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दिल्ली: कोर्ट ने सेना के मेजर को बरी किया, लगा था दुष्कर्म का झूठा आरोप

दिल्ली की एक कोर्ट ने सेना के मेजर को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के खिलाफ गलत इरादों से झूठी एफआईआर दर्ज की गई थी. ये मामला साल 2018 में सामने आया था, जब नौकरानी ने गलत इल्जाम लगाया था.

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दिल्ली की एक अदालत ने सुनाया फैसला (प्रतीकात्मक तस्वीर)
दिल्ली की एक अदालत ने सुनाया फैसला (प्रतीकात्मक तस्वीर)

दिल्ली की एक अदालत ने सेना के मेजर को बलात्कार के आरोप में सम्मानपूर्वक बरी कर दिया. अदालत ने माना कि मेजर के खिलाफ गलत इरादों के साथ झूठा FIR दर्ज किया गया था. वही महिला के खिलाफ झूठी गवाही का मामला दर्ज करने का आदेश देते हुए, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पवन कुमार ने कहा कि अधिकारी को बलात्कार की झूठी कहानी के कारण मुकदमे के आघात से गुजरना पड़ा.

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जिससे उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लग गई. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के खिलाफ गलत इरादों से झूठी एफआईआर दर्ज की गई थी और वह सम्मानपूर्वक बरी होने का हकदार था.

मेजर की प्रतिष्ठा दांव पर लगी

मेजर पर उनकी नौकरानी ने आरोप लगाया था कि मेजर ने उसके साथ बलात्कार किया है. ये मामला साल 2018 में सामने आया था, जब नौकरानी ने ये कहते हुए इल्जाम लगाया था कि 12-13 जुलाई (2018) की मध्यरात्रि को उसके साथ दुष्कर्म किया गया. वही नौकरानी के पति को उसी रात फांसी पर लटका हुआ पाया गया था और एक जांच रिपोर्ट में इसे आत्महत्या का मामला माना गया था.

अदालत ने 3 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि केवल शिकायतकर्ता की कमजोर गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है. इसके अलावा अदालत ने यह स्वीकार किया कि सेना में सेवारत आरोपी को झूठा मुकदमा के कारण प्रतिष्ठा की अपूरणीय क्षति हुई.

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'पीड़ित' शब्द केवल शिकायतकर्ता तक सीमित नहीं

फैसले के दौरान कोर्ट ने कहा कि अदालतें केवल पीड़ितों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की संरक्षक नहीं हैं, बल्कि वे न्याय दिलाने के लिए मरहम लगाने वाले की भूमिका भी निभाती हैं. 'पीड़ित' शब्द केवल शिकायतकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे मामले भी हो सकते हैं जहां वास्तविक पीड़ित स्वयं आरोपी हो.

कोर्ट ने ये भी कहा कि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा बनाने में पूरा जीवन लग जाता है, लेकिन कुछ झूठे आरोपों के कारण उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है.

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