दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ अपने उद्घाटन के कुछ ही दिन बाद फंडिंग को लेकर विवादों के घेरे में आ गई है. सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में दावा किया गया है कि सरदार पटेल की इस मूर्ति के निर्माण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) से कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिल्टी (CSR) के तहत करीब 2,500 करोड़ रुपए हासिल किए गए. इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम को इस वायरल पोस्ट के बारे में जानकारी हिल्दा अब्राहम नामक पाठक ने दी.
सोशल मीडिया में इन दावों की असल में चर्चा है कि PSUs ने मूर्ति के निर्माण पर 2,525 करोड़ रुपए खर्च किए. इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम ने अपनी पड़ताल में पाया कि PSUs ने मूर्ति के निर्माण में योगदान दिया है लेकिन जो रकम बताई जा रही है वो बहुत बढ़ा चढ़ा कर है. इस फंडिंग में सबसे बड़ा योगदान गुजरात सरकार ने दिया. फंडिंग में दूसरे नंबर पर केंद्र सरकार है.
डेविड डिकोस्टा नाम के शख्स ने फेसबुक पेज पर संदेश के जरिए कहा कि ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ प्रोजेक्ट के लिए अधिकतर फंडिंग सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की ओर से की गई. पोस्ट में एक वाक्य में लिखा गया- ‘जब भारत तेल की कीमतें कम करने के लिए एक तरह से चीख रहा है...ऐसे में देखिए कि कैसे हमारे तेल सेक्टर के PSUs किस तरह अपने पैसे को कैसे उड़ा रहा है.’
सोशल मीडिया पर इस संदेश को लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर के एक लेख का हवाला देते हुए शेयर किया जा रहा है. इस लेख में आंकड़ों के जरिए बताया गया है कि सरदार पटेल की मूर्ति का खर्च PSUs उठा रहे हैं.
कुबेर ने 3 नवंबर को मराठी दैनिक लोकसत्ता में लेख में इन आंकड़ों का हवाला दिया.
सोशल मीडिया पर कुछ और पोस्ट में दावा किया गया है कि मूर्ति के निर्माण के लिए चीन से 3,600 करोड़ रुपए का कर्ज लिया गया.
PSUs के योगदान की जानकारी लेने के लिए इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम ने विभिन्न PSUs की वार्षिक रिपोर्ट और बजट पेपर्स को खंगाला.
सरदार पटेल की मूर्ति के प्रोजेक्ट का एलान 7 अक्टूबर 2010 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. लेकिन 2013 में इस प्रोजेक्ट को साकार देने के काम में प्रगति हुई जब सरदार वल्लभ भाई पटेल एकता ट्रस्ट का गठन किया गया.
नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने तो प्रोजेक्ट ने रफ्तार पकड़ी. केंद्र सरकार ने 2014-15 के बजट में इस उद्देश्य के लिए गुजरात सरकार को 200 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की. उसके बाद गुजरात सरकार ने राज्य के बजट में भी मूर्ति के लिए फंड के प्रावधान किए. राज्य के प्रोजेक्ट में योगदान को दर्शाने वाले आंकड़े इस प्रकार हैं.
YEAR | BUDGETARY PROVISION |
2018-19 | Rs 899 Crore |
2016-17 | Rs 1066 Crore |
2015-16 | Rs 915 Crore |
2013-14 | Rs 100 Crore |
इस बीच कुछ PSUs ने भी मूर्ति के लिए योगदान देना शुरू किया जो कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) को रास नहीं आया. CAG ने 2018 के लिए अपनी कम्पलायंस रिपोर्ट में मूर्ति के निर्माण पर CSR फंड की रकम खर्च करने के लिए PSUs को आड़े हाथ लिया. CAG रिपोर्ट में कहा गया कि पांच PSUs ने कुल 146.83 करोड़ रुपए खर्च किए. इन PSUs के नाम हैं- ONGC, IOCL, BPCL, HPCL and OIL.
