हाल के बरसों में सोशल मीडिया पर फिल्टर्स का इस्तेमाल बहुत आम हो गया है. ये फ़िल्टर्स हमें अपनी तस्वीरों को'परफेक्ट' दिखाने में मदद करते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि ये फिल्टर्स हमारी मानसिक सेहत और शरीर की छवि (बॉडी इमेज) पर क्या असर डालते हैं? आइए, इस विषय पर कुछ रीसर्च और विशेषज्ञों की राय जानते हैं.
मनो वैज्ञानिक डॉ विधि एम पिलनिया कहती हैं कि फिल्टर्स का लगातार इस्तेमाल हमें एक अनरियलिस्टिक ब्यूटी स्टैंडर्ड की ओर धकेलता है. अगर अपनी तस्वीरों को फिल्टर से ही देखने और पसंद करने की लत लग जाती है तो आपको पता भी नहीं चल पाता कि कैसे हमें अपनी असली शक्ल से असंतोष बढ़ने लगता है. अगर किसी ने बिना फिल्टर रियल तस्वीर ले ली तो लोग उसे सोशल मीडिया पर डालने से बचते हैं. यह असंतोष तब और बढ़ जाता है जब सोशल मीडिया में आपकी फैन फॉलोइंग ज्यादा हो या आपको सोशल मीडिया पर रहने का क्रेज हो. डॉ पिलनिया कहती हैं कि टीन एज बच्चों के मामले में एक रिसर्च में देखा गया है कि वो सोशल मीडिया पर अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत जागरूक रहते हैं.
डॉ विधि बताती हैं कि अपनी रियल छवि के प्रति अंसतोष धीरे धीरे इंसान के भीतर आत्म-सम्मान में कमी, एंजाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है.
जानिए- शोध क्या कहते हैं
NCBI में प्रकाशित पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की एक स्टडी में पाया गया कि सोशल मीडिया का कम उपयोग करने वाले व्यक्तियों में अकेलेपन और डिप्रेशन के लक्षणों में कमी देखी गई, जबकि अधिक उपयोग करने वालों में ये लक्षण बढ़े. इसका सीधा अर्थ है कि जिन लोगों ने अपनी कमियों या अच्छाईयों के साथ खुद को रियल वर्ल्ड से जोड़े रखा, उनमें डिप्रेशन के लक्षण घटते दिखे. रियल वर्ल्ड में लोगों से जुड़ने वालों में रील वर्ल्ड में रहने वालों की अपेक्षा अकेलेपन के लक्षण भी कम दिखे.
नींद पर पड़ रहा असर
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार लोगों में अब देर रात तक रील्स देखने का चलन बढ़ा है. देर रात तक फोन का उपयोग नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ सकता है. PubMD में प्रकाशित फोर्टिस हॉस्पिटल के चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. समीर पारेख के अनुसार, सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं, जैसे कि ध्यान की कमी और सामाजिक गतिविधियों में कमी.
ncbi.nlm.nih.gov पर प्रकाशित एक स्टडी में पाया गया कि सोशल मीडिया पर दूसरों की 'परफेक्ट' तस्वीरें देखने से लोग अपनी जिंदगी में असंतुष्ट महसूस करने लगते हैं, जिससे उनमें अवसाद और चिंता बढ़ सकती है. टीन एज बच्चे और युवाओं के मामले में देखा गया है कि वो सोशल मीडिया में दिखाई जा रही तस्वीरों से अपनी रियल लाइफ इमेज से तुलना करना शुरू कर देते हैं. जाने-अनजाने में ये फिल्टर ही हैं जो उनका कॉन्फीडेंस कम कर देते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ सत्यकांत त्रिवेदी (मनोरोग विश्लेषक) कहते हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से लोग वास्तविकता से दूर होकर एक अवास्तविक दुनिया में जीने लगते हैं, जिससे डिप्रेशन, एंजाइटी और खुद को कमतर समझने वाली हीन भावना जैसी समस्याएं बढ़ती हैं. इससे बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं ज्यादा बढ़ी हैं, जैसे कि ध्यान की कमी और सामाजिक गतिविधियों में कमी.
वहीं मनोचिकित्सक डॉ अनिल सिंह शेखावत कहते हैं कि मानसिक समस्याओं को कम करने के बजाय सोशल मीडिया अब इन्हें बढ़ाने का काम कर रहा है. रील बनाकर पैसे कमाने की होड़ में हर कोई रील बनाने में लगा है. यहां खुद को परफेक्ट दिखाने के लिए टीन एज बच्चे माता पिता से पैसे खर्च करके अच्छे कैमरे और सेट अप की डिमांड करते हैं. बच्चे अपने आसपास की दुनिया से जुड़ने के बजाय हर मूमेंट को सोशल मीडिया कंटेंट समझने लगते हैं. यह सब कहीं न कहीं मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालने वाला है.
ज्यादा फिल्टर से बचना जरूरी