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India v/s Bharat: नाम में क्या रखा है, हमें तो कुछ और करना चाहिए, बोले- राइटर देवदत्त पटनायक

इंडिया से भारत नाम बदलने की चर्चा के बीच लेखक देवदत्त पटनायक ने भी इस पर अपने विचार साझा किए. उनका कहना है कि लोग बोलते हैं यह विदेशी नाम है और अंग्रेजों की देन है. ऐसा नहीं है. ये संस्कृत भाषा के शब्द सिंधु से लिया गया है. इसका अर्थ है नदी. यह नाम बदलना सब राजनीति है. चलिए जानते हैं और क्या-क्या कहा देवदत्त पटनायक ने...

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मशहूर लेखक देवदत्त पटनायक (फाइल फोटो)
मशहूर लेखक देवदत्त पटनायक (फाइल फोटो)

इंडिया से भारत नाम बदलने की चर्चा को लेकर जाने-माने लेखक देवदत्त पटनायक ने कहा कि भारतीय मिथोलॉजी विविधता में विश्वास रखती है. जबकि, मिडल ईस्ट की विचारधारा एकत्तव में विश्वास रखती है. वो लोग एक भगवान, एक जीवन, एक नाम और एक भाषा में विश्वास रखते हैं. जबकि, ये हम भारतीयों की पहचान नहीं है. हमें अपनी विविधता को बचाए रखना चाहिए और उसको आगे लेकर चलना चाहिए.

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इंडिया नाम के लेकर उन्होंने कहा कि लोग बोलते हैं यह विदेशी नाम है और अंग्रेजों की देन है. ऐसा नहीं है. ये संस्कृत भाषा के शब्द सिंधु से लिया गया है. इसका अर्थ है नदी. सिंधु नदी जो कई किलोमीटर से बहती हुई भारत में आती है. फिर पाकिस्तान में जाती है. सिंधु शब्द सिंध देश से लिया गया है. अरब के लोग 'स' नहीं बोल सकते थे. वो 'ह' बोलते थे. इस कारण सिंधु देश को हिंदू देश और सिंध को हिंद बोलने लगे.

जब ग्रीक के लोग भारत आए तो वो 'ह' को 'इ' बोलते थे. इस कारण हिंद को वे इंद और हिंदू को वो इंदू और इंडस बोलने लगे. इंदू का अर्थ होता है चांद और भगवान राम की दादी का नाम इंदू था. तो हो सकता है यह शब्द वहां से आया हो.

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ऋग्वेद में सबसे पहले प्रयोग किया गया भरत शब्द

भारत नाम को लेकर उन्होंने कहा कि ये शब्द भरत से आया है. इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग ऋग्वेद में किया गया था. फिर महाभारत में इसका प्रयोग किया गया है. ये शब्द ज्यादातर उत्तर भारत में प्रयोग किया गया. भारतवर्ष, भारतखंड या भारत. यह नाम ब्राह्मण को द्वारा दिया गया है. यह नाम पुराओं, शास्त्रों और आर्य देश से आया है. भरत आर्यों का राजा था. दूसरा भरत नाम का प्रयोग दक्षिण भारत में जैन लोगों के द्वारा किया गया. जो ऋषभदेव के पुत्र का नाम था. मगर, उन्हें भूला दिया गया. हमें इन सबके बारे में सोचना चाहिए और पढ़ना चाहिए.

भारत और इंडिया दोनों ही वैदिक शब्द

उन्होंने कहा कि भारत और इंडिया दोनों ही वैदिक शब्द हैं. भारत का प्रयोग सबसे पहले जैन लोगों ने किया. फिर ब्राह्मणों ने उसका प्रयोग किया और इंडिया शब्द भी सिंध से ही आया है. नाम को लेकर जो भी चर्चा हो रही है वो सब राजनीति है. साम, दाम, दंड, भेद और फूट डालो और राज करो वाली नीति है. हमारे देश में आलू और घोड़े यहां तक कि आर्य भी बाहर से ही आए हैं. हमने उनको तो स्वीकार किया. यहां तक कि मानव खुद अफ्रीका से आया है. 

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'हमें अपनी विविधता पर विश्वास रखना चाहिए'

देवदत्त पटनायक ने आगे कहा कि यह नाम बदलना सब राजनीति है. हमें भी जो नाम मिलता है वो हमारे बड़े-बुजुर्गों द्वारा दिया जाता है. हम लोग तभी अपना नाम तब बदलते हैं जब धर्म बदलते हैं या संन्यास लेते हैं. अगर, हम बड़े-बड़े देशों को भी देखें तो उनके भी एक से ज्यादा नाम हैं. समय के साथ लोग अपनी जगह बदलते गए और उस तरह देश के नाम बदलते गए. चीन के लोग चीन को, भूटान के लोग भूटान को अलग नाम से बोलते हैं. हम जो ये एक नाम के पीछे जा रहे हैं यह मिडल ईस्ट की नीति है. हमें अपनी विविधता पर विश्वास रखना चाहिए, उससे नफरत नहीं करनी चाहिए. 

'सनातन धर्म विविधता में रखता है विश्वास'
 
सनातन धर्म पर उन्होंने कहा कि यह एक जटिल मुद्दा है. इसके कई सारे मतलब हैं. अगर, हम फिलॉसफी से देखेंगे तो इसका अलग मतलब है.  हम राजनीति से देखें तो इसका अलग मतलब निकलता है. राजनीति में इसे जात से जोड़ दिया जाता है. फिर उसमें फिलॉसफी को जोड़ दिया जाता है. यह सब एक राजनीति का हिस्सा है. सनातन धर्म का मतलब आत्म का दर्शन करना है. सनातन धर्म विविधता में विश्वास रखता है. उनको इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि भारत बोला जा रहा है या इंडिया. नाम बदलना एक आसन काम है. ये आलसी लोगों का काम है. हमें कठिन काम करना चाहिए.

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