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'मंदबुद्ध‍ि' है पर अनपढ़ नहीं...प‍िता ने बनवाया द‍िल्ली का वोटर, बेटी बनी आइकन, आप भी जानें ये नियम

यह कहानी ऐसे पिता की है जिन्होंने सिस्टम से भ‍िड़कर डाउन सिंड्रोम से ग्रसित अपनी बेटी का दिल्ली का वोटर आईडी कार्ड बनवाया. वही बेटी इलेक्शन कमीशन की स्पेशल आइकन बनी जिसके वीड‍ियो जागरुक करने में इस्तेमाल हुए. आप भी ऐसे स्पेशल बच्चे के पेरेंट्स हैं तो जानें क्या है नियम. पढ़ें- पूरी कहानी...

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Devanshi with her father Anil joshi
Devanshi with her father Anil joshi

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले एक बार फिर मेंटल या इंटेलेक्चुअल ड‍िसेब‍िल‍िटी से जूझ रहे वयस्कों के वोटर आईडी बनाने की मांग तेज हो गई है. दिल्ली राज्य संचालन समिति (SSCAE) के सदस्य डॉ सतेंद्र स‍िंह ने दो दिन पहले मुख्य चुनाव अध‍िकारी को इसके लिए पत्र भी ल‍िखा है. पत्र में मांग की है कि मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक विकलांगता वाले वयस्कों का मतदाता के रूप में नामांकन के लिए कैंप लगाए जाएं. डाउन स‍िंड्रोम से जूझ रही अपनी बेटी के लिए लड़कर वोटर आईडी बनवाने वाले पिता ने अपनी कहानी के जरिये बताया कि स्पेशल बच्चों के पेरेंट्स के लिए अपने बच्चों की परवर‍िश के साथ साथ उनके अधिकारों की लड़ाई कितनी मुश्किल होती है. 

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जब पहली बार पता चला कि बेटी... 

अन‍िल जोशी पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर रहे हैं. वो बताते हैं कि साल 1981 में मैं देश की नामी कंपनी टाटा ग्रुप में काम करता था. ये वो दौर था जब कंप्यूटर नया-नया आया था, तब कंप्यूटर इंजीनियर्स न के बराबर थे. जो थे भी उनको देश से बाहर जॉब करने के बहुत अवसर थे, लेकिन पार‍िवारिक हालातों के चलते मैं भारत में ही रहा. फिर शादी हुई और साल 1993 में मेरी बिट‍िया देवांशी का जन्म हुआ. जन्म के बाद ही डॉक्टर ने बताया कि ये नॉर्मल नहीं रहेगी. उनकी इस बात से हम भीतर से सहम गए. कई डॉक्टर मित्र थे, उन्होंने समझाया कि कैसे बेटी के माइल स्टोन डिले रहेंगे. इंसानों के बारे में ये पहली बार सुना था. मैंने डॉक्टर से पूछा तो बताया कि अपनी उम्र के हिसाब से वो लेट रेस्पांस करेगी.

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जॉब छोड़कर कंसल्टेंसी शुरू की 

अन‍िल जोशी बताते हैं कि डॉक्टर्स ने यह भी कहा था कि इस बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं है. हम पहचान तो सकते हैं लेकिन इसके बारे में ज्यादा नहीं बता सकते. ये सब सुनकर अब हमें भी समझ नहीं आ रहा था कि आगे कैसे क्या होगा. लोग कहते थे कि अब क्या होगा, ऐसे बच्चे की परवर‍िश करना टफ होता है. इन बच्चों का कोई अस्त‍ित्व नहीं होता. जब सब तरफ अंधकार नजर आ रहा था, तब हम पति-पत्नी ने इस बारे में पढ़ना शुरू किया. हमें बहुत जल्दी समझ आ गया कि ऐसे बच्चों को जल्दी से ही ट्रेनिंग शुरू हो जाए तो ये सीखना शुरू कर देते हैं. बेटी का डाउन सिंड्रोम धीरे-धीरे हमें पुख्ता हो रहा था. अन‍िल जोशी बताते हैं कि मुझे बेटी को समय देना मुश्क‍िल हो रहा था तो मैंने जॉब छोड़कर अपनी कंसल्टेंसी शुरू की. 
 
