में हैं वहां के शरणार्थी मुस्लिम?
फिलहाल पोलैंड की कुल आबादी में 0.13 प्रतिशत ही मुस्लिम हैं. ये पूरे यूरोप में सबसे कम है. यहां पर यहूदी लोग सबसे ज्यादा लगभग 90 प्रतिशत हैं. जो थोड़े-बहुत मुस्लिम शरणार्थी रह रहे हैं, वे भी काफी भेदभाव झेलते हैं. प्यू रिसर्च सेंटर की साल 2016 की रिपोर्ट कहती है कि हर 10 में से 4 पोलिश वयस्क मुसलमानों को अपने देश का हिस्सा नहीं मानता. ऐसे में इस समुदाय के पास न तो ढंग की एजुकेशन है, न ही नौकरी.
पोलैंड में सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, हरेक माइनोरिटी के लिए गुस्सा है. लेकिन ये बात भी है कि मुसलमानों से पोलिश जनता सबसे ज्यादा बिदकती रही. सेंटर फॉर पब्लिक ओपिनियन रिसर्च ने साल 2018 में एक सर्वे कराया, जिसमें 24 अलग-अलग धर्मों के लोगों के बारे में सवाल किया गया कि क्या पोलैंड के लोग उन्हें स्वीकार करेंगे. इसमें लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्हें मुसलमान रिफ्यूजी बिल्कुल नहीं चाहिए.
क्या शुरुआत से ऐसा था?
नहीं. दूसरे वर्ल्ड वॉर से पहले हालात अलग थे. तब देश की 10 प्रतिशत से ज्यादा आबादी यहूदी थी. उनके अलावा यूक्रेन, बेलारूस, जर्मनी और दूसरे देशों के लोग भी रहते थे. पोलिश लोग यानी कैथोलिक ईसाई केवल दो-तिहाई हुआ करते. युद्ध के दौरान समीकरण बदले. यहूदियों का नरसंहार हुआ. बचे-खुचे लोग दूसरे देशों में शरण लेने लगे. इसी दौरान पोलैंड में डेमोग्राफी बदली और कैथोलिक देश का करीब 90 प्रतिशत हो गए. फिर ऐसी राजनैतिक पार्टियां उठने लगीं जो उन्हीं के हितों की बात करतीं. माइनोरिटी राजनीति से बिल्कुल गायब हो गई.
अमेरिका पर टैरर अटैक ने दिया बल
अमेरिका पर साल 2001 में हुए आतंकी हमले के बाद पोलैंड में कई दक्षिणपंथी पार्टियां बनीं. इनका एजेंडा साफ था. वे वादा करती थीं कि देश में मुस्लिम और कलर्ड रिफ्यूजियों को नहीं आने देंगी. साल 2012 में यूरोपियन यूनियन के भारी दबाव के बाद भी पोलैंड ने असाइलम मांगने वाले 99 प्रतिशत आवेदन रिजेक्ट कर दिए. ईयू ने कह रखा था कि पोलिश सरकार सीरिया में परेशान 7 हजार लोगों को पोलैंड भेजेगी, हालांकि ऐसा हो नहीं सका. ईयू बार-बार शेयर द बर्डन यानी भार बांटने की बात करता रहा. वो कहता रहा कि कुछ देशों ने सारे शरणार्थियों को रख रखा है, जिससे वहां की सरकार पर दबाव पड़ रहा है लेकिन इससे पोलैंड पर असर नहीं हुआ.
क्या है एंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट की वजह?
ये देश मुस्लिमों और अफ्रीकन लोगों से क्यों इतना डरता है, इसकी कोई वजह साफ नहीं हो सकी. पोलैंड में कभी भी इस तरह का कोई दंगा नहीं हुआ है, लेकिन पोलिश की राइट-विंग सोच वाली सरकारों का यकीन है कि वे तभी तक बचे हुए हैं, जब तक अपने बॉर्डर से किसी को भीतर न आने दें.यहां तक कि, रूस-यूक्रेन जंग के दौरान लोगों को अपने यहां आने से रोकने के लिए पोलैंड ने बॉर्डर पुलिस की संख्या कई गुनी कर दी. वे आंसू गैस और वॉटर कैनन से घुसपैठियों पर हमले करने लगे.
कितना दबाव बना सकती है यूरोपियन यूनियन?
यूरोपियन यूनियन में शामिल देश शरणार्थियों को लेकर उदार रहे. यूनियन ने एक मेंडेंटरी रिफ्यूजी कोटा स्कीम बनाई. इसके तहत हर देश को अपनी आबादी और जीडीपी के हिसाब से शरणार्थियों की निश्चित संख्या को अपने यहां रखना होगा. हालांकि पोलैंड ने इससे साफ इनकार कर दिया. हंगरी और चेक गणराज्य भी नियत संख्या से काफी कम आबादी को अपने यहां एंट्री देते रहे. इसे लेकर कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ यूरोपियन यूनियन ने तीनों देशों को लताड़ा भी, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ.