झारखंड में कार्यरत मदर टेरेसा की तरफ से स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी के आश्रय गृहों में कथित तौर पर बेचे गए बच्चों के मामलों की एसआईटी जांच की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बाल सरक्षंण अधिकार आयोग से कहा कि वह बच्चों की खरीद फरोख्त के आरोपों में सुप्रीम कोर्ट को न घसीटे.
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को फटकार लगाते हुए बाल अधिकार निकाय की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि मांगी गई राहत अस्पष्ट और सामान्य यानी सर्वव्यापी है. इस पर विचार नहीं किया जा सकता. इस मामले में कोर्ट ने एनसीपीसीआर के वकील से कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने एजेंडे में न घसीटिए. आपकी याचिका में कैसी राहत मांगी गई है? हम इस तरह के निर्देश कैसे दे सकते हैं? याचिका सरासर गलत तरीके से पेश की गई है.
एनसीपीसीआर के वकील ने दलील दी कि याचिका में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए झारखंड में ऐसे सभी संगठनों की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में समयबद्ध जांच के निर्देश देने की गुहार है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनसीपीसीआर को बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई करने का अधिकार है. वो उसके मुताबिक आगे बढ़े.
एनसीपीसीआर ने साल 2020 में दायर अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत गारंटीकृत मानव तस्करी पर रोक लगाने के मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग की थी. आयोग ने कहा था कि कई राज्यों में बाल गृहों में विसंगतियां पाई गई हैं. उनको आयोग ने अपनी याचिका में पक्षकार बनाया है. आयोग की याचिका में झारखंड में बाल अधिकारों के उल्लंघन के मामलों का हवाला दिया गया था. ये कहा गया था कि राज्य के अधिकारियों ने नाबालिग बच्चों की सुरक्षा के लिए कतई उदासीन दृष्टिकोण अपनाया है.
याचिका में कहा गया है एनसीपीसीआर की तरफ से की गई जांच के दौरान पीड़ितों ने चौंकाने वाले खुलासे किए गए. उनमें यह तथ्य भी शामिल था कि बाल गृहों में बच्चों को बेचा जा रहा था. इन तथ्यों को झारखंड सरकार के संज्ञान में जोरदार तरीके से लाया भी गया। लेकिन जांच को बाधित करने और पटरी से उतारने के लगातार प्रयास किए गए.