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World Cancer Day 2025: आंसू-दर्द-बेआवाज जिंदगी, साल में 25 लाख खर्च... कैंसर रोगी की फैमिली ने बताई आपबीती

कैंसर जिस पर‍िवार में घुस जाए, उसे कंगाल कर देता है. अंतहीन इलाज, ऑपरेशन, कीमो का खर्च तो है ही, साथ ही अपने के खोने का भय भी हर वक्त आंखों के सामने नाचता रहता है. सरकार ने बजट में कैंसर रोग‍ियों के लिए डे केयर खोलने की घोषणा के साथ ही इन मरीजों के पर‍िवारों को नई उम्मीद दी है. आइए- एक पर‍िवार की आपबीती और आंकड़ाें से समझते हैं कि क्यों कैंसर रोग‍ियों के लिए सरकार की मदद जरूरी है.

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कैंसर के बाद मां, दूसरी तस्वीर में बेटी काजल के साथ सुनीता (Photo: aajtak.in/Special Permission)
कैंसर के बाद मां, दूसरी तस्वीर में बेटी काजल के साथ सुनीता (Photo: aajtak.in/Special Permission)

‘फरवरी 2023 में पिता को अचानक हार्ट अटैक में खोने के बाद हम मां का चेहरा देखकर जी रहे थे. लेकिन मार्च 2024 में जब मां का कैंसर थर्ड स्टेज में डिटेक्ट हुआ तो हम मानसिक रूप से टूट गए. चंद महीनों में आर्थिक रूप से भी पूरा परिवार टूट गया.’ कैंसर पीड़िता की बेटी काजल बताते-बताते रो पड़ी. लेकिन ये कहानी सिर्फ काजल की नहीं है. देश में जिस तरह कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ रही है वहां अधिकतर पीड़ितों के परिवार इन्हीं हालात से जूझ रहे हैं.

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अब जबकि शनिवार को आए आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ी 36 दवाओं पर कोई टैक्स नहीं लगाने की घोषणा की है तो उन्हें कुछ राहत मिली है. इसके अलावा अगले 3 साल में देश के सभी जिलों में डे केयर कैंसर सेंटर खोलने का ऐलान भी हुआ है. इसी वित्त वर्ष में 200 ऐसे सेंटर खोल दिए जाएंगे. कैंसर से जूझ रही 50 वर्षीय सुनीता के परिवार के लिए यह बड़ी ही राहत की खबर है. उनकी बेटी काजल कहती हैं कि बीते करीब 10 महीनों में हमने जाना है कि कैंसर से जूझ रहे मरीजों के पर‍िवार इलाज में किस तरह टूट जाते हैं.

काजल बताती हैं कि बीते साल 2023 में मेरे पिता हार्ट अटैक से चल बसे थे. उस दौरान पिता की कमाई पर ही पूरा परिवार चल रहा था. मैं भी छोटी-मोटी नौकरी करती थी. पिता की मौत के बाद मैंने अपनी जॉब छोड़ दी. मैं घर में सबसे बड़ी थी. पिता के बाद मेरी दादी और मेरी मां ही थीं जिन्हें देखकर हमें लगता था कि अभी हम पर बड़ों का साया है. लेकिन पिता के जाने के बाद दादी बीमार रहने लगीं. वो राजस्थान में मेरे गांव में रहती थीं. मेरी मां और एक भाई उनकी सेवा करते थे. बहुत इलाज के बाद भी वहां ठीक नहीं हुईं तो हम उन्हें एम्स में द‍िखाने लाए तो यहां जांच में पता चला कि उन्हें वजाइनल कैंसर है. एम्स में इलाज की लंबी लंबी लाइन लगाना और घंटों बाद नंबर आने के बाद उन्हें डॉक्टर देख पाते थे. वो अस्पताल की इस लंबी प्रक्रि‍या से घबराने लगी थीं. उनकी दवाएं चल रही थीं कि कुछ ही महीने में वो हमारा साथ छोड़ गईं.

