मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में साउथ अफ्रीका से 12 नए चीते आ चुके हैं. इससे पहले पिछले साल सितंबर में नामीबिया से आठ चीते भारत आए थे जिन्हें खुद पीएम मोदी ने कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था.
इसी बीच सोशल मीडिया पर तीन चीतों की एक तस्वीर बड़ी तेजी से वायरल हो रही है. इस तस्वीर मे तीनों चीते आपस सिर जोड़कर इस तरह खड़े हैं जिससे वो भारत के राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ में मौजूद सिंहों की आकृति के जैसे दिख रहे हैं.
इसे शेयर करते हुए कुछ लोग इसे कूनो नेशनल पार्क में मौजूद चीतों की तस्वीर बता रहे हैं.
एक फेसबुक यूजर ने लिखा, 'ये देखो कमाल. एमपी के कुन्हो अभ्यारण से ये ताजा तस्वीर आई है. ये वो चीते हैं जिन्हे मोदी जी नामीबिया से लाए हैं. कैसे भारत के प्रतीक अशोक वाले तीन शेरों की तरह बैठे हैं. गजब की ट्रेनिंग दी गई है. मोदी है तो मुमकिन है.'
इंडिया टुडे फैक्ट चेक ने पाया कि सिर जोड़ कर बैठे तीन चीतों की जो तस्वीर वायरल हो रही है वो भारत के कूनो पार्क की नहीं बल्कि केन्या के चीतों की है. इसे एक ब्रिटिश फोटोग्राफर पॉल गोल्डस्टेन ने केन्या के मासाई मारा नेशनल पार्क में पिछले साल जनवरी में खींचा था.
कैसे पता लगाई सच्चाई?
इस तस्वीर को रिवर्च सर्च करने पर हमें कुछ मीडिया रिपोर्ट्स मिलीं. इनके मुताबिक ये तस्वीर वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर पॉल गोल्ड स्टेन ने केन्या में खींची थी.
पॉल ने इस तस्वीर के साथ इन तीन चीतों की एक और तस्वीर अपने फेसबुक पेज पर 25 जनवरी, 2022 को अपलोड की थी. उनके मुताबिक इस तस्वीर को खींचने के ‘सटीक वक्त’ के लिए उन्हें बारिश में छह घंटे इंतजार करना पड़ा.
नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को एमपी के कूनो पार्क में पीएम मोदी के जन्मदिन यानी 17 सितंबर, 2022 को छोड़ा गया था. जबकि ये तस्वीर उससे पहले से ही इंटरनेट पर मौजूद है.
जाहिर है, केन्या के चीतों की तस्वीर को भारत के कूनो पार्क के चीतों की तस्वीर बताकर पेश किया जा रहा है.
ये तस्वीर भारत में चर्चा का विषय इसलिए भी बन गई है क्योंकि इसमें दिख रहे तीनों चीते कुछ इस तरह बैठे हैं जैसे भारत के राष्ट्रीय प्रतीक में सिर जोड़े हुए तीन सिंहों की आकृति दिखाई देती है. भारत का ये राष्ट्रीय प्रतीक प्राचीन काल के शासक अशोक के स्तंभ से लिया गया है. इसमें चार सिंह सिर जोड़कर खड़े है. हालांकि सामने से देखने पर तीन सिंहों के सिर ही दिखाई देते हैं.
इस स्तंभ को अशोक ने करीब 280 ईसा पूर्व में बनवाया था और ये वाराणसी के सारनाथ संग्रहालय में रखा गया है.