तेलंगाना की सरिता (30 वर्षीय) राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में डीटीसी की पहली महिला बस ड्राइवर हैं. महज 18 साल की उम्र से ही सरिता ड्राविंग कर अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं. बड़ी उम्मीद और बेहतर भविष्य के सपने को लेकर सरिता ने दिल्ली आकर डीटीसी बस सेवा में बतौर कॉन्ट्रेक्ट ड्राइवर का पदभार संभाला था. लेकिन तीन साल में न तो उनको परमानेंट किया गया न ही तनख्वाह बढ़ाई गई.
सरिता दिल्ली में आनंद विहार से लेकर कापसहेड़ा तक लंबे और व्यस्ततम रूट पर बस चलाती हैं, उन्हें इस सफर में कई बार मनचलों से लेकर जेब कतरों तक का सामना करना पड़ता है. लेकिन वो निडर होकर अपनी ड्यूटी करती हैं और चाहती हैं कि दूसरी लड़कियां भी उनको देखकर ये काम करें.
सरिता और उनके जैसे अन्य डीटीसी बस ड्राइवर और कंडक्टर को साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता. बिना छुट्टी के काम पूरे महीने काम करने पर उन्हें सिर्फ 12 हज़ार रुपये मिलते हैं. बढ़ती महंगाई और सैलरी बढ़ने की टूटती उम्मीद के साथ अब सरिता ने नौकरी छोड़कर वापस तेलंगाना जाने का मन बना लिया है.
सरिता को उनके साहस और हौसले के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. उनका कहना है कि पुरस्कार से घर नहीं चलते उसके लिए पैसों की दरकार होती है. उन्होंने घर से इतनी दूर अपने बुजुर्ग माता-पिता से दूर दिल्ली आकर बस चलाने का फैसला ये सोचकर किया था कि देश की राजधानी में उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाएगी तो तनख्वाह से लेकर पेंशन तक सब कुछ मिलने लगेगा. लेकिन तीन साल दिन रात मेहनत करके भी जब कुछ नहीं हुआ तो उनके हौसला अब टूटने लगा है.
बता दें कि पांच बहनों में सबसे छोटी सरिता ने 18 साल की उम्र में ऑटो चलाना शुरू किया था. कम उम्र में ही सरिता ने परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था. बहनों की शादी से लेकर खुद का घर बनाने का काम सरिता ने ऑटो चलाकर पूरा किया. वो चाहती हैं कि दूसरी लड़कियां भी छोटे गावों से निकलकर शहर तक पहुंचे और खुद के पैरों पर खड़ी हों. लेकिन डीटीसी बस को चलाने में अब वो कतराने लगी हैं क्योंकि यहां न तो पक्की नौकरी है ना ही कमाई.