दिल्ली में पराली की वजह से होने वाले प्रदूषण में अचानक बड़ी गिरावट देखी गई है. वायु प्रदूषण पर नजर रखने वाली एजेंसी सफर की मानें तो सोमवार यानी 3 नवंबर को पराली की वजह से कुल प्रदूषण का सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया. ये आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है, क्योंकि दो दिन पहले ही यानी 1 नवंबर को पंजाब और हरियाणा में जलने वाली पराली के प्रदूषण की मात्रा दिल्ली-एनसीआर में होने वाले कुल प्रदूषण के 40 फीसदी तक पहुंच गई थी.
वैसे तो अगले ही दिन यानी 2 नवंबर रविवार को खेतों में लगी आग की वजह से प्रदूषण की मात्रा कम होकर 16 प्रतिशत तक रह गई थी, लेकिन हफ्ते के पहले कामकाजी दिन यानी सोमवार को ये 6 फीसदी तक और लुढ़क गई.
सफर नाम की संस्था इन दिनों रोजाना इस बात पर नजर रखे हुए है कि दिल्ली के कुल प्रदूषण का कितना हिस्सा पराली की आग से हो रहा है. दरअसल, पिछले दो दिनों से हवा का रुख ऐसा है कि वो पराली के धुएं को दिल्ली की ओर लाने की बजाए दूसरी दिशाओं में ले जा रहा है और इसी वजह से दिल्ली में पराली के प्रदूषण की मात्रा कम हो गई है. इसका एक असर ये भी हुआ है कि दिल्ली की हवा यूं तो "बेहद खराब" स्तर में बनी हुई है, लेकिन कारकों की मात्रा काफी गिर गई है.
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पूर्वानुमान ये बताते हैं कि अगले दो दिनों यानी 4 और 5 नवंबर को वायु की गुणवत्ता थोड़ी और खराब होगी और वो "बेहद खराब" स्तर में ही उच्च स्तर पर पहुंच जाएगी. लेकिन, ऐसा नहीं है कि दिल्ली में पराली की वजह से होने वाला प्रदूषण अगर कम हुआ है तो पंजाब, हरियाणा और यूपी में पराली जलाने के मामले भी कम हुए हैं.
दरअसल, पिछले 24 घंटे में पराली जलाने के तीन हजार से भी ज्यादा मामले इन तीन राज्यों में रिकॉर्ड किए गए. लेकिन पिछले दो दिनों में हवा की रफ्तार भी तेज रही और साथ ही हवा की दिशा भी ऐसी थी कि प्रदूषण वाली हवा दिल्ली में घुस नहीं पाई. लेकिन अगले तीन दिनों में हवा की रफ्तार कम होगी और ऐसे में पराली से होने वाले प्रदूषण की मात्रा भी बढ़ेगी.
इस बीच, दिल्ली सरकार ने प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए अपनी कोशिशें जारी रखी हैं. मंगलवार को जहां दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने दिल्ली के सदर बाजार का दौरा किया और साथ ही ग्रीन पटाखों की बिक्री के लिए दुकानदारों को समझाया.
इसके अलावा बुधवार को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल नरेला के पास हिरनकी गांव का दौरा करेंगे, जहां उन्होंने लगभग तीन हफ्ते पहले पराली से खाद बनाने की तकनीक की शुरुआत की थी. इस तकनीक का अविष्कार दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में किया गया है, जहां कुछ कैप्सूल की मदद से पराली को गलाकर खाद बना दिया जाता है.