बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को एनडीए सरकार का गठन कर लिया है, जिसमें 14 मंत्रियों को शामिल किया है. नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में जेडीयू के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी और विकास इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी ऐसे मंत्री हैं, जो फिलहाल विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं है. ऐसे में इन दोनों नेताओं को छह महीने के अंदर विधानसभा या फिर विधान परिषद का सदस्य बनना होगा.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ 14 मंत्रियों को बिहार के राज्यपाल फागू चौहान ने सोमवार को शपथ दिलाई. इनमें से 7 नेता बीजेपी कोटे और 5 नेता जेडीयू खेमे से मंत्री बने हैं, जबकि HAM और वीआईपी से एक-एक मंत्री बनाए गए हैं. इन 14 मंत्रियों में बीजेपी के मंगल पांडेय और HAM के संतोष मांझी विधान परिषद सदस्य हैं जबकि जेडीयू के अशोक चौधरी और वीआईपी के अध्यक्ष मुकेश सहनी विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं है.
वहीं, नीतीश कैबिनेट के बाकी 10 मंत्री विधानसभा चुनाव जीतकर आए हैं. हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद भी विधान परिषद सदस्य हैं. ऐसे में अशोक चौधरी और मुकेश सहनी को अपनी पद की कुर्सी को बचाए रखने के लिए विधानमंडल का सदस्य बनना होगा, क्योंकि संविधान की धारा 164 (4) के अनुसार मंत्री पद की शपथ लेने के 6 माह के अंदर विधानमंडल का सदस्य होना अनिवार्य है.
अशोक चौधरी
जेडीयू के बिहार के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी को एक बार फिर नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट में जगह दी है. अशोक चौधरी ने मार्च 2018 में कांग्रेस को छोड़कर जेडीयू का दामन थामा था, जिसके बाद नीतीश ने उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी थी. वो एमएलसी थे और कार्यकाल 6 मई 2020 को पूरा हो गया था, जिसके चलते चुनाव नतीजे से पहले उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. अब दोबारा से नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है, लेकिन मौजूदा समय में वो बिहार के किसी भी सदन से सदस्य नहीं हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि राज्यपाल कोटे से नीतीश कुमार उन्हें एमएलसी के लिए मनोनीत कर सकते हैं.
मुकेश सहनी
विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी को भी कैबिनेट में जगह दी गई है. मुकेश सहनी पहली बार मंत्री बने हैं और नीतीश सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री हैं. मौजूदा समय में किसी भी सदन के मुकेश सहनी सदस्य नहीं हैं. सिमरी बख्तियारपुर विधानसभा सीट वो अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे, लेकिन अपनी सीट वो जीत नहीं सके. ऐसे में उनके पास विधान परिषद सदस्य बनने का विकल्प बचता है.
बीजेपी ने बिहार में मुकेश सहनी की पार्टी को 11 सीटें दी थी, जिनमें से चार सीटों पर उनके प्रत्याशी को जीत मिली है. इसके अलावा बीजेपी ने उन्हें एक एमएलसी सीट देने का वादा किया था. ऐसे में माना जा रहा है कि मुकेश सहनी को बीजेपी विधान परिषद भेज सकती है. माना जा रहा है कि राज्यपाल कोटे से उन्हें एमएलसी के लिए मनोनीत किया जा सकता है.
बता दें कि बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुने हुए केवल छह महीने तक ही कोई मंत्री पद पर बना रह सकता है. ऐसे में उसे 6 महीने के अंदर विधानसभा या फिर विधान परिषद सदस्य के लिए चुना जाना जरूरी है. बिहार में विधान परिषद और विधानसभा दोनों ही विकल्प हैं. ऐसे में इन दोनों सदनों में से किसी एक सदन का सदस्य होना लाजमी है.
बिहार में 12 राज्यपाल कोटे की 12 विधान परिषद की सीटें रिक्त हैं. नीतीश सरकार के हाथ में है कि इन सीटों पर किन नामों को मनोनीत करने के लिए भेजते हैं. हालांकि, संविधान के जानकार सुभाष कश्यप के मुताबिक संविधान का आर्टिकल 171 राज्य विधायिका की संरचना के बारे में बताता है. संविधान के आर्टिकल 171(3) (e) के मुताबिक़, राज्यपाल को विधान परिषद के कुछ सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार होता है. आर्टिकल 171(5) के मुताबिक ऐसे किसी भी शख़्स जिनके पास साहित्य, कला, विज्ञान, सहभागिता आंदोलन या सामाजिक कार्यों में विशेष ज्ञान हो या इनका ज़मीनी अनुभव हो, तो उसे राज्यपाल विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर सकते हैं.