राजधानी दिल्ली की हवा जहरीली हो चुकी है. गाड़ियों से निकला धुआं सड़कों से उड़ी धूल और सरकार की नाकामयाबी ने दिल्ली को गैस चैंबर बना दिया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक कह चुके हैं कि राजधानी गैस चैंबर बन चुकी है. राजधानी की आबोहवा में यह घुला जहर सिर्फ दिल्ली का नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों से निकला वह काला धुआं है, जो खेतों में पड़ी पराली जलाने के बाद उठा. जमीनी हकीकत जानने के लिए आज तक की टीम ने हरियाणा के कुछ इलाकों का जायजा लिया.
दिल्ली से महज कुछ किलोमीटर दूर सोनीपत में खेतों में पराली जलाए जाने के निशान मिले. पिछले दो 3 दिनों से पढ़ रहे कोहरे के चलते फिलहाल पराली जलाए जाने की घटनाओं में लगभग रोक लग गई है. कोहरे से नम पड़ी खेतों की पराली जलने लायक नहीं है, लेकिन पिछले 10-15 दिनों में जो धुआं इन खेतों से उठा वह जहर बन कर वातावरण में फैला और दिल्ली तक जाकर बच्चों व बुजुर्गों को बीमार कर रहा है.
क्यों जलाई जाती है पराली
आज तक संवाददाता ने सोनीपत के किसानों से यह जानने की कोशिश की कि आखिर पराली क्यों जलाई जाती है और क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि यह धुआं उनके बच्चों के फेफड़े भी काले कर देगा? किसानों का कहना है कि पराली जलाने के अलावा उनके पास और कोई रास्ता नहीं है. क्योंकि ये आसान और समय बचाने का तरीका है. किसानों का यह भी कहना है की पराली को काटकर दूसरी जगह ले जाने में खर्च आता है, जिसे किसान नहीं कर सकता. कई किसान तो यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पराली जलाए जाने से हवा खराब हो रही है. बल्कि उनका कहना है कि पराली जलाए जाने की तुलना में राज्यों में गाड़ियों से होने वाला और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं ज्यादा प्रदूषण फैलाता है . कुछ किसानों ने आज तक से बातचीत में यह भी कहा कि अगर सरकार पराली जलाए जाने को लेकर गंभीर है तो उसे किसानों को सहूलियत देनी चाहिए और पराली को धुलाई करने में सब्सिडी देनी चाहिए.
करनाल का हाल
सोनीपत के बाद आज तक ने हरियाणा के करनाल इलाके का दौरा किया. धुंध की चपेट में लिपटा करनाल गवाही दे रहा है कि कैसे पराली के धुएं ने कोहरे के साथ मिलकर लोगों को बीमार करने की साजिश की है. पछले दिनों इस इलाके में जमकर पराली जलाई गई. एक सप्ताह से कोहरे की नमी के चलते खेतों से धुंआ उठना थम गया है, लेकिन जो धुंआ पहले से ही आसमान को खुली आंखों से ओझल कर रहा था, वो अब फेफड़ों को बीमार कर रहा है. आजतक ने करनाल के किसानों से बातचीत कर ये जानने की कोशिश की कि आखिर सालों पुरानी जहरीली परंपरा से उन्हें निजात कब मिलेगी? हरियाणा किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष कर्म सिंह का कहना है कि किसानों के पास इससे आसान और कोई साधन नहीं है. क्योंकि अगली फसल की बुआई के लिए उनका इंतजार बेहद कम हो जाता है. किसानों का कहना है कि समय बचाने के लिए फसल की कटाई के बाद खेतों में खड़ी पराली को जला देते हैं. करनाल के दूसरे किसानों का कहना है कि पराली को काटकर ले जाने के लिए जो खर्च आता है वो किसान वहन नहीं कर सकता. कुछ किसान तो पराली से ज्यादा वायु प्रदूषण के लिए गाड़ियों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं को दोष देते हैं.
हरियाणा किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष ने आज तक से बातचीत में कहा कि हरियाणा सरकार गौशालाएं खोल रही है. ऐसे में अगर वह मनरेगा के पैसों से किसानों की पराली को खरीदकर चारे के रूप में इस्तेमाल करें तो प्रदेश को पराली जलने से होने वाली समस्याओं से निजात मिल सकती है. किसानों का यह भी कहना है कि अगर सरकार पराली की ढुलाई में सब्सिडी दे या इसका खर्च वाहन करें तो किसान पराली नहीं जलाएंगे.
कुरुक्षेत्र का हाल
ऐसा नहीं है की पराली जलाये जाने को लेकर कानूनी कार्यवाही नहीं की गई है. सिर्फ कुरुक्षेत्र में प्रशासन ने डेढ़ सौ से ज्यादा किसानों का चालान किया है और 5 पराली जलाये जाने के मामले में मुकदमा भी दर्ज किया है. पुलिस उपाध्यक्ष गुरमेल सिंह ने बताया कि पराली जलाये जाने के मामले में हमने पांच FIR दर्ज किए हैं और साथ ही आप के जरिए हम किसानों से आग्रह करना चाहते हैं कि वह ऐसा ना करें. क्योंकि इससे न सिर्फ प्रदूषण फैलेगा, बल्कि वह भी बीमार होंगे.
खुद प्रशासन मानता है कि हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में पराली जलाई गई हैं. कुरुक्षेत्र की डिप्टी कमिश्नर सुमेधा कटारिया ने आज तक से बातचीत में कहा कि पिछले दिनों उनके इलाके में पराली जलने की काफी घटनाएं हुईं, जो फिलहाल कुछ दिनों से थम गई हैं. सुमेधा कटारिया ने कहा कि पिछले दिनों पराली जलने की घटनाएं सामने आईं. डेढ़ सौ से ज्यादा चालान काटे गए हैं. मुहिम चलाकर किसानों से कहा जा रहा है कि वह ऐसा ना करें. पराली का इस्तेमाल बतौर चारे के रूप में भी किया जा सकता है, जिसके तहत प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है. यह सच है कि से निकला धुआं हवा में जहर घोल रहा है. एक लंबी प्रक्रिया है जो निरंतर करने की जरूरत है.
पराली जलाना किसानों के लिए एक आसान जरिया है, लेकिन वह यह मानते हैं कि इस का धुआं उनके बच्चों को भी बीमार कर रहा है. लेकिन किसान सरकार की ओर नजर उठाकर देख रहे हैं कि वह इस मामले में सामने आए और उनकी मदद करें. लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक आम आदमी मजबूर है कि वह इस जहरीली हवा में सांस ले.