दिल्ली के बीच से बहने वाली यमुना नदी के आसपास सड़क के किनारे बिकने वाली सब्जियां हो सकता है आपको भी ताजा और मंडी के मुकाबले सस्ती लगती हों. लेकिन इनकी ताजगी के पीछे के सच को जानने के बाद शायद आप इनकी तरफ देखना भी न चाहें. ये सभी सब्जियां यमुना किनारे उसी का पानी इस्तेमाल करके उगाई जाती हैं और आप तो जानते ही हैं कि यमुना का पानी किस हद तक गंदा हो चुका है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज के तीन एसोसिएट प्रोफेसरों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि नदी के पानी में मलीय पदार्थ की मात्रा तेजी से बढ़ी है. यह मात्रा 2009 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निष्कर्षों के बाद से तेजी से बढ़ी है. मानव और पशुओं के मल में उपलब्ध जीवाणु- मलीय कॉलिफोर्म (Fecal coliform) की मात्रा सीपीसीबी के निष्कर्षों के मुकाबले 30 प्रतिशत बढ़ चुकी है.
मलीय कॉलिफोर्म के इस खतरनाक स्तर को देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदी के पानी में मानव व जानवरों के मल से भरपूर हजारों लीटर दूषित सीवर का पानी बिना साफ किए रोजाना छोड़ा जा रहा है. यमुