दिल्ली की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है. एक तरफ जहां मौसम के बदलने का अहसास हो रहा है, वहीं हरयाणा और पंजाब जैसे राज्यों में पराली जलाए जाने के बाद राजधानी में प्रदूषण बढ़ रहा है. गौरतलब है कि अधिकारियों ने आने वाले दिनों में हालात बिगड़ने की चेतावनी दी है.
ऐसी स्थिति में IIT दिल्ली से निकले कुछ छात्रों ने इस समस्या का एक पर्यावरण- फ्रेंडली समाधान खोज निकाला है. इससे ना केवल पराली जलाने को रोका जा सकेगा, बल्कि किसानों को राइस स्ट्रॉ की अच्छी कीमत मिलेगी और प्लास्टिक की जगह पेपर की चीजों का इस्तेमाल किया जा सकेगा.
दरअसल, पिछले साल IIT से पास आउट हुए अंकुर, कनिका और प्राचीर ने एक मशीन तैयार की है जिससे राइस स्ट्रॉ को पल्प में तब्दील किया जा सकता है. फिर इसी पल्प को प्लेट्स और अन्य इको-फ्रेंडली टेबलवैर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
स्टेप्स कुछ इस प्रकार हैं...
> पहले पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में एक मशीन के जरिये काटा जाता है.
> फिर घर की ही वाशिंग मशीन में इस पराली को धोया और ड्रैनेर की मदद से सुखाया जाता है. यह स्टेप पराली की गंदगी को निकालने के लिए होता है.
> इसके बाद इको-फ्रेंडली या ग्रीन केमिकल्स का इस्तेमाल करते हुए, इस पराली को डाइजेस्टर में डाला जाता है.
> डाइजेस्टर से निकली पराली बेहद मुलायम होती है, जिसे बीटर में कुछ एक घंटे के लिए बीट किया जाता है.
> जिसके बाद फाइनल पल्प तैयार हो जाता है. एक दो छोटे-मोटे और स्टेप्स के बाद इस पल्प को टेबलवैर कंपनीज के पास भेजा जाता है जो इससे bio-degradable चीजें बनाती हैं. ऐसी चीजों के लिए IIT स्टूडेंट्स ने स्लोगन बनाया है 'खाओ-फेंको'.
स्टूडेंट्स का कहना है कि इस मशीन के जरिए किसान करीब 5000 रुपए प्रति एकड़ बना पाएंगे. यह किसानों के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि उनकी शिकायत रही है कि राइस स्ट्रॉ का मार्किट नहीं है. 2 से 3 महीनो में स्टूडेंट्स का दावा है कि इस मशीन को मार्केट में उतारा जा सकेगा. एक ऐसी मशीन जिससे पराली जलाने के साथ-साथ प्लास्टिक के इस्तेमाल को भी रोका जा सकेगा.