स्टेट ऑफ पेट होमलेसनेस इंडेक्स ने बीते साल एक डेटा जारी किया. ये बताता है कि देश में लगभग 6.2 करोड़ स्ट्रे डॉग्स और 91 लाख आवारा बिल्लियां हैं. इनके अलावा 88 लाख स्ट्रीट डॉग्स ऐसे भी हैं, जो शेल्टर होम में रह रहे हैं. इस तरह से देखा जाए तो देश कुछ ऐसे मुल्कों में टॉप पर है, जहां आवारा पशुओं की संख्या सबसे ज्यादा है.
भारत में हर साल रेबीज से सबसे ज्यादा डेथ
ऐसे हर पशु के साथ रेबीज का खतरा भी बढ़ता है. यही हो भी रहा है. रेबीज से मौतों के मामले में देश सबसे ऊपर है. साल 2021 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कहा था, यहां सालाना 21 हजार से ज्यादा मौतें रेबीज से होती हैं. ये पूरी दुनिया का 36 प्रतिशत है. बीते कुछ सालों में आवारा कुत्तों का आतंक बढ़ने के साथ इस जानलेवा बीमारी का भी खतरा बढ़ता चला जा रहा है. इस बात का दूसरा एंगल भी है. लोगों का कुत्तों के लिए गुस्सा भी बढ़ रहा है.
किस देश में कितने स्ट्रे डॉग्स?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की मानें तो दुनिया में लगभग 200 मिलियन ऐसे कुत्ते हैं, जो बेघर हैं. स्टेट ऑफ पेट होमलेसनेस इंडेक्स के मुताबिक, लगभग सवा 6 करोड़ स्ट्रे डॉग्स के साथ भारत लिस्ट में दूसरे नंबर पर है. सबसे ऊपर चीन है, जहां लगभग साढ़े 7 करोड़ ऐसे कुत्ते हैं. तीसरा नंबर 4.8 करोड़ के साथ अमेरिका का है. मैक्सिको में 74 लाख आवारा कुत्ते हैं. वहीं ब्रिटेन में सिर्फ 11 हजार स्ट्रे डॉग्स दिखेंगे. वैसे कई जगहों पर आंकड़ों में अंतर है, लेकिन माना जा रहा है कि संख्या इससे ज्यादा ही होगी, कम नहीं.
नीदरलैंड अकेला देश, जहां स्ट्रे डॉग्स नहीं
एक तरफ हम आवारा कुत्तों के आतंक से परेशान हैं, वहीं नीदरलैंड एक ऐसा देश है, जहां आपको सड़क पर कोई भी डॉग नहीं दिखेगा. दुनिया के लगभग 200 मिलियन स्ट्रे डॉग्स वाले देशों में नीदरलैंड का नाम शामिल नहीं. क्या वजह है इसकी? क्या इस डच मुल्क ने सारे कुत्तों का सफाया कर दिया? नहीं. डच लोग पशु प्रेमी होते हैं. तो क्या नसबंदी करते हुए उन्होंने बहुत चुपके से कुत्तों की आबादी को खत्म कर दिया? जवाब है- नहीं. बल्कि एक समय पर पूरे नीदरलैंड की गलियों में कुत्ते ही कुत्ते नजर आने लगे थे. फिर जो हुआ, वो ऐसा कदम है, जिसे दुनिया के कई देश फॉलो करने की कोशिश कर रहे हैं.
हर घर में होते थे डॉग्स
साल 1846 में डच कलाकार जोसेफ स्टीवन्स ने एक पेंटिंग बनाई, जिसे नाम दिया- द डॉग हू कैरीज हिज मास्टर्स डिनर. इसके पीछे एक पूरा किस्सा था. वो ऐसा दौर था, जब नीदरलैंड के लगभग हर घर में एक कुत्ता होता. ठीक वैसे ही, जैसे किसी समय भारत के हर घर में गाय-बैल का जोड़ा हुआ करता था. अमीर घरों में कई नस्ल के कुत्ते रखे जाते. ये प्रतिष्ठा की निशानी थे. वहीं गरीब इसे अपने काम के लिए पालते. जैसे खेतों की रखवाली या छोटा-मोटा सामान यहां से वहां ले जाना. इसके लिए उनकी ट्रेनिंग भी होती.
