सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को शराबबंदी से जुड़े मुकदमों पर झटका दिया है. देश की सर्वोच्च अदालत ने बिहार में शराबबंदी के कड़े कानून के तहत आरोपियों को अग्रिम और नियमित जमानत देने को चुनौती देने वाली अपीलें यह कहते हुए खारिज कर दी कि पटना हाईकोर्ट के 14-15 जज पहले से ही ऐसे मामलों की सुनवाई कर रहे हैं.
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने बिहार सरकार की ये दलील खारिज कर दी कि आरोपियों से जब्त की गई शराब की बड़ी खेप को ध्यान में रखते हुए तर्कसंगत जमानत आदेश पारित किए जाने चाहिए. ऐसे आदेश देने के लिए भी दिशानिर्देश तैयार किए जाएं. कोर्ट ने कहा, सिर्फ इन कानूनों से जुड़े मुकदमों ने अदालतों की नाक में दम कर रखा है. कई जज और पीठ दिन भर में कोई और मामला सुन ही नहीं पा रहे हैं.
CJI ने कहा कि 'आप जानते हैं कि आपके इस बिहार मद्य निषेध और उत्पाद शुल्क अधिनियम, 2016 ने पटना उच्च न्यायालय के कामकाज पर कितना प्रभाव डाला है? वहां दूसरे अपराधों से जुड़े एक मामले को भी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने में एक साल तक लग रहा है क्योंकि सभी अदालतें तो शराब निषेध कानून के उल्लंघन में पकड़े गए आरोपियों की जमानत याचिकाओं से ही भरी हुई हैं.' जस्टिस रमणा ने इस कानून के तहत गिरफ्तार लोगों की अग्रिम और नियमित जमानत के मामलों के खिलाफ राज्य सरकार की 40 अपीलें खारिज कर दी.
14-15 न्यायाधीश रोजाना कर रहे हैं सुनवाई
जस्टिस रमणा ने कहा कि मुझे ये भी बताया गया है कि पटना हाईकोर्ट के 14-15 न्यायाधीश हर दिन इन जमानत मामलों की ही सुनवाई कर रहे हैं. उनकी अदालत में कोई अन्य मामला आ ही नहीं पा रहा है. मुख्य न्यायाधीश ने बिहार में शराबबंदी जैसे कानून का उदाहरण अदूरदर्शिता के तौर पर दिया था. कुछ दिन पहले ही चीफ जस्टिस ने कहा था कि देश की अदालतों में मुकदमों का अंबार लग जाता है.
इसका कारण कुछ कानून का मसौदा तैयार करने में दूरदर्शिता की कमी होती है. उदाहरण के लिए बिहार मद्यनिषेध अधिनियम 2016 की शुरुआत के चलते हाई कोर्ट में जमानत के आवेदनों की भरमार हो गई. इसकी वजह से एक साधारण जमानत अर्जी के निपटारे में एक साल का समय लग जाता है. बिना ठोस विचार के लागू कानून मुकदमेबाजी की ओर ले जाते हैं.
अब तक दर्ज हुए हैं 3 लाख से ज्यादा मामले
बिहार पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले साल अक्टूबर तक बिहार मद्य निषेध और उत्पाद शुल्क कानून के तहत 3,48,170 मामले दर्ज किए गए और 4,01,855 गिरफ्तारियां की गईं. ऐसे मामलों में लगभग 20,000 जमानत याचिकाएं उच्च न्यायालय या जिला अदालतों में लंबित हैं.