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कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान, गंगा, बूढ़ी गंडक, सरयू, पुनपुन, महानंदा, सोन, लखनदेई, अवधारा, फाल्गू... ये वो नदियां हैं जो बिहार में जितनी खुशहाली नहीं लातीं उससे ज्यादा तबाही का कारण हर साल बन जाती हैं. बिहार में बाढ़ (Bihar flood) एक ऐसी कहानी बन चुकी है जिसके हालात में साल दर साल कभी कोई सुधार होता नहीं दिखा. जब भी मॉनसून (Monsoon) का मौसम आता है देश के बाकी हिस्सों में बरसात फसलों और खेती के लिए खुशहाली का आलम होता है लेकिन बिहार में तबाही का. साल दर साल कई प्लान बने, कई बजटीय आवंटन हुए लेकिन जमीनी हालात जस के तस हैं.
भारत दुनिया में बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से है. दुनिया भर में बाढ़ से जितनी मौतें होती हैं, उसका पांचवा हिस्सा भारत में होता है. देश की कुल भूमि का आठवां हिस्सा यानी तकरीबन चार करोड़ हेक्टेयर इलाका ऐसा है जहां बाढ़ आने का अंदेशा बना रहता है. पूरे देश में बाढ़ के एक जैसे हालात हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो 1952 से 2018 के 65 सालों में देश में बाढ़ से एक लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. 8 करोड़ से अधिक मकानों को नुकसान पहुंचा जबकि 4.69 ट्रिलियन से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ.
बिहार में तबाही का आलम क्या?
वैसे तो असम, बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश समेत कई राज्य बाढ़ की तबाही हर साल झेलते हैं लेकिन बिहार में हालात सबसे ज्यादा गंभीर है. बिहार के करीब 74 फीसदी इलाके और 76 फीसदी आबादी बाढ़ की जद में हमेशा रहती है. खासकर उत्तरी बिहार में रहने वाले इलाके बाढ़ के खतरे के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं और इसका कारण है नेपाल से आने वाली नदियां, जिनकी उत्पति हिमालय की वादियों में होती हैं और ढलान के कारण पानी हर साल तेज रफ्तार में बिहार की ओर आ जाता है. तमाम उपायों के बाद भी इसे रोका नहीं जा सका है. राज्य के 38 में 28 जिले हर साल बाढ़ की विभीषिका को झेलते हैं.
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प्रभावित इलाकों के लोगों की कैसी है जिंदगी?
इस साल अभी मॉनसून पूरी तरह आया भी नहीं और बिहार की सभी नदियां फिर से उफान पर हैं. इनमें से अधिकांश नदियां नेपाल से आती हैं और वहां भारी बारिश और बिहार में हुई बारिश ने नदियों के पानी को बेकाबू कर दिया है. कहीं तटबंध से ऊपर बहकर पानी रिहाइशी इलाकों में घुस गया है तो कहीं सड़क तो कहीं रेल ट्रैक, मकान सब पानी में डूबे हुए हैं.
उत्तर बिहार के इलाकों में नेपाल से आने वाली प्रमुख नदियां कोसी, महानंदा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती बाढ़ का कारण बनती हैं तो दक्षिण बिहार के इलाकों में सोन, पुनपुन और फाल्गू जैसी नदियां. दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी, सहरसा, सारण, गोपालगंज और आसपास के जिले बिहार में बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से हैं.
पिछले साल की तबाही अभी भूले नहीं हैं लोग
बिहार के लिए मॉनसून (Monsoon) के मौसम में हर साल ऐसे ही हालात रहते हैं. यहां हर साल मॉनसून के मौसम में पानी में डूबे मकान-सड़क-रेल ट्रैक और हाईवे और ऊंचे इलाकों में बाढ़ पीड़ितों के लगे कैंप, सड़क किनारे शरण लिए हुए परिवार और राहत शिविरों का नजारा आम है. राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक पिछले साल बिहार के 16 जिलों में बाढ़ के हालात बने. 1333 गांव पानी में डूबे और 85 लाख के करीब लोग प्रभावित हुए. कई लोगों की जान चली गई तो हजारों मकान इस बाढ़ में तबाह हो गए. हजारों एकड़ खेत में खड़ी धान और गन्ने की फसल बर्बाद हो गई. अभी लोग पिछले साल की तबाही से उबर ही रहे थे कि नया मॉनसून और नई तबाही फिर दस्तक देने लगी है.
मुआवजे और राहत कार्यों का गणित!
हर साल बाढ़ आती है, प्रभावित इलाकों में सरकार राहत शिविर लगाती है, खाने-पीने के सामान बांटे जाते हैं और फिर मुआवजे बांटने की सरकारी प्रक्रिया चलती रहती है. अगले साल फिर यही हाल होता है और फिर वही प्रक्रिया दोहराई जाती है. बिहार सरकार के आंकड़ों को देखें तो पिछले साल एक लाख प्रभावितों के खाते में 6-6 हजार की मुआवजा राशि भेजी गई. साल 2017 में बिहार सरकार ने 2385 करोड़ और 2019 में 2000 करोड़ का मुआवजा बाढ़ पीड़ितों में बांटा. लेकिन जिनके घर-बार बह गए, फसलें बर्बाद हो गईं, सारी गृहस्ती तबाह हो गई उन्हें 6 हजार रुपये की राशि से कितनी राहत मिल सकेगी भला?
