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पराली जलाने से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट) द्वारा तैयार बायो डिकम्पोजर का छिड़काव सफल होता नजर आ रहा है. 13 अक्टूबर को केजरीवाल सरकार ने पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के साथ दिल्ली में नरेला के हिरणकी गांव में 1 हेक्टेयर (ढाई एकड़) धान के खेत में 500 लीटर बायो डिकम्पोजर का पहला छिड़काव कराया था.
छिड़काव के ठीक 15 दिन बाद 'आजतक' की टीम ने पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के साथ खेत का जायजा लिया. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक 15 दिन में 90% पराली गलकर खाद में बदल चुकी है. दिल्ली में करीब 2000 एकड़ खेत में धान की खेती होती है, जिस वजह से काफी बड़ी मात्रा में पराली जमा होती थी. केजरीवाल सरकार द्वारा 2000 एकड़ खेत में मुफ्त खर्च पर बायो डिकम्पोजर का छिड़काव कराया था.
28 अक्टूबर को हिरणकी गांव पहुंची भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की प्रधान वैज्ञानिक लवलीन शर्मा ने 'आजतक' से खास बातचीत में कहा कि "ये प्रयोग शत प्रतिशत सफल हुआ है. सही समय पर बायो डिकम्पोजर का छिड़काव किया गया था. अब तक 90% पराली गल चुकी है, खेत मे जांच करने के बाद पाया गया कि पराली का एक निशान नहीं है. 15 दिन में ही पराली गल चुकी है जबकि 13 अक्टूबर को ये खेत पराली से भरा हुआ था. खेत के किसान चाहें तो अब भी बुआई शुरू कर सकते हैं. लेकिन इनके खेत में फिलहाल पानी है हालांकि पानी सूखने के बाद बिना समस्या के किसान आसानी से बुआई कर सकते हैं.
छिड़काव के बाद खेत पर हुए फायदे या नुकसान के सवाल पर किसान सुमित ने 'आजतक' से बातचीत में कहा कि बायो डिकम्पोजर के छिड़काव के बाद सारी पराली गल गई है तो नुकसान नजर नहीं आता है. अभी खेत में पानी ज्यादा है लेकिन बुआई का टाइम भी नहीं आया है क्योंकि दिन में हल्की गर्मी होती है. 10 नवंबर तक खेत का पानी सूख जाएगा और मौसम ठंडा होने के साथ ही बुआई भी कर सकते हैं.
खर्च के सवाल पर किसान सुमित ने कहा कि बायो डिकम्पोजर के छिड़काव के लिए एक रुपए भी खर्च नहीं हुए, सारा खर्चा सरकार ने उठाया है. हमें 15 दिन में दवाई का छिड़काव सफल नजर आ रहा है और हम काफी संतुष्ट हैं.
इसके अलावा पूसा इंस्टीट्यूट की वैज्ञानिक टीम ने 'आजतक' के साथ उस खेत का भी जायजा लिया जहां बायो डिकम्पोजर का छिड़काव प्रयोग के तौर पर नहीं किया गया था. किसान सुमित ने बताया कि जहां दवाई का छिड़काव नहीं हुआ उस खेत में 2 बार जुताई करनी पड़ती है और पानी भी ज्यादा खर्च होता है, जिससे समय और रुपए की ज्यादा बर्बादी होती है. जिस खेत में बायो डिकम्पोजर का छिड़काव नहीं होता था वहां 3000 रुपए का खर्च आता था लेकिन अब बायो डिकम्पोजर से पराली गल गई है इसलिए सिर्फ बुआई करनी होगी और खर्च भी 1500 रुपए तक आएगा.
लेकिन सवाल ये भी है कि जिस खेत में बायो डिकम्पोजर का छिड़काव हुआ क्या वहां खेती करना लाभदायक है? इस सवाल के जवाब में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की प्रधान वैज्ञानिक लवलीन शर्मा ने कहा कि "दरअसल बायो डिकम्पोजर जीवाणुओं का समूह होता है जो फसल के अवशेष पर ही काम करता है. इन दिनों किसान खेत के अंदर ही खाद बनाने की डिमांड करते हैं. बायो डिकम्पोजर द्वारा पराली को खाद में बदलने के साथ-साथ भूमि में कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ेगी. जब इस खेत मे गेहूं की बुआई होगी तब भी वैज्ञानिकों की टीम सैम्पल लेगी और बायो डिकम्पोजर के छिड़काव से पहले और बाद के अंतर की रिपोर्ट दे पाएंगे.
क्या सफल प्रयोग के बाद पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में सरकारों को बायो डिकम्पोजर के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए? जवाब में प्रधान वैज्ञानिक लवलीन शर्मा ने कहा, 'मुझे लगता है कि जब दिल्ली में किसानों को सफलता मिल रही है तो हमें किसानों के फोन आते हैं कि वो पराली जलाना नहीं चाहते हैं और बायो डिकम्पोजर का छिड़काव उनके खेत में करवाना चाहते हैं. किसान इस विकल्प का प्रयोग करना चाहते हैं, बाकी सरकारों को भी अपने राज्यों के किसानों को प्रेरित करना चाहिए.'
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क्या है पूसा इंस्टीट्यूट की ये तकनीक?
पराली को खाद में बदलने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 20 रुपए की कीमत वाली 4 कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है. प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह ने कहा कि 4 कैप्सूल से छिड़काव के लिए 25 लीटर घोल बनाया जा सकता है और 1 हेक्टेयर में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. सबसे पहले 5 लीटर पानी मे 100 ग्राम गुड़ उबालना है और ठंडा होने के बाद घोल में 50 ग्राम बेसन मिलाकर कैप्सूल घोलना है. इसके बाद घोल को 10 दिन तक एक अंधेरे कमरे में रखना होगा, जिसके बाद पराली पर छिड़काव के लिए पदार्थ तैयार हो जाता है.
इस गोल को जब पराली पर छिड़का जाता है तो 15 से 20 दिन के अंदर पराली गलनी शुरू हो जाती है और किसान अगली फसल की बुवाई आसानी से कर सकता है. आगे चलकर यह पराली पूरी तरह गलकर खाद में बदल जाती है और खेती में फायदा देती है. 1 हेक्टेयर खेत मे में छिड़काव के लिए 25 लीटर बायो डिकम्पोजर के साथ 475 लीटर पानी मिलाया जाता है.
अनुसंधान के वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी भी कटाई के बाद ही छिड़काव किया जा सकता है. इस कैप्सूल से हर तरह की फसल की पराली खाद में बदल जाती है और अगली फसल में कोई दिक्कत भी नहीं आती है. कैप्सूल बनाने वाले वैज्ञानिकों ने पर्याप्त कैप्सूल के स्टॉक का दावा किया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक पराली जलाने से मिट्टी के पौषक तत्व भी जल जाते हैं और इसका असर फसल पर होता है. युद्धवीर सिंह ने कहा कि ये कैप्सूल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बनाया गया है. ये कैप्सूल 5 जीवाणुओं से मिलाकर बनाया गया है जो खाद बनाने की रफ्तार को तेज करता है.