रेबीज के डर से सड़कों पर छोड़े जाने लगे
19वीं सदी में कुत्तों की संख्या इतनी हो गई कि लोग डरने लगे. वो रेबीज का दौर था. हर कुछ सालों में लाखों मौतें इसी बीमारी से हो जातीं. रेबीज फैला और डच ही नहीं, आसपास व्यापार के लिए आने वाले विदेशियों का भी सफाया होने लगा. डरे हुए व्यापारी नीदरलैंड समेत उन देशों में कामकाज करने से बचने लगे. तब इस देश के पास एक ही रास्ता रहा कि किसी तरह गलियों में घूमते कुत्तों पर कंट्रोल किया जाए. घरों में रहते ये कुत्ते रेबीज के डर से सड़कों पर छोड़ दिए गए थे.
एनिमल प्रोटेक्शन संस्था बनी
इसी समय देश ने डॉग टैक्स शुरू किया ताकि पैसे खर्च कर रहे लोग अपने कुत्तों की सही देखभाल शुरू करें, लेकिन हुआ इसका उल्टा. पैसे देने से बचने के लिए कुत्तों के मालिक उन्हें सड़कों पर छोड़ने लगे. साल 1864 में हेग में पहली एनिमल प्रोटेक्शन एजेंसी बनी, जिसका मुख्य काम डॉग्स की सही देखरेख पक्का करना था. द डच सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ एनिमल्स के बनने के बाद से बहुत कुछ बदलने लगा. ये संस्था लोगों को एनिमल राइट्स पर बताने लगी. साथ ही कुत्तों या किसी भी पशु से गलत व्यवहार पर मोटा जुर्माना लगने लगा.
कैसे खत्म हुए नीदरलैंड से स्ट्रे डॉग्स?
इसके लिए वहां पर एक प्रोग्राम लॉन्च हुआ, जिसका नाम था- CNVR यानी कलेक्ट, न्यूटर, वैक्सिनेट एंड रिटर्न. आवारा कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी और वैक्सिनेशन होने लगा और फिर उन्हें छोड़ दिया जाता. वर्ल्ड एनिमल प्रोटेक्शन एजेंसी का भी मानना है कि आवारा पशुओं की आबादी पर काबू पाने का यही सबसे सही और कारगर तरीका है. सड़क पर आवारा कुत्ते तो फिर भी थे. तो इनके लिए भी वहां एक तरीका निकाला गया.
बेघर कुत्ते पालने को दिया बढ़ावा
म्युनिसिपेलिटी उन पशुप्रेमियों से भारी टैक्स लेने लगी जो दुकानों से कुत्ते खरीदते, जबकि स्ट्रे डॉग्स को गोद लेने पर टैक्स माफ हो जाता. ऐसे में लोग सड़कों से कुत्ते अडॉप्ट करने लगे और धीरे-धीरे मामला कंट्रोल में आ गया.
एनिमल राइट्स पर काम करने वाली राजनीतिक पार्टी भी
एक पुलिस फोर्स भी बनी, जो पूरे देश में न केवल कुत्तों, बल्कि हर तरह के पशु-पक्षियों के खिलाफ हिंसा पर नजर रखती है. ऐसा करने वालों के लिए सजा और जुर्माने दोनों का नियम है. इस देश के पशुप्रेम का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि यहां पर एक पॉलिटिकल पार्टी ऐसी है, जो बेघर पशुओं पर फोकस करती है. पार्टी फॉर द एनिमल्स नाम का ये संगठन मानता है कि कोई सोसायटी पशुओं के साथ जैसा व्यवहार करती है, वहीं वो अपने लोगों के साथ करती है. इसलिए जरूरी है कि लोगों में जानवरों के लिए प्यार और दया जागे.