बेटी ने ऐसे पास की 10वीं की परीक्षा

वो बताते हैं कि हमें पता था कि ये समस्या दिमाग से रिलेटेड है, इसमें शरीर पर भी असर रहता है. डाउन स‍िंड्रोम के लोगों के हाथ पांव सही काम करते हैं लेक‍िन वो स्थ‍िति का आकलन देर से कर पाते हैं. हमने बेटी को टायलेट ट्रेनिंग वगैरह दी और फिर उसे रेगुलर स्कूल में ही डाला. उस दौर में ही अहसास हआ कि ऐसे लाखों करोड़ो बच्चे हैं जिनके अभ‍िभावकों को तो डाउन सिंड्रोम का मतलब भी पता नहीं था. 'डाउन' किसी साइकेट्र‍िस्ट का नाम है, उन्हीं के नाम पर इस सिंड्रोम का नाम पड़ा था. हम पढ़ने के साथ साथ ऐसे पेरेंट्स से भी मिल रहे थे जिनके पास ऐसे बच्चे हैं. फिर उस स्कूल के टीचर्स से भी मेलजोल बढ़ाया. हमने नेशनल ट्रस्ट से भी गाइडेंस ली जो ऐसे बच्चों के लिए काम करता है. 

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रेगुलर स्कूल में अच्छा रेसपांस दे रही थी

अन‍िल जोशी बताते हैं कि हम पति पत्नी ने बच्ची जब छोटी थी तब ही तय किया था ऐसे बच्चों के लिए काम करेंगे. हम साथ ही बच्ची के डेवलेपमेंट पर काम कर रहे थे. बच्ची रेगुलर स्कूल में अच्छा रेसपांस दे रही थी, वो बहुत लेट सीख रही थी, भले ही उसका ज्ञान आम बच्चों से कम था. हम उसके फ्रेंड्स और टीचर्स को घर बुलाते थे, उन्हें समझाते थे. तब नेशनल ट्रस्ट बोर्ड जो कानून बना रहा था, उस बोर्ड से भी मैं जुड़ा. उसी दौर में मेरी बेटी ने रेगुलर स्कूल से आठवीं की पढ़ाई पूरी कर ली. मुझे पूरा यकीन है कि अगर ये बच्चे भी रेगुलर स्कूल में पढ़ें तो ये और तेजी से सीखते हैं. लेकिन बोर्ड परीक्षा के लिए मुझे अहसास हुआ कि बेटी बड़ी हो गई है और उसकी पढ़ने की स्पीड काफी कम है. तब मैंने बच्चे को वहां से निकालकर नेशनल ओपन स्कूल से दो दो विषयों में पढ़ा-पढ़ाकर दसवीं की परीक्षा द‍िलाई, मेरी पत्नी ने उसे बहुत पढ़ाया और बेटी ने खुद ल‍िखकर परीक्षा दी. 

12वीं में थी, मैं दिल्ली में आ गया

अन‍िल जोशी बताते हैं कि दसवीं की परीक्षा ल‍िखने वाली ऐसी स्पेशल बच्चा थी जिसने नॉर्मल एज के बच्चों की तरह उसी उम्र में दसवीं की पढ़ाई पूरी कर ली थी. इसके बाद 12वीं में मल्टी नेशनल में काम का ऑफर मिला और मैं दिल्ली में आ गया. यहां आकर भी एनआईओएस से ही 12वीं की पढ़ाई कराई. बेटी ने सामान्य बच्चों की उम्र में ही 12वीं की परीक्षा खुद ल‍िखकर पास कर ली तो उसका भी कॉन्फीडेंस बढ़ गया.

