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‘लुटेरा’ हुआ टमाटर, जेब पर लगा रहा सेंध

टमाटर तो लुटेरा हुआ जा रहा है. लुटेरे टमाटर से त्रस्‍त दिल्‍लीवासी अब टमाटर के आंसू रोने को मजबूर हो रहे हैं. आखिर टमाटर की इस लूट का सबब क्‍या है? क्‍यों लाल-लाल टमाटर लोगों को कंगाल कर रहा है?

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टमाटर तो लुटेरा हुआ जा रहा है. लुटेरे टमाटर से त्रस्‍त दिल्‍लीवासी अब टमाटर के आंसू रोने को मजबूर हो रहे हैं. लुटेरे टमाटर की दास्‍तां भी अजब है. आखिर टमाटर की इस लूट का सबब क्‍या है? क्‍यों लाल-लाल टमाटर लोगों को कंगाल कर रहा है?

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लाल-लाल टमाटर की आसमान छूती कीमतों ने ऐसा कहर ढाया कि लोगों के चेहरे एकदम लाल हो गये हैं. टमाटर ने हर तरफ हाय-तौबा मचा रखी है. जब सेब के भाव बाजारों में टमाटर बिकेगा तो महंगाई डायन जेब पर डाका डलेगी ही. दिल्ली से लेकर मुंबई तक लोगों को टमाटर का नाम सुनते ही पसीने छूट जाते हैं.

10, 20 रुपये किलो बिकने वाला टमाटर, आज पूरे 100 रुपये किलो बिक रहा है. पता नहीं आने वाले दिनों में टमाटर का भाव अभी कितना और बढ़ेगा. आलम ये है कि अब 100 रुपये किलो टमाटर खरीदने से पहले लोग सौ बार नहीं हजार बार सोच रहे हैं.

Tomatoटमाटर ऐसी टेंशन दे रहा है कि शाही पनीर से कड़ाही पनीर तक, मटन कोरमा से चिकन करी तक, एग करी से फिश करी तक, आलू गोभी से मटर पनीर तक, चटनी से सूप तक और दाल फ्राई से फ्राइड राइस तक डिश कोई भी हो टमाटर की कीमतों का ख्याल जेहन में आते ही लोग इनसे तौबा करने को मजबूर हैं.

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भला टमाटर के बिना इन पकवानों का मजा ही क्या, अब टमाटर इतना मंहगा है तो ये पकवान भी महंगे होते जाएंगे, पहले ही महंगाई की चक्की में पिस रहा आम आदमी, महंगे टमाटर का बोझ उठाने में पसीने-पसीने था. ऐसे में तमाम दूसरी सब्जियां टमाटर को कोस रही हैं, लोग टमाटर के चक्कर में उन्हें भी नहीं खरीद रहे.

क्या वेज, क्या नॉनवेज महंगे टमाटर की मार अब थाली पर देखने को मिल रही है, जिस टमाटर से लजीज पकवानों का जायका बढ़ जाता था, अब वही टमाटर पकवानों का खेल बिगाड़ने में लगा है. लोग टमाटर को याद करके ही इसके स्वाद का एहसास कर रहे हैं. खुद टमाटर भी अपने महंगे दाम से परेशान है, सिर्फ सब्जी की दुकानों में शो पीस की तरह जनाब दिखाई दे रहे हैं. खरीदार आते हैं दाम पूछते हैं, पहले चौंकते हैं और फिर ऊफ टमाटर बोलकर दूसरी सब्जियां खरीदकर लौट जाते हैं. कोई खरीदता भी है तो सौ से दो सौ ग्राम. बेचारा टमाटर भी एकदम लाचार दिखाई पड़ता है. देखते ही देखते क्या से क्या हो गया, महंगे टमाटर की महामार ये है कि लोग उन सब्जियों की रेसिपी खोज रहे हैं जिसमें टमाटर न पड़ता हो.

टमाटर पर लगे मंहगाई के ग्रहण से गृहणियां सबसे ज्यादा परेशान हैं, घर का बजट भी देखना है और सब्जी में स्वाद के लिए टमाटर भी डालना है. ऐसे में टमाटर ने गृहणियों की नींद उड़ा रखी है. वही दूसरी तरफ टमाटर के बेतहाशा बढ़ते दामों को देखकर ऐसा लगता है कि बैंकों को टमाटर लोन की नई स्कीम न शुरू करनी पड़े. फ्लैट की तरह टमाटर ईएमआई पर बिकने लगे, पता चला बैंक भी टमाटर के ग्राहकों को लुभाने के लिए अलग-अलग ब्याज पर लोन दे रहे हों. तब कहीं जाकर आम लोग टमाटर ईएमआई पर खरीदकर ही खा सकेंगे, वैसे भी आम आदमी के बस में 100 रूपये किलो टमाटर खरीदने की कूवत तो नहीं है, अगर टमाटर खाएंगे तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा.

