
“मैदान में अगर हम डट जाएं तो मुश्किल है के पीछे हट जाएं...” 41 दिन से दिल्ली के बार्डर्स पर डेरा जमाए किसानों की जुबान पर गाने की यही पंक्तियां हैं. घरों के आराम से दूर खुले में डटे किसानों की मुश्किलें पहले ही कम नहीं थीं कि अब कड़ाके की ठंड में बेमौसम बरसात ने उनके सब्र को और आजमाना शुरू कर दिया.
केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने समेत अपनी मांगों को लेकर दिल्ली की अलग अलग सीमाओं पर बोरिया-बिस्तर लेकर ये किसान जमे हुए हैं. अब तक किसानों और सरकार में आठ दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन नतीजा नहीं निकल सका है. अब 8 जनवरी को नौंवे दौर की वार्ता का इंतजार है.
दिल्ली-एनसीआर समेत पूरा उत्तर भारत इन दिनों शीतलहर की चपेट में हैं. सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों ने ठंड से तो बचने के लिए काफी इंतजाम कर रखे थे. लेकिन उन्हें बेमौसम हो रही इस बरसात का अंदेशा नहीं था. अभी एक-दो दिन और ऐसा ही मौसम बना रहने का अनुमान है. ऐसे में ठंड और बरसात से बचने के लिए किसान अधिकतर वक्त ट्रैक्टरों में अस्थाई बसेरों में ही बिता रहे हैं.
सिंघु बॉर्डर पर कहीं-कहीं वॉटरप्रूफ तंबुओं की व्यवस्था भी देखी जा सकती है. बारिश से बचने के लिए तिरपालों का भी प्रबंध किया गया है. उन किसानों के लिए ज्यादा परेशानी है जो घरों से महिलाओं और बच्चों को भी साथ लेकर पहुंचे हैं.
तेज बारिश में कपड़े के तंबू टपकने से किसानों के बिस्तर-रजाई-कंबल गीले होने से उन्हें जागकर ही वक्त बिताना पड़ा. बड़ी संख्या में लोगों के लिए हर दिन लंगर की व्यवस्था की जा रही है. बारिश से लकड़ियां गीली होने से खाना पकाने में भी दिक्कतें आ रही हैं.
हालांकि दिल्ली जल बोर्ड की ओर से जलभराव को कम करने के लिए टैंकर लगाए गए हैं, वहीं किसान खुद भी लगातार पानी को सुखाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं. साथ ही तंबुओं और तिरपाल की मरम्मत का काम भी किया जा रहा है.
जालंधर के रहने वाले सुखविंदर सिंह पिछले 20 दिन से सिंघु बॉर्डर पर मौजूद हैं. साथ में उनका 6 साल का बेटा सुखप्रीत भी डटा है. अभी तक सुखविंदर किसानों के साथ जिस टेंट में सो रहे थे, वो भी बरसात में टपकने लगा. ये सब दुश्वारियां झेलने के बावजूद सुखविंदर के चेहरे पर कोई शिकन नजर नहीं आती. उनका कहना है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, किसानों का हौसला नहीं तोड़ पाएंगे.
सुखविंदर कहते हैं, "हम किसान के बेटे हैं, हमारे बच्चे भी किसान हैं, हम पैदा ही मिट्टी और ऐसी बरसात में हुए हैं, हमें सर्दी और बरसात से कैसा डर. जब तक हमें हमारा हक नहीं मिलता, हम वापस घर नहीं जाएंगे."
सिंघु बॉर्डर पर किसानों के धरने में काफी महिलाओं को भी मोर्चा संभाले देखा जा सकता है. बरसात में इन महिलाओं के लिए परेशानी और भी ज्यादा है. फिरोजपुर के सुखदेव सिंह के साथ उनकी पत्नी और 17 साल का बेटा अनमोल भी पिछले 22 दिन से सिंघु बार्डर पर डेरा डाले हुए हैं. सुखदेव कहते हैं, “हम मजबूरी में अपना घरबार-खेत खलिहान छोड़ कर यहां खुले में बैठे हैं. अब रब भी हमारा इम्तिहान ले रहा है लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे.”
कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसान, दोनों अपने-अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है. किसानों का कहना है कि जब तक सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था बनी रहना सुनिश्चित करने के लिए कानून नहीं लाती, तब तक किसान आंदोलन जारी रखेंगे. किसानों ने चेतावनी दी है कि मांगें नहीं मानी गई तो वो गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को पेरिफेरल एक्सप्रेसवे पर ट्रैक्टर परेड करेंगे. साथ ही 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर राज्यों में राजभवनों का घेराव किया जाएगा. किसानों ने बुधवार 6 जनवरी को ट्रैक्टर परेड का रिहर्सल करने की बात भी कही है.