कहते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के सवाल पर लड़ा जाएगा. वह युद्ध तो अभी दूर है लेकिन मध्य प्रदेश में पानी के वितरण को निजी हाथों में सौंपने की पहली योजना को लेकर खंडवा में जंग जरूर छिड़ गई है. नर्मदा का पानी अब भी नर्मदा में ही है. लेकिन पानी के नलों तक पहुंचने से पहले ही आरोपों की बरसात तेज हो गई है.
पानी के संकट से जूझ्ते खंडवा में पेयजल मुहैया कराने की जिम्मेदारी यों तो नगर निगम को उठानी थी, लेकिन उसने राज्य में पानी के निजीकरण की नींव डालते हुए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी ) योजना के तहत एक कंपनी विशेष को सारी जिम्मेदारी दे दी है.
खास बात यह है कि जिस पीपीपी मॉडल को आधार बनाया गया है, उसमें निजी कंपनी की अंश पूंजी 51 फीसदी या अधिक होनी चाहिए. लेकिन निगम ने महज 10 फीसदी के अंशदान पर ही हैदराबाद की कंपनी विश्वा युटिलिटी प्राइवेट लिमिटेड को सौ फीसदी (106.72 करोड़ रु.) का मालिक बना दिया, वह भी महज पांच करोड़ रु. की बैंक गारंटी पर.
कंपनी के उपाध्यक्ष प्रमोद कुमार सिन्हा का कहना है कि कंपनी समझौते की शर्तों के मुताबिक ही काम कर रही है. लेकिन 10 फीसदी में सौ फीसदी का अधिकार मिलने के सवाल पर सिन्हा कहते हैं, ''यह शासन ने ही तय किया है, कंपनी की इसमें कोई भूमिका नहीं है और जल कर की दरें भी निगम ने ही तय की हैं.''
कंपनी पर शासन की मेहरबानी से जनता में रोष है. इसके लिए भी निगम ही जिम्मेदार है, जिसने खंडवा में पानी की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद परंपरागत जल स्त्रोतों की उपेक्षा की और पैसों की कमी का बहाना बनाकर टूटी-फूटी पाइपलाइनों तक को नहीं सुधारा. नर्मदा जल के सपने दिखाकर लघु-मध्यम शहरी ढांचागत विकास योजना (यूआइडीएसएसएमटी) के तहत निगम ने 106.72 करोड़ रु. की योजना बना डाली, जिसमें केंद्र सरकार ने 80 और राज्य ने 10 फीसदी का अनुदान मंजूर किया.
इसके बाद बाकी 10 फीसदी यानी 10. 67 करोड़ रु. निगम को देने थे, लेकिन उसने इसके लिए पीपीपी का सहारा लिया और समूची योजना विश्वा युटिलिटी के हवाले कर पल्ला झड़ लिया. निगम के पूर्व महापौर ताराचंद अग्रवाल योजना पर सवाल उठाते हैं, ''यह काम निगम महज 25-30 करोड़ रु. में कर सकता था.''
अब विश्वा युटिलिटी अगले 23 साल तक मौजूदा से 7-8 गुना ज्यादा जल कर वसूलेगी. नगर निगम आयुक्त दिलीप कापसे कहते हैं कि नर्मदा जल की दरों का निर्धारण हो गया है.
राज्य कांग्रेस कमेटी के सदस्य अजय ओझ आरोप लगाते हैं, ''खंडवा की महापौर भावना विजय शाह के पति और प्रदेश के आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह ने निगम प्रशासन को इस बात के निर्देश दिए कि कंपनी को काम के लिए तीन करोड़ रु. का अग्रिम भुगतान किया जाए. इसकी तस्दीक निगम की नोटशीट से की जा सकती है.'' निगम के तत्कालीन आयुक्त सुरेश बेलिया और नर्मदा जल योजना के नोडल अधिकारी चंद्रशेखर मिश्र के हस्ताक्षर वाली इस नोटशीट में विजय शाह के उस निर्देश का जिक्र है जिसमें उन्होंने कंपनी को 3 करोड़ रु. की राशि का भुगतान करने को कहा है.
इस पर ओझा सवाल उठाते हैं, ''आखिर किस हैसियत से मंत्री ने निगम प्रशासन पर कंपनी को भुगतान का दबाव बनाया और नियमों के विपरीत जाकर ऐसा करने के पीछे क्या वजह थी?''
निजी कंपनी पर निगम की मेहरबानी के खिलाफ ओझ ने केंद्र सरकार से शिकायत भी की, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि नियम-कायदों को ताक पर रखकर विश्वा युटिलिटी को फायदा पहुंचाया गया. केंद्र ने गंभीर अनियमितताओं की वजह से स्वीकृत राशि की दूसरी किस्त (42 करोड़ रु.) रोक दी तब कंपनी ने एस्क्रो अकाउंट खुलवाकर कुछ राशि जमा की.
