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हर साल सर्दी की दस्तक पर दिल्ली समेत उत्तर भारत के शहरों को हवा में घुले जहर यानी प्रदूषण (Pollution) का सामना करना पड़ता है. इस साल भी पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में पराली (फसलों के अवशेष) जलाने से राजधानी के लोगों को प्रदूषित हवा में सांस लेना पड़ रहा है. कोरोना वायरस महामारी ने स्थिति और मुश्किल बना दी है, खास तौर पर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से ही सांस से जुड़ी बीमारियां हैं.
वायु प्रदूषण (Air Pollution) को किस तरह कम से कम रखा जा सके, इसके लिए सब विशेषज्ञों से लेकर सरकारें तक कई तरीके आजमा रही हैं. दिल्ली सरकार की ओर से चर्चित पूसा डिकम्पोजर इसी दिशा में प्रयास कर रही है. केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों की ओर से बनाई गई कमेटियां भी ऐसे ही उपायों पर विचार कर रही हैं. अदालतों की ओर से भी समय-समय पर इस दिशा में आदेश और गाइडलाइंस सामने आ रही हैं.
सरकारी स्तर पर जो हो रहा है सो हो रहा है, निजी स्तर पर भी कुछ उद्यमी वायु प्रदूषण को कम करने के लिए अभिनव तरीकों से सामने आ रहे हैं. ऐसे ही दो इंजीनियर हैं भवानी भटेजा और गौरव अरोड़ा. इनके स्टार्ट अप का जोर ऐसे प्राकृतिक उत्पाद बनाने पर है, जिनसे प्रदूषण को धूल चटाई जा सके. खास तौर घरों और आस-पास के माहौल में.
चारकोल की पोटलियां
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद से ही ये दोनों युवा इस दिशा में सोच रहे थे कि किस तरह हवा में घुले जहर से लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. इसके लिए उन्होंने ऐसे कम लागत वाले उत्पादों को बनाने के लिए रिसर्च शुरू की. उन्होंने पाया कि चारकोल यानी लकड़ी का जला कोयला प्रदूषण को कैसे कम कर सकता है और प्राकृतिक ढंग से प्रदूषित तत्वों को सोख सकता है. चारकोल पर अलग-अलग तरह की लिनेन और अन्य वैज्ञानिक पद्धतियों से लेयरिंग और पैडिंग की जाती है. जिससे कई तरह के फिल्टर बन जाएं.
भवानी और गौरव के मुताबिक इस तरह चारकोल से बने उत्पाद में बीड़ी सिगरेट के धुएं से लेकर हवा में मौजूद सल्फर, नाइट्रोजन, कार्बन, अमोनिया जैसे कई खतरनाक प्रदूषक धूल कण और बैक्टीरिया सोखे जा सकते हैं. छह इंच लंबे चौड़े आकार की ये पोटलियां किसी भी कमरे, बाथरूम, कार में लगाई जा सकती हैं. एक पोटली छह महीने से साल भर तक बिना रुके काम करती रहती है. इस उत्पाद को श्रीराम इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च लैब ने भी अपनी टेस्ट रिपोर्ट में पास ठहराया.
सूंघने वाले काढ़े जैसा इफेक्ट देने वाला लैम्प
इसके बाद भवानी और गौरव ने प्राकृतिक हर्बल तेल के एक फॉर्मूले पर काम शुरू किया. लौंग, दालचीनी, तुलसी, युकलिप्टस और अन्य कई तरह के मेडिसिनल प्रॉपर्टी वाले तेलों के मिश्रण से ये नया तेल तैयार किया गया. इसके लिए चंद बूंदें एक सिरामिक लैंप में लगे बल्ब की रोशनी के ऊपर बनी सिरामिक कटोरी में भरे पानी में डालते हैं. पानी की भाप के साथ तेल के कण हवा में फैलकर खुशबू के साथ अपना असर फैलाते हैं. भवानी और गौरव का दावा है कि ये ठीक वैसे ही काम करता है जैसे सर्दी, खांसी, जुकाम या सांस की दिक्कत के दौरान भाप लेने से होता है, यानि एक किस्म का सूंघने वाला काढ़ा है.
पर्दे का पॉल्यूशन बैरियर
भवानी भटेजा बताते हैं कि पराली के धुएं का प्रकोप बढ़ने पर हवा में जहर घुल जाता है. ऐसी स्थिति में उन्होंने और गौरव ने एक खास किस्म का पर्दा विकसित किया जो घरों के सामान्य पर्दों के पीछे लगकर ये पॉल्यूशन बैरियर का काम करता है. भटेजा का दावा है कि बिजली से प्रसंस्कृत ये पर्दे पीएम 2.5 और 5 इस कवच को भेद नहीं पाते यानी 95 फीसदी तक ऐसे हानिकारक तत्वों को रोक पाने में ये पर्दा समर्थ है.
गौरव का कहना है कि जिस तरह की परिस्थितियां हैं उनमें मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग का तो पालन हर एक को करना ही चाहिए. साथ ही मानव का सुरक्षा कवच अभिनव प्रयोगों से और मजबूत बनाने की ज़रूरत है.