CAG रिपोर्ट के मुताबिक बीते सालों में पब्लिक सेक्टर ऑयल कंपनियों ने जो योगदान दिया वो इस प्रकार है-
PUBLIC SECTOR UNDERTAKING |
AMOUNT GIVEN UNDER CSR |
OIL & NATURAL GAS CORP LTD | Rs 50 Crore |
INDIAN OIL CORPORATION LTD | Rs 21.83 Crore |
BHARAT PETROLEUM CORP LTD | Rs 25 Crore |
HINDUSTAN PETROLEUM CORP LTD | Rs 25 Crore |
OIL INDIA LIMITED | Rs 25 Crore |
लोकसत्ता के लेख के आधार पर जो दावे किए गए, उनमें प्रोजेक्ट के लिए CSR फंडिंग की कोई समयसीमा का जिक्र नहीं किया गया. ऐसे में उन वर्षों की पुष्टि करना मुश्किल था जिनका वो हवाला दे रहे थे. हालांकि हमने 2015 से इन PSUs की वार्षिक रिपोर्ट्स को देखने का फैसला किया, जिस साल से मूर्ति के निर्माण कार्य ने रफ्तार पकड़ी.
दावों के मुताबिक इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने मूर्ति के लिए 900 करोड़ रुपए दिए. लेकिन IOCL की वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि इसने 2016-17 में सिर्फ 21.83 करोड़ रुपए दिए.
ONGC का जहां तक सवाल है तो दावा किया गया कि इसने मूर्ति के निर्माण के लिए 500 करोड़ दिए. लेकिन वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक ONGC ने अपने CSR फंड से इस प्रोजेक्ट के लिए 50 करोड़ रुपए ही दिए.
वायरल पोस्ट में दावा किया गया था कि तीन कंपनियों- BPCL, OIC और GAIL में से हर एक ने मूर्ति के निर्माण के लिए 250-250 करोड़ रुपए खर्च किए. इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम ने पाया कि BPCL ने 45 करोड़, OIC ने 25 करोड़ और GAIL ने 25 करोड़ खर्च किए. पावर ग्रिड ने 12.5 करोड़ रुपए का योगदान दिया जबकि उसके बारे में 125 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया गया था.
लोकसत्ता के लेख में HPCL के बारे में 250 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया गया था लेकिन 2016-17 की रिपोर्ट में बताया गया कि इसने 25 करोड़ रुपए ही दिए.
दावों में कहा गया कि गुजरात मिनरल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (GMCL), ने प्रोजेक्ट के लिए 100 करोड़ रुपए दिए, लेकिन कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट को हमने खंगाला तो ये राशि 11 करोड़ की ही निकली.
पोस्ट में दावा किया गया कि दो कंपनियों- पेट्रोनेट और बालमेर लॉरी में हरेक ने मूर्ति के प्रोजेक्ट के लिए 50-50 करोड़ रुपए दिए. लेकिन पेट्रोनेट की रिपोर्ट के मुताबिक इस कंपनी ने 5 करोड ही दिए जबकि बालमेर लारी ने दो बार योगदान दिया. 2017-18 में 62 लाख और 2016-17 में 38 लाख रुपए. इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की वित्तीय स्टेटमेंट्स में मूर्ति के लिए किसी फंड का जिक्र नहीं मिला.
इंडिया टुडे ने सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड (SSNNL) के ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप कुमार से प्रोजेक्ट की फंडिंग स्थिति स्पष्ट करने के लिए संपर्क किया. SSNNL को ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के प्रोजेक्ट को साकार रूप देने और इसकी निगरानी रखने की जिम्मेदारी दी गई थी. कुमार के मुताबिक प्रोजेक्ट की लागत 2,362 करोड़ रुपए थी और प्रोजेक्ट की अगले 15 साल तक देखभाल के लिए 650 करोड़ रुपए अतिरिक्त दिए गए. प्रोजेक्ट की लागत में स्मारक, 50 कमरों का होटल और आसपास आधारभूत ढांचे का निर्माण शामिल है.
कुमार ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट के लिए 300 करोड़ रुपए दिए. वहीं केंद्रीय और राज्य PSUs, प्राइवेट कंपनियों और निजी हैसियत से 550 करोड़ रुपए दिए गए. बाकी का सारा खर्च गुजरात सरकार की ओर से उठाया गया.
इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम ने पाया कि ऐसे दावे आंशिक तौर पर सच हैं जिनमें कहा गया कि सरदार पटेल की मूर्ति के लिए PSUs ने खर्च उठाया. PSUs ने निश्चित तौर पर 2,500 करोड़ रुपए नहीं खर्च किए जैसा कि दावा किया गया था. इसके अलावा चीन से कर्ज के तौर पर मूर्ति के लिए फंड आने के दावे भी तथ्यों से कोसों दूर दिखे.