हालांकि नर्मदा जल योजना पर हो रहे व्यापक विरोध से आहत महापौर जनता और मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहती हैं, वे कहती हैं, ''अभी मैं देख रही हूं कि इस योजना को लेकर कितना भ्रम और किस स्तर पर फैलाया जा रहा है. मैं वक्त आने पर बोलूंगी.'' वैसे विजय शाह सेहत खराब होने की दलील देकर मामले पर टिप्पणी से बच रहे हैं. इस योजना पर विपक्ष के साथ-साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता जगन्नाथ माने भी सवाल खड़ा कर रहे हैं. माने कहते हैं, ''कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए नागरिकों के हितों की बलि चढ़ाई गई है.''
मार्च माह में नागपुर में आयोजित प्रतिनिधि सभा में संघ परिवार भी देश भर में पेयजल के निजीकरण के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर चुका है. इसमें कहा गया है कि पानी का लागत मूल्य वसूलना भी गरीबों के साथ अन्याय होगा.
मामले में नया मोड़ योजना के तहत बिछाई जा रही पाइपलाइनों को लेकर है. विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के मुताबिक 750 मिमी व्यास की 52 किमी लंबी डीआइ (डक्टाइल आयरन) पाइपलाइन बिछानी थी, जिसके बदले में जीआरपी (ग्लास रीइन्फोर्स्ड पाइप्स) का इस्तेमाल हुआ, जिसकी कीमत और उम्र डीआइ पाइप के मुकाबले 30-40 फीसदी कम होती है. 106.72 करोड़ रु. की इस योजना में सिर्फ पाइपलाइन बिछाने पर ही 71 करोड़ रु. खर्च होने हैं और इसी में सबसे ज्यादा गड़बड़ी देखने को मिल रही है.
बगल के देवास जिले में भी डीआइ की जगह जीआरपी पाइप का इस्तेमाल हुआ था. देवास इंडस्ट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक खंडेलिया कहते हैं, ''पाइप के बदले जाने से पानी छोड़ते ही जीआरपी पाइप जगह-जगह से फटने लगा और जिस पाइपलाइन से 30 एमएलडी पानी आना था, उससे कभी भी 5-6 एमएलडी पानी नहीं मिला और आज भी देवास के उद्योग पानी को तरस रहे हैं.''
पाइप के मामले पर कंपनी का कहना है, ''आने वाले 23 वर्षों तक जल प्रदाय का जिम्मा कंपनी का है और कोई भी दिक्कत आती है तो कंपनी की जवाबदेही होगी.'' निगम आयुक्त दिलीप कापसे कहते हैं, ''शासन की स्वीकृति से पाइप बदला गया क्योंकि जीआरपी पाइप की कीमत डीआइ के मुकाबले काफी कम है.'' यह बचत कंपनी के खाते में जाएगी या शासन के, इस पर कापसे चुप्पी साध लेते हैं.
हालांकि निगम में विपक्ष के नेता रमेश सुनगत कहते हैं, ''यह योजना भ्रष्टाचार में डूबी है. चारखेड़ा में नर्मदा जल संयंत्र का निर्माण पिछले साल सितंबर में पूरा हो जाना था. पाइपलाइन तो बिछी नहीं, पूरे शहर को खोद जरूर दिया गया है.''
अब शहर की सड़कें बनवाने की जिम्मेदारी भी निगम की ही है क्योंकि निविदा शर्तों के मुताबिक सड़क खोदने पर हर्जाने का कोई प्रावधान नहीं है. पूरी व्यवस्था कंपनी के हाथ में आते ही जिस निगम से डेढ़ से दो करोड़ रु. के जल कर की मांग रहती है, वह बढ़कर 15 करोड़ रु. हो जाएगा. जबकि निगम का कुल बजट ही 20 करोड़ रु. का है. कंपनी की शर्त यह भी है कि अगर शहर से इस कर की वसूली नहीं हो पाई तो उसकी भरपाई निगम करेगा.
खंडवा की पानी की आपूर्ति पूरी तरह से कंपनी के अधिकार में आ जाएगी. निगम आयुक्त कापसे का कहना है, ''इस योजना के शुरू होते ही तमाम नलकूपों से जल प्रदाय बंद कर दिया जाएगा. साथ ही नागचून तालाब और सुक्ता जलाशय जो प्रमुख जल प्रदाय केंद्र हैं से जल वितरण बंद होगा. पूरे शहर में कंपनी द्वारा नर्मदा के जल का ही वितरण होगा.'' इस योजना के शुरू होते ही निगम का जल विभाग बंद हो जाएगा जिसके स्टाफ को अन्यत्र उपयोग किया जाएगा.
प्रदेश में यूआइडीएसएसएमटी योजना के तहत 33 शहरों में 762 करोड़ रु. की कुल 35 योजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनमें से 31 शहरों की 587 करोड़ रु. की योजनाएं पानी से जुड़ी हैं. राज्य सरकार ने खंडवा की गलतियों से सबक नहीं लिया, तो बाकी शहरों में भी असंतोष सिर उठा सकता है.