दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारत बायोटेक को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है. यह नोटिस उस जनहित याचिका पर जारी किया गया है जिसमें केंद्र सरकार के 13 मई के उस आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई है जिसमें कोवैक्सीन का ट्रायल 2 साल से 18 साल के बच्चों और किशोरों पर करने की मंजूरी दी गई है. केंद्र की तरफ से यह मंजूरी दूसरे और तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल के लिए दी गई है.
जनहित याचिका में सवाल उठाया गया है कि बिना व्यस्क हुए कोई भी किशोर या बच्चा ये कैसे तय कर सकता है कि उसके ऊपर क्लिनिकल ट्रायल किया जाए या नहीं. 2 साल का एक बच्चा जो बोल भी नहीं सकता कोई यह कैसे तय करेगा कि वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल कराने के लिए उसकी मंजूरी है. केंद्र सरकार की तरफ से भारत बायोटेक को 2 से 18 साल के 525 बच्चों और व्यस्कों पर क्लिनिकल ट्रायल चलाने की अनुमति दी जा चुकी है.
ट्रायल पर तुरंत रोक लगाई जाएः याचिका
ऐसे में याचिका में मांग की गई है कि केंद्र सरकार की इस अनुमति पर तुरंत रोक लगाकर इसे रद्द किया जाए. याचिका में खासतौर से कहा गया है कि इस तरह के क्लीनिकल ट्रायल के दौरान अगर किसी बच्चे या किशोर की जान जाती है तो फिर कंपनी पर आपराधिक मामला चलाया जाना चाहिए.
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याचिका में कहा गया है कि इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 1872 के तहत भी 18 साल से कम उम्र के किसी बच्चे या किशोर के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं किया जा सकता है. इससे यह भी साफ है कि इन 525 बच्चों को क्लिनिकल ट्रायल के लिए किसी तरह का कोई कांटेक्ट साइन नहीं किया गया होगा, जो मान्य होगा.
याचिका में कहा गया है कि क्लिनिकल ट्रायल के दौरान अगर कोई स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत होती है जिसमें उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है, या फिर इस ट्रायल की वजह से वह अपनी सामान्य जिंदगी दोबारा जीने से वंचित होते हैं तो ऐसी स्थिति में उनको या उनके मां-बाप को किस तरह का मुआवजा मिलेगा. इसको लेकर भी कोर्ट केंद्र सरकार और भारत बायोटेक को अपना जवाब दाखिल करने को कहे.
दरअसल, जिन 525 बच्चों पर वैक्सीन लगाकर क्लीनिकल ट्रायल किया जाना है, उनके बारे में कहा गया है कि वो स्वस्थ होंगे और वालंटियर होंगे. लेकिन याचिकाकर्ता का तर्क है कि 2 साल से 12-14 साल के बच्चे कैसे वालंटियर हो सकते है जिन्हें क्लिनिकल ट्रायल को लेकर कोई जानकारी ही नहीं है.