राहुल गांधी के सुरक्षा ऑडिट को 'जासूसी मामला' बताकर भले ही कांग्रेस हाय-तौबा मचा रही हो, लेकिन असल सच्चाई यह है कि देश के सैकड़ों नेताओं और वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस इस तरह की जांच 1957 से करती आ रही है. यही नहीं, इस ओर भरे जाने वाले फॉर्म में 1999 में कई नए सवाल भी जोड़े गए, जबकि सोनिया गांधी से लेकर नरेंद मोदी और अमित शाह भी दिल्ली पुलिस के इस सुरक्षा ऑडिट फॉर्म को भर चुके हैं.
अंग्रेजी अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की खबर के मुताबिक, लुटियन जोन में रहने वाले कुल 526 हस्तियों के साथ इस प्रक्रिया को पूरी की जाती है. इस लिस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम 2014 में जोड़ा गया है, जबकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम इसी साल जोड़ा गया है. पुलिस इस लिस्ट के आधार पर 1998 से सोनिया गांधी और देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों समेत कैबिनेट मंत्रियों के बारे जानकारियां जुटा रही है. बताया जाता है कि पहले यह प्रक्रिया थोड़ी सरल ओर हल्की थी, लेकिन अब इसे विस्तार दे दिया गया है.
इस जांच के तहत बेसिक पर्सनल डिटेल्स के अलावा दिल्ली पुलिस विस्तृत प्रो-फॉर्मा मेंटेन करती है. जिसमें शारीरिक पहलुओं, वीवीआईपी की चाल-ढाल, वह दाढ़ी-मूंछ रखते हैं या नहीं, जन्मजात चिह्न, आंखों का रंग, चश्मा पहनते हैं या नहीं जैसी जानकारियां भी शामिल होती हैं. इतना ही नहीं, इसमें पहनावे से लेकर जूते पहनते हैं या नहीं जैसी छोटी से छोटी जानकारी भी शामिल होती है. बताया जाता है कि हत्या के बाद राजीव गांधी की पहचान उनके जूतों के आधार पर ही हो सकी थी.
कब और क्यों मचा बवाल
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस के स्पेशल ब्रांच अधिकारी व्यक्तिगत जानकारी जुटाने के लिए तीन मार्च को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के 12 तुगलक रोड स्थित आवास पर गए. कांग्रेस उपाध्यक्ष इस वक्त छुट्टी पर चल रहे हैं, जबकि पुलिस के आवास पहुंचने के बाद से ही कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाते हुए जासूसी करवाने का रंग दे दिया. यही नहीं, मामले में दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी को राज्यसभा की विशेषाधिकार समिति ने समन जारी किया है. बस्सी और गृह सचिव को राज्यसभा में 18 मार्च को पेश होना होगा, जेडीयू नेता केसी त्यागी ने राज्यसभा के नियम 267 के तहत इस पर नोटिस दिया है.
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पहली बार इस फॉर्म को लेकर डिटेल 1998 में दिया था, फिर साल 2004, 2009 और 2012 में भी उन्होंने सारी जानकारी दी थी. दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने भी इस प्रो-फॉर्मा को भरा था. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल साल 2001 में यह फॉर्म भर चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1999 में और पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल ने 1995 में यह प्रक्रिया पूरी की है.
बहरहाल, कांग्रेस पार्टी इस जांच को लेकर केंद्र सरकार पर राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं की जासूसी करने का आरोप लगा रही है. वह इस मसले पर सोमवार को संसद में सरकार को घेरने की भी कोशिश कर सकती है. पार्टी प्रवक्ता आनंद शर्मा ने तो यहां तक दावा किया है कि सरकार विपक्षी नेताओं के फोन टैपिंग भी करवा रही है.