पर्याप्त खाली जगह, चारों ओर खड़े ट्रैक्टर, लेकिन बेहद कम भीड़, यहां वहां कुछ किसान... ये नजारा है दिल्ली का बुराड़ी मैदान का जो करीब 20 एकड़ में फैला हुआ है. दिल्ली सरकार की ओर से यहां भोजन, पानी, रहने की व्यवस्था और चिकित्सा सुविधाओं सहित व्यापाक इंतजाम किया गया है लेकिन इस मैदान में प्रदर्शन के लिए बहुत कम किसान पहुंचे.
किसान संगठनों ने केंद्र सरकार के प्रस्ताव को साफ तौर पर खारिज कर दिया. आशंका ये थी कि अगर किसान बुराड़ी में डेरा डालते तो यह प्रदर्शन ‘जामिया’ और ‘शाहीनबाग’ के उस प्रदर्शन की तरह हो जाता जहां सिर्फ प्रदर्शनकारियों के धैर्य की परीक्षा होती.
देश की निगाह में आए प्रदर्शन
सिंधु बॉर्डर से बुराड़ी मैदान करीब 20 किलोमीटर दूर है लेकिन किसानों को लगता है कि यह देश के पावर सेंटर से काफी दूर है और यहां पर प्रदर्शन करने का मतलब है कि उनका विरोध देश की निगाह में नहीं आएगा.
बुराड़ी मैदान के एंट्री पॉइंट पर ही अमृतसर के किसानों ने एक कैंप लगाया है. वे अपने साथी किसानों को वहां न आने के लिए चेतावनी दे रहे हैं. किसान बलजीत सिंह ने कहा, 'हम यहां बंदी की तरह हैं, यह एक खुली जेल है, हम जंतर-मंतर जाना चाहते थे लेकिन पुलिस ने हमें यहां डंप कर दिया और अब हम यहां से नहीं जा सकते. वे कह रहे हैं कि आप घर वापस जा सकते हैं लेकिन जंतर-मंतर पर नहीं जा सकते. इसलिए हम हिलेंगे नहीं.'
अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी के साथ बुराड़ी मैदान में भारी पुलिस बल तैनात है. हालांकि, यहां से बाहर निकलने के रास्ते पर सबसे गहन जांच हो रही है. मैदान से बाहर जाने वाले किसी भी व्यक्ति से पूछताछ की जा रही है और उसका विस्तृत ब्योरा नोट किया जा रहा है. एग्जिट पॉइंट पर बैरिकेड्स लगाए गए हैं.
‘काला कानून वापस हो’
कुछ किसान विरोध में भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं जबकि कुछ किसानों ने पीएम नरेंद्र मोदी का पुतला जलाया. अमृतसर के किसान नेता जसकरन सिंह कहनवाल ने कहा, हमें यहां से जाने की इजाजत नहीं है. हमें मजनूं का टीला से उठाया गया था, पहले उन्होंने हमें हरिनगर स्टेडियम में रखा और 27 तारीख से हम यहां पर रखा गया है... वे चाहते हैं कि हम दूर-दराज स्थित बुराड़ी के मैदान में चले जाएं लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे. लोग हमें मदद करने के लिए सामने आ रहे हैं और हमारी मांग है कि सरकार ये काला कानून वापस ले.' वे जोर देकर कहते हैं कि जंतर-मंतर पर धरने का मतलब है कि सरकार की नाक के नीचे प्रदर्शन करना, शासक वर्ग के लिए आंख की किरकिरी के अलावा ये सीधे देश भर में सुर्खियों में आता है.
दिल्ली को जोड़ने वाले अहम बॉर्डर जाम
किसान ये समझते हैं कि राष्ट्रीय राजमार्ग, सिंधु बॉर्डर और बुराड़ी मैदान पर प्रदर्शन करने का भौगोलिक लाभ क्या मिल सकता है. राष्ट्रीय राजधानी के लिए ये बॉर्डर जीवन रेखा की तरह काम करती हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि किसानों ने दिल्ली को अन्य राज्यों से जोड़ने वाले पांच महत्वपूर्ण बॉर्डर को काटकर अपने आंदोलन को तेज करने की घोषणा की है. किसान नेताओं को लगता है कि दिल्ली में आपूर्ति बाधित करने से राजनीति को बैकफुट पर आना पड़ेगा और ये तरीका केंद्र सरकार को झुकने पर मजबूर करेगा.
किसान संगठनों की कोऑर्डिनेशन कमेटी के प्रमुख जगजीत सिंह दल्लेवाला ने कहा, 'देश भर के हमारे भाई इस लड़ाई में शामिल हो रहे हैं, हम टिकरी, गाजीपुर, नरेला और फरीदाबाद बॉर्डर पर बैठेंगे. अगर सरकार ने कृषि कानूनों को वापस नहीं लिया तो हम अपना विरोध और तेज कर देंगे, हमारे पास पर्याप्त धैर्य और साहस है.'
फल-सब्जी की आपूर्ति पर असर
आपूर्ति में कमी के संकेत आजादपुर मंडी के साथ ही दिखाई देने लगे हैं. दिल्ली के सबसे बड़े थोक फल और सब्जी बाजार में 50 फीसदी से कम आपूर्ति दर्ज की गई है. ईंधन और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं को लाने ले जाने वाले ट्रकों की आवाजाही भी बुरी तरह से बाधित है और अगर नाकेबंदी जारी रही तो बड़ा संकट आ सकता है. इन सब बातों को देखते हुए किसानों को लग रहा है कि अगर वे बुराड़ी में गए तो मोदी सरकार के बिछाए जाल में फंस जाएंगे और उनका विरोध गुमनाम हो जाएगा.