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Tomatoलोग हैरान है कि एक तरफ सोने के दाम घट रहे तो टमाटर के दाम बढ़ रहे हैं. एक तरफ 100 रुपये किलो बिक रहा है टमाटर, तो दूसरी तरफ तमाम हरी सब्जियों के दाम में आग लगी हुई है, प्याज रुला रहा है, भिंडी के भाव आसमान छू रहे हैं, आलू खरीदना आम लोगों के लिए मुश्किल हो चुका है. कमरतोड़ महंगाई के बीच सब्जियों के दामों ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है.

देश की राजधानी दिल्ली में सब्जी के दाम में जैसे आग लगी हो, सब्जियां पर पड़ी महंगाई की मार ने हाहाकार मचा दिया है. आम आदमी की थाली में अब सब्जियां पूरी तरह गायब हैं. पिछले चंद दिनों में ही हर सब्जी के दाम दो-गुने से चार गुने बढ़ चुके है.

प्याज - 20 रुपये किलो
टमाटर - 100 रुपये किलो
भिंडी - 40 रुपये किलो
आलू - 25 रुपये किलो
करेला - 40 रुपये किलो
मटर - 100 रुपये किलो
लौकी - 15 रुपये किलो
तोरी - 20 रुपये किलो

आम आदमी खाए तो खाए क्या, कल तक जो लौकी 5 से 10 रुपये किलो बिक रही थी आज वो 15 रुपये किलो पहुंच गई है. यही हाल दूसरी सब्जियों के भी है, क्या तोरी, क्या फूल गोभी, क्या बैंगन और क्या आलू, सब्जियों के दामों में आए उछाल से हर आदमी परेशान है.

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Inflationमंहगी सब्जियां रसोई के बजट का बैंड बजा रही हैं, आम लोगों के सामने ये सवाल है कि खाए तो खाए क्या. जेब पर महंगाई डायन डाका डाल रही है, कमरतोड़ मंहगाई पहले ही आटा दाल चावल के रूप में लोगों की जान निकाल रहा था, ऐसे में रही-सही कसर सब्जियों ने पूरी कर दी है.

दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, जयपुर से जम्मू तक, वडोदरा से वाराणसी तक, मुंबई से भोपाल तक, सब्जी खरीदना लोगों के जेब पर भारी पड़ रहा है.

आप सोच रहे होंगे कि अचानक एक हफ्ते में ही सब्जियों के दाम तीन से चार गुना क्यों बढ़ गये. क्यों लाल कर रहा है टमाटर, क्यों सब्जियां खरीदना लोगों की जेब पर भारी पड़ रहा है, मानसूनी बारिश ने ही सब्जियों के दाम को सातवें आसमान पर पहुंचाया है.

तेल की धार से पड़ी महंगाई की मार
राजधानी में महंगाई ने चौतरफा हमला किया है. बात डीजल-पेट्रोल की हो या फिर रोजमर्रा काम आने वाली सब्जियों की. जुलाई से लगभग हर चीज के दाम बढ़े हैं.

डीजल के दामों में हुई बढोत्तरी ने एक बार फिर महंगाई को हवा दे दी है. खाने-पीने के रोजमर्रा के सामान पर इसका खासा असर पड़ा है. हालात ये हैं कि रसोईघरों में आम तौर पर बनने वाली दाल का भाव आसमान छूने लगा है. दाल की कीमत 100 रुपये किलो तक पहुंच गई है. सिर्फ दाल ही नहीं दाल को बनाने में इस्तेमाल होने वाले मसालों के भाव भी बढ़ गए है.

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महंगाई की आंच से अब दाल गलनी तो बंद ही हो गई है. आम तौर पर इस्तेमाल होने सब्जियां भी अब जेब जलाने लगी है. कल तक जो सब्जी 20-22 रुपये किलो थी अब बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई है. पहाड़गंज इलाके में बाजार में मिलने वाली सब्जियों के दाम डीजल मंहगे होने की वजह से अचानक बढ़ गए.

कमोबेश यही हाल पटेल नगर इलाके का भी है. आम लोग बजट में कटौती करके सब्जी खरीद रहे हैं. क्योंकि अब एक साथ थैला भरकर सब्जी ले जाना बेहद मुश्किल है. लेकिन आप थैला भरकर रुपये ले जाएं तो शायद आधा या उससे कुछ कम भरा थैला सब्‍जी जरूर खरीद सकते हैं.

महंगाई ने सीधा-सीधा आम आदमी पर असर डाला है. ज्यादातर निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार जो पूरे महीने का बजट देखकर खर्चा करते हैं. उनके सामने बजट के बिगड़ने की बड़ी चुनौती है. लिहाजा लोग सब्जी और दूसरी चीजें कम खरीद कर अपने बजट को बचाने की कोशिश में लगे हैं.

