दिल्ली की साकेत कोर्ट ने तत्कालीन केवीआईसी के अध्यक्ष वी के सक्सेना द्वारा दायर मानहानि मामले में सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को पांच महीने की साधारण जेल की सजा सुनाई है. साथ ही मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने पाटकर पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उनकी उम्र, स्वास्थ्य और अवधि को देखते हुए ज्यादा सजा नहीं दी जा रही है और अदालत ने अपने सामने मौजूद सबूतों और इस तथ्य पर विचार करने के बाद पाटकर को सजा सुनाई है. ये मामला पिछले दो दशकों से ज्यादा वक्त से चला रहा रहा था. हालांकि, अदालत ने सजा को एक महीने के लिए निलंबित कर दिया ताकि पाटकर आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकें. वहीं, पटाकर ने अदालत के समक्ष जमानत याचिका भी दायर की है.
इस अपराध के लिए अधिकतम दो साल तक की साधारण कैद या जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान था. साकेत कोर्ट ने 24 मई को सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को मानहानि मामले में दोषी ठहराया था. उनके खिलाफ तत्कालीन केवीआईसी अध्यक्ष वीके सक्सेना (अब दिल्ली एलजी) की ओर से याचिका दायर की गई थी.
'नहीं चाहिए जुर्माने की रकम'
वहीं, अदालत के फैसल के बाद दिल्ली के मौजूदा उपराज्यपाल और इस मामले में याचिकाकर्ता वीके सक्सेना के वकील ने जज से कहा कि हर्जाने या जुर्माने की रकम हमको नहीं चहिए. आप वो रकम DLSA को देने का निर्देश दे दीजिए. कोर्ट ने कहा कि एक बार मुआवजे की रकम आपको मिल जाये तो उसको बाद आप उस पैसे से जो करना चहिए करिए.
क्या है मामला
मेधा पाटकर और दिल्ली एलजी वीके सक्सेना 2000 से कानूनी विवाद चल रहा है. तब मेधा पाटकर ने अपने और नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) के खिलाफ विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए वीके सक्सेना के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. उस समय अहमदाबाद स्थित एनजीओ 'काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज' के प्रमुख रहे सक्सेना ने 2001 में एक टीवी चैनल पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने और मानहानिकारक प्रेस बयान जारी करने के लिए पाटकर के खिलाफ दो मामले भी दर्ज किए थे.