तुर्की में आए विनाशकारी भूकंप के बाद राहत के लिए गई एनडीआरएफ की टीम भारत लौट आई है. मुसीबत में मदद के लिए तुर्की ने फिर से भारत का शुक्रिया अदा किया. इसी बीच सोशल मीडिया पर छह तस्वीरों वाला एक पोस्टकार्ड वायरल हो रहा है जिसमें इस बात का जिक्र है कि भारत आपदा में कैसे दूसरे देशों की मदद करता रहा है.
लेकिन इसी पोस्टकार्ड को शेयर करते हुए कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं कि यूपीए की सरकार के समय, 'पीएम मनमोहन सिंह झोली फैला कर विदेशों से मदद मांगते थे.'
जैसे एक ट्विटर यूजर ने इसे शेयर करते हुए लिखा, 'एक वो वक्त था जब UPA का राज था. देश में कोई प्राकृतिक आपदा आती थी तब पीएम मनमोहन सिंह झोली फैला कर विदेशों से मदद मांगते थे. अब ये एक दौर है जब हिन्दुस्थान दुनिया की मदद कर रहा है. ये है नतीजा सनातनियों की सत्ता आने का. गर्व है मोदी जी पे.'
इस पोस्ट का आर्काइव्ड वर्जन यहां देखा जा सकता है.
इंडिया टुडे फैक्ट चेक ने पुराने रिकार्ड्स की जांच करने पर पाया कि भारत आपदा के वक्त दूसरे देशों की मदद लंबे समय से कर रहा है.
जहां तक दूसरे देशों से मदद लेने का सवाल है, साल 2004 में आई सुनामी के समय से ही भारत ने दूसरे देशों से मदद लेना बंद कर दिया था. लेकिन इस नीति को कोराना महामारी के दौरान बदला गया.
कैसे पता लगाई सच्चाई?
कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2004 में सुनामी के बाद, उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था, 'हमें लगता है कि हम हालात से निपटने में सक्षम हैं. अगर जरूरत होगी तब हम मदद लेंगे.'
हालांकि भारत ने उस समय भी रेड क्रॉस जैसे अंतर्रराष्ट्रीय संस्थानों को यहां राहत के कामों के लिए नहीं रोका था.
दूसरे देशों से मदद लेने के बजाय भारत ने सुनामी से प्रभावित श्रीलंका, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों की सहायता की. पड़ोसी देश श्रीलंका को तो भारत ने 25 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद के साथ-साथ मानवीय सहायता भी मुहैया कराई थी.
भारत लगातार करता रहा है मदद
साल 2005 में कश्मीर में आए भीषण भूकंप से भारत और पाकिस्तान दोनों प्रभावित हुए. उस वक्त भी भारत ने किसी देश से सीधी मदद नहीं ली. अलबत्ता उसने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को 25 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देने के के साथ-साथ राहत सामग्री भी पाकिस्तान पहुंचाई.
उसके पांच साल बाद यानि 2010 में पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद भी भारत ने 25 मिलियन डॉलर की मदद का प्रस्ताव दिया.
साल 2010 में ही कैरेबियन देश हैती में आए भूकंप के बाद भारत ने पांच मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मुहैया कराई थी.
साल 2011 में जापान में आई सुनामी और उसके बाद पैदा हुए फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के संकट के दौरान भारत ने राहत सामग्री के अलावा NDRF की एक बड़ी टीम भी जापान भेजी थी.
लेकिन साल 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ के वक्त भी भारत ने किसी दूसरे देश से मदद लेने से इनकार कर दिया था. दूसरे देशों से मदद ना लेने की भारत की ये नीति साल 2014 में मोदी सरकार आने के बाद भी जारी रही.
साल 2018 में केरल मे आई बाढ़ के बाद जब कुछ देशों ने मदद की पेशकश की तो भारत ने धन्यवाद के साथ इनकार कर दिया. केरल की वामपंथी सरकार ने इस फैसले की आलोचना भी की थी.
इसके जवाब में विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि सरकार विदेश से मदद ना लेने वाली पहले से चल रही नीति का पालन कर रही है.
कोराना महामारी के दौरान हुआ बदलाव
साल 2020 में फैली महामारी Covid-19 के दौरान भारत ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए विदेशों से मदद लेना स्वीकार कर लिया. इस दौरान दुनिया के कई देशों ने भारत को दवाइयां और मेडिकल इक्विपमेंट्स मुहैया कराए.