क्या कदम उठाए जा रहे?
वर्ष 1953 में बिहार में भयंकर बाढ़ आई थी. उसके बाद बाढ़ के पानी को रोकने के लिए 1954 में कई कदम उठाए गए. तटबंधों को बाढ़ नियंत्रण का मुख्य जरिया मानकर प्लान शुरू किया गया था. तब राज्य में कुल 160 किलोमीटर इलाके में तटबंध बने थे और बाढ़ प्रभावित कुल इलाकों का आकलन था 25 लाख हेक्टेयर इलाका. तब से अबतक राज्य में 13 नदियों पर 3790 किलोमीटर एरिया में तटबंध बनाए जा चुके हैं. इनके निर्माण, मरम्मत, रखरखाव पर हर साल औसतन 156 करोड़ से अधिक का खर्च आता है लेकिन बाढ़ के हालात में कोई बदलाव नहीं देखने को मिला. उल्टे इन सात दशकों में बिहार में बाढ़ के खतरे वाला इलाका बढ़कर 68 लाख हेक्टेयर हो गया है क्योंकि नदियों का लगातार विस्तार हो रहा है.
जमीन पर कारगर नहीं उपाय
लगातार मरम्मत के काम और रखरखाव के खर्च के बावजूद हर साल जगह-जगह तटबंध टूट जाते हैं और आसपास के इलाकों में बसे लोगों का सबकुछ बहा ले जाती है बाढ़. बिहार के जल संसाधन विभाग की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक विभिन्न नदियों पर बने तटबंधों में पिछले तीन दशकों में 400 से अधिक दरारें आईं और बाढ़ का कारण बनीं. हर साल फिर करोड़ों लगाकर इनकी मरम्मत होती है लेकिन फिर मॉनसून आते ही हालात जस के तस हो जाते हैं. एक्सपर्ट और बिहार की सरकार भी मानती है कि तटबंधों का निर्माण बाढ़ का टेंपररी समाधान ही है. लेकिन इसके आगे कोई ठोस प्लान नहीं दिखता. 2008 के कोसी फ्लड के वक्त की भारी तबाही के बाद भी तमाम वादे किए गए. मास्टरप्लान, टास्क फोर्स बनाई गई. हर चुनाव में बाढ़ नियंत्रण के बड़े उपायों के वादे होते हैं लेकिन हालात तब भी जस के तस हैं.
दशकों से है समाधान का इंतजार
लगातार बन रहे इन तटबंधों का हाल ये है कि इनसे नदी का पानी एक जगह पर रोका जाता है तो दूसरे इलाकों में घुस जाता है और तबाही नए इलाकों में होने लगती है. प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोग साल के तीन महीने को बाढ़ वाले महीने मानकर ही चलते हैं. कई इलाकों में तो लोगों ने आने-जाने के लिए नाव तक खरीदकर रखा हुआ है ताकि बाढ़ के दौरान जरूरी कामकाज के लिए आ जा सकें. खरीफ के सीजन में खेती करना भी कम जोखिमभरा नहीं है इन इलाकों में. क्योंकि हर साल फसल बाढ़ में बर्बाद ही हो जाती है. हर साल सबकुछ गंवाने वाले लोगों को बाढ़ की इस समस्या के स्थायी समाधान का इंतजार दशकों से है.
इस आपदा का हल क्या है?
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ से निजात कैसे मिले? जनता और सरकार सबको यही जवाब चाहिए? क्या लगातार तटबंधों और बांधों के बनने से इसका हल हुआ है? नहीं, एक्सपर्ट इससे इत्तेफाक नहीं रखते. आईआईटी कानपुर की एक स्टडी रिपोर्ट में तटबंधों को बाढ़ का अस्थायी समाधान ही माना गया है. जल संसाधन पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट मानते हैं कि नेपाल से सटे होने और नदियों की तलहट्टी में बसे होने के कारण यहां की भौगोलिक स्थिति में बाढ़ को टाला नहीं जा सकता. बल्कि बेहतर प्रबंधन से लोगों को हो रहे नुकसान में कमी जरूर लाई जा सकती है. छोटे-छोटे नहर बनाकर कम प्रभाव वाले इलाकों में पानी को डायवर्ट किया जा सकता है. इसके अलावा बड़े जलाशयों का निर्माण कर पानी को संरक्षित किया जा सकता है. इससे जहां ज्यादा इलाकों में सिंचाई की जरूरत पूरी की जा सकती है वहीं सूखे वाले इलाकों में पानी मुहैया कराया जा सकता है. साथ ही पीने के पानी के बढ़ते संकट को भी कम किया जा सकता है.