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मार्च 2024 में मां को डिटेक्ट हुआ थर्ड स्टेज कैंसर
अभी पिता और दादी की मौत से हम उबर नहीं पाए थे कि बीते साल मार्च में मां के गले में खराश और दर्द रहने लगा. हमने कई बार एक फिजिशियन को द‍िखाया. वहां से दवा लेते तो मां ठीक हो जातीं, लेकिन फिर कुछ दिन में उनका दर्द बढ़ने लगता. इसके बाद हमने कान-नाक-गला व‍िशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाया. डॉक्टर ने हमसे कुछ जांचें कराने को कहा. उन्होंने हमें कैंसर की संभावना जताई. हमने उनकी बायोप्सी और पेप स्मियर टेस्ट वगैरह कराया तो उसमें क्लियर हो गया कि उन्हें गले का कैंसर है, वो भी थर्ड स्टेज...

हम चारों बहन-भाई एकदम टूट गए. काजल कहती हैं कि हम इतना डर गए कि अगर मां को बता दिया तो कहीं उनका भी हार्ट अटैक ही न हो जाए. इसलिए हमने ब‍िना उन्हें बताए इलाज शुरू करा दिया. डॉक्टर ने कहा कि उनका जल्दी ऑपरेशन कराना होगा, कैंसर ऊपर की ओर बढ़ रहा है. उधर, मां की आवाज बिगड़ती जा रही थी. वो कुछ भी खाती-पीतीं तो दर्द बढ़ जाता. उनका खाना पीना छूटने लगा था.

प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराना थी मजबूरी
काजल कहती हैं कि दादी के इलाज के दौरान हमने देख लिया था कि क‍िस तरह एम्स या किसी सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए लंबी लाइनें हैं. हमने तब तय किया कि पापा की जो भी जमा पूंजी है और मेडिकल बीमा से जो भी मदद हो सके. हम इनका इलाज प्राइवेट अस्पताल से कराएंगे. हमने फिर एक नामी अस्पताल में 10 लाख रुपये में मां का ऑपरेशन कराया. खैर, वहां के डॉक्टर ने यह कहकर राहत दी थी कि कैंसर ऊपर की ओर नहीं बढ़ रहा.

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ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने मां के नाक से एक ट्यूब डाल दी. महीनों से हम उसी से मां को कभी मूंग की दाल का पानी और दलिया का पानी दे देते हैं. अभी तक उनकी 33 कीमोथेरेपी हो चुकी हैं. हमने दवाओं, जांचों तो कभी नर्स के खर्च में अब तक करीब 25 लाख रुपये लगा द‍िए हैं. अब हमारे पास कुछ नहीं बचा. हमने कई महीनों पहले से ही द‍िल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट से कीमो थेरेपी कराना शुरू करा दिया था. दोनों भाई और बहन प्राइवेट जॉब करते हैं और मैं अकेले मां की देखभाल करती हूं. मैंने दूसरी जॉब जॉइन भी नहीं की ताकि मां की सेवा कर सकूं. मां का वजन अब 42 से घटकर 32 किलोग्राम हो चुका है. डॉक्टर कहते हैं कि अब नाक से हटाकर ट्यूब पेट में लगानी होगी, वरना संक्रमण की संभावना है. मां अभी भी मुंह से नहीं खा पाती हैं. काजल कहती हैं कि मैंने अपने पर‍िवार को इस संकट में देखकर महसूस किया है कि किस तरह कैंसर मरीजों के पर‍िवारों को भी तोड़कर रख देता है.

द‍िल्ली के जाने-माने कैंसर रोग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त में बताया कि गरीब पर‍िवारों के लिए कैंसर का इलाज बहुत मुश्किपल होता है. मुंबई में डे-केयर की शुरुआत हो चुकी है. इन डे केयर में कीमो का खर्च 6 से 7 हजार रुपये आ जाता है, वहीं किसी नामी प्राइवेट अस्पताल में इसका खर्च 25 हजार या उससे ज्यादा होता है. इसके अलावा कैंसर की दवाओं में भी सब्सि5डी मिलना बहुत जरूरी था. कैंसर की बीमारी लगातार देश में बढ़ रही है,सरकार को इसके इलाज के लिए जिला स्तर पर काम करने से ही जमीनी स्तर पर मरीजों को मदद मिल सकती है.

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