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पराली प्रदूषण, बायो डी-कंपोजर तकनीक का जायजा लेंगे सीएम अरविंद केजरीवाल

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पराली से खेत में ही सीधे खाद बनाने की बायो डी-कंपोजर तकनीक विकसित की है. इस तकनीक की मदद से खेतों में पराली जलाने की समस्या का समाधान होने की उम्मीद है.

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान जाएंगे केजरीवाल
  • खाद बनाने की बायो डी-कंपोजर तकनीक विकसित
  • पराली से होने वाले प्रदूषण से मिलेगी निजात

पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए बनी बायो डी-कंपोजर तकनीक का जायजा लेने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 24 सितंबर को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा का दौरा करेंगे. 

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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पराली से खेत में ही सीधे खाद बनाने की बायो डी-कंपोजर तकनीक विकसित की है. इस तकनीक की मदद से खेतों में पराली जलाने की समस्या का समाधान होने की उम्मीद है. इससे दिल्ली में सर्दियों के दिनों में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के खेतों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं की वजह से सांस लेने में होने वाली समस्या का समाधान हो जाएगा.

यह तकनीक पूसा डी-कंपोजर कही जाती है. फसल वाले खेतों में छिड़काव किया जाता है और 8-10 दिनों में फसल के डंठल के विघटन को सुनिश्चित करने और जलाने की आवश्यकता को रोकने के लिए खेतों में छिड़काव किया जाता है. कैप्सूल की लागत केवल 20 रुपए प्रति एकड़ है और प्रभावी रूप से प्रति एकड़ 4-5 टन कच्चे भूसे का निस्तारण किया जा सकता है. 

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पंजाब और हरियाणा के कृषि क्षेत्रों में पिछले 4 सालों में एआरएआई द्वारा किए गए शोध में बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिससे पराली जलाने की जरूरतों को कम करने और साथ ही उर्वरक की खपत कम करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के नजरिए से इसका उपयोग करने से फायदा मिला है.

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