लुढ़कता रुपया बना आफत का सबब
अक्सर आपने सुना होगा कि रुपया बोलता है. रुपये को बोलते हुआ तो आपने सुना हो या ना सुना हो लेकिन रुपये की चुभन को अब आप जरूर महसूस कर रहे होंगे. रुपये ने आपकी जेब में सुराख कर दिया है. इसका अहसास आपको हर बार खरीदारी करते ही हो जाता होगा. दरअसल, महंगाई की जड़ में रुपया ही है वो रुपया जो 66 साल में 6 हजार फीसदी लुढ़क चुका है.

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पिछले हफ्ते दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों में करीब 2 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया गया था. इसका असर ये हुआ है कि आपके घर तक पहुंचने वाला हर सामान महंगा हो गया. अहसास तो आपको महीने की शुरुआत में राशन लेते वक्त हो ही गया होगा. सामान खरीदते वक्त महंगाई ने जेब का बोझ जरूर हल्का कर दिया होगा. रोजाना मंडी में सब्जी लेने तो जाते ही होंगे. टमाटर तो केवल मिसाल है, ऐसी कौन सी सब्जी है जिसने महंगाई का नया रिकॉर्ड ना बनाया हो. मौसम की मार इसकी बड़ी वजह है. लेकिन महंगाई की तस्वीर को समझने के लिए आपको तेल के खेल को समझना होगा जिसके बढ़ने के साथ ही हर चीज के दाम बढ़ जाते हैं. लेकिन तेल का खेल खेलने को मजबूर करता है रुपया.

- रुपया के कमजोर होने से ही महंगाई बेकाबू होती जा रही है.
- रुपया साठ पर पहुंच गया है और ठाट दिखाने की जगह रुपया आम लोगों को रोने को मजबूर कर रहा है.
- बुरी खबर ये है कि तेल कंपनियां अभी भी पेट्रोल को घाटे में बेच रही हैं. करीब 3 रुपये प्रति लीटर घार सह रही हैं कंपनियां.
- तकनीकी तौर पर तेल कंपनियों पर सरकारी नियंत्रण पेट्रोल की बिक्री पर नहीं है.
- यानी कभी भी फरमान आ सकता है कि पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए हैं और महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही चली जाएगी.

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आखिर तेल क्यों लगातार महंगा हो रहा है. आखिर क्यों महीना बीतने से पहले ही तेल के दाम बढ़ा दिए जाते हैं. जिसकी वजह से ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाता है और महंगा हो जाता है आम आदमी के घर तक पहुंचने वाला हर सामान. दरअसल, यहां खलनायक का किरदार निभा रहा है रुपया. कैसे रुपया तेल के दाम में आग लगा रहा है आपको बताते हैं.

-2008 में कच्चे तेल के दाम तकरीबन 2013 के बराबर ही थे लेकिन तब रुपया डॉलर के मुकाबले 44-45 के भाव पर था. आज जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले 60 के भाव पर पहुंच गया है तो तेल के दाम बेतहाशा बढ़ चुके हैं. क्योंकि हमारे देश में कुल जरूरत का 84 फीसदी तेल आयात किया जाता है. ऐसे में रुपये की कमजोरी अर्थव्यवस्था को बेहाल करने में लगी हुई है.

अचानक ही रुपया गिरावट के तमाम रिकॉर्ड तोडने को बेकरार नजर आ रहा है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि 66 साल पहले यानी 1947 में
एक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत भी एक रुपया ही थीः

- 1925 में तो 10 पैसे का वजूद एक डॉलर के बराबर था.
- 1917 में एक डॉलर का भाव साढ़े सात पैसे था.
- आजादी के वक्त से भी तुलना की जाए तो रुपया 1947 के मुकाबले 2013 तक 6 हजार फीसदी तक लुढ़क चुका है.

इन आंकड़ों से साफ जाहिर हो जाता है कि कैसे रुपया डॉलर के सामने रपटता चला गया और महंगाई आम आदमी के बजट को खराब करती चली गई. रुपये में मजबूती के पीछे वजह थी कि विदेश व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में था. यानी भारत में जितना सामना आयात किया जाता था उतना ही यहां से निर्यात भी होता था.

वक्त के साथ-साथ कारोबारी संतुलन खराब होता चला गया और चालू खाते का घाटा बढ़ता गया जिससे रुपये की हालत बद से बदतर होती चली जा रही है. सब्जी, फल, दूध राशन जैसी रोजमर्रा की चीजें ही रुपये के कमजोर होने से महंगी नहीं हो रही हैं बल्कि विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई करना भी महंगा हो गया है. जानकार तो डॉलर के मुकाबले रुपये को 65 के स्तर तक गिरने की आशंका जता रहे हैं. यानी महंगाई लोगों के सब्र का इम्तिहान लेने पर तुली हुई है और आम आदमी मुश्किल हालात में गुजर-बसर करने को मजबूर है.

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