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ऐसे बनवाया वोटर आईडी 

अन‍िल जोशी कहते हैं कि मैंने भी ठान लिया था कि बेटी जब 18 की हो जाएगी तो मैं वोटर आईडी बनवाऊंगा. साल 2011-12 की बात है जब मैंने स्थानीय इलेक्शन ऑफ‍िस जाकर एप्लीकेशन दी कि बच्ची मंदबुद्ध‍ि है, मुझे वोटर आईडी बनाना है तो वहां कर्मचारी ने कहा कि ये मंदबुद्ध‍ि है, ये कैसे ड‍िसाइड करेगी किसे वोट देना है. मैंने उनसे कहा कि आप मुझे ल‍िख‍ित में दीजिए कि कौन से कानून के तहत आप मना कर रहे हैं. फिर मैं दोबारा गया तो कहा कि आप 15 दिन बाद आओ. इसके बाद 15 दिन बाद फिर गया तो कहा कि रूल तो नहीं मिला, लेकिन इनसेन माइंड वालों को वोट‍िंग राइट नहीं दे सकते. मैंने कहा कि लेकिन किसी कोर्ट ने तो ऐसा नहीं कहा कि वो इनसेन माइंड है. मेरी बेटी तो 12वीं पास है, ल‍िख-पढ़ सकती है, ड्राइंग बना सकती है. एक अनपढ़ आदमी वोट दे सकता है तो मेरी पढ़ी ल‍िखी बेटी क्यों नहीं दे सकती.

बेटी बनी ऑल इंडिया आइकन 
अन‍िल जोशी कहते हैं कि मेरी वही बेटी देवांशी साल 2019 में इलेक्शन कमीशन की ऑल इंडिया आइकन बनी जिसके दो वीड‍ियो हर जगह प्ले किए जाते थे. जिसमें वो कह रही थी कि इफ आई कैन वोट, व्हाई यू कांट वोट. वोट बनने के बाद से वो स्टेट और जनरल दोनों चुनावों में वोट भी कर चुकी है.अन‍िल जोशी कहते हैं कि बीते सालों में कुछ जागरुकता बढ़ी है लेकिन अभी भी इन वयस्कों का नामांकन उस हद तक नहीं हो रहा जितना होना चाहिए. इनके अभ‍िभावकों में भी अपने बच्चों के मताध‍िकार के प्रति जागरुकता कम है. अन‍िल बताते हैं कि मेरी बेटी एक नामी कंपनी के रिटेल आउटलेट में काम करती हैं. वो एक रेगुलर फुलटाइम एंप्लाइ हैं और अन्य कर्मचारियों के बराबर योगदान देती है. यही नहीं देवांशी को भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी (2016) और रोल मॉडल (2020) के रूप में राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया है.

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क्या है न‍ियम 

अगर नियम की बात करें तो दिव्यांग अध‍िकारों पर लंबे समय से काम कर रहे डॉ सतेंद्र कुमार कहते हैं कि मनोसामाजिक विकलांगता (जैसे मानसिक बीमारी) और बौद्धिक विकलांगता वाले व्यक्तियों को समान मतदान अधिकार हैं. दुर्भाग्य से जागरूकता की कमी और गलत धारणाओं के कारण उन्हें अक्सर चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है. इस बात पर जोर देना महत्वपूर्ण है कि न तो भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) और न ही मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के पास किसी भी व्यक्ति को अयोग्य घोषित करने का अधिकार है. विकृत मस्तिष्क का प्रमाण-पत्र केवल उचित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सक्षम न्यायालय द्वारा जारी किया जा सकता है. जब तक किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा आधिकारिक रूप से विकृत मस्तिष्क वाला घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक उसे मतदाता के रूप में नामांकित होने और अपना मत देने का अधिकार बना रहता है. यह बौद्धिक या मनोसामाजिक विकलांगता वाले व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होता है. 

मेरा बेटा भी 20 साल से दे रहा वोट 
मुस्कान संस्था की डॉ शांति औलक कहती हैं कि मेरा 42 वर्षीय बेटा भी डाउन स‍िंड्रोम से ग्र‍सित है. लेकिन उसे राजन‍ीति का इतना पता है कि कौन सी पार्टी उसे पसंद है. वो करीब 20 सालों से वोट डाल रहा है. ऐसे स्पेशल बच्चों को अगर वोट‍िंग राइट्स के बारे में स‍िखाया जाए तो उन्हें समझ में आ सकता है.

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