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छात्रों का सवाल- गरीबी से 10% आरक्षण मिला तो नौकरी के लिए उम्र और पढ़ाई के लिए फीस में छूट क्यों नहीं?

छात्र अमित कुमार ने कहा, 'हम लोगों को गरीबी के आधार पर कॉलेज में दाखिला तो मिला है मगर हम लोगों को फीस इतनी ही देनी पड़ती है जितना सामान्य वर्ग के छात्र देते हैं. हमें भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरफ फीस में में भी छूट मिलनी चाहिए.'

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बिहार में आरक्षण से दाखिला तो पा लिया लेकिन फीस में छूट क्यों नहीं
बिहार में आरक्षण से दाखिला तो पा लिया लेकिन फीस में छूट क्यों नहीं
स्टोरी हाइलाइट्स
  • OBS, SC-ST छात्रों की तरह उम्र सीमा में छूट क्यों नहीं
  • दाखिले के दौरान आरक्षण का लाभ मिला, लेकिन फीस में नहीं
  • आर्थिक रूप से कमजोर होने का सर्टिफिकेट बनवाने में भी संघर्ष

केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव (2019) से पहले सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था बनाई थी मगर ढाई साल के बाद सामान्य वर्ग के छात्र इस व्यवस्था से पूर्ण रूप से संतुष्ट नजर नहीं हैं. छात्रों का कहना है कि दाखिला अगर आरक्षण कोटे से मिला तो फीस और उम्र सीमा में भी छूट मिलनी चाहिए.

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24 वर्षीय अमित कुमार पटना विश्वविद्यालय से पुरातत्व में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं. पिछले साल अमित को पटना विश्वविद्यालय में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर कैटिगरी को 10% आरक्षण कोटे से दाखिला तो मिल गया मगर उनकी इस बात को लेकर शिकायत है कि ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को जिस तरीके से किसी सरकारी नौकरी में आवेदन करने के लिए 3 से 7 साल तक की उम्र में छूट मिलती है वैसा उन्हें क्यों नहीं मिल रही?

अमित कुमार ने कहा, 'सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को कॉलेजों के दाखिले में आरक्षण का फायदा तो मिला है मगर आरक्षण का स्वरूप ठीक नहीं है. एक तरफ जहां ओबीसी छात्रों को उम्र में 3 साल, अनुसूचित जाति को 5 साल और अनुसूचित जनजाति को 7 साल की छूट मिलती है तो वहीं सवर्ण समाज के छात्रों को कोई छूट नहीं मिलती है. आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण हम लोगों ने भी देर से पढ़ाई शुरू की और इसी आधार पर हमें दाखिला भी मिला और हमें उम्र में छूट मिलनी चाहिए.'

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'फीस में भी तो लाभ मिले'
अमित कुमार ने यह भी बात उठाई कि जब उनके परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उन्हें 10% आरक्षण मिला है तो फिर उनके कॉलेज की फीस सामान्य छात्रों की ही तरह क्यों है और उसमें उन्हें ओबीसी या फिर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के छात्रों की तरह छूट क्यों नहीं मिलती है?'

अमित कुमार ने कहा, 'हम लोगों को गरीबी के आधार पर कॉलेज में दाखिला तो मिला है मगर हम लोगों को फीस इतनी ही देनी पड़ती है जितना सामान्य वर्ग के छात्र देते हैं. हम लोगों को आर्थिक आधार पर आरक्षण मिला है तो हमें भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरह इसमें भी छूट मिलनी चाहिए.' 

'दाखिले में छूट, लेकिन फीस में नहीं'
सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए लाई गई 10% आरक्षण की जमीनी हकीकत क्या है इसकी पड़ताल करने के लिए आजतक की टीम गुरुवार को ग्रामीण पटना के मनेर चर्च गांव पहुंची जो कि एक राजपूत बहुल गांव है. 

23 वर्षीय आदर्श कुमार भी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद फिलहाल पटना से ही B.Ed की पढ़ाई कर रहे. हैं. आदर्श ने भी B.Ed की पढ़ाई के लिए पटना के कॉलेज में दाखिला 10% आरक्षण के जरिए प्राप्त किया. आदर्श बताते हैं कि जब उन्होंने बीएड की पढ़ाई करने के लिए कॉलेज में दाखिला लिया तो उसकी फीस 2 साल में ₹1 लाख 60 हजार है जो कि एक सामान्य वर्ग के छात्र की फीस है.

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आदर्श कुमार ने कहा, 'कॉलेज में 2 साल में मुझे जितनी फीस लग रही है उतना ही एक सामान्य वर्ग के छात्र को भी लग रही है तो फिर मुझे आरक्षण का क्या फायदा मिला? हम लोगों को भी सरकारी नौकरी में आवेदन करने के लिए 1 या 2 साल की उम्र में छूट मिलनी चाहिए.'

आदर्श बताते हैं कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर होने का सर्टिफिकेट बनवाने के लिए उन लोगों को सरकारी लालफीताशाही भी झेलनी पड़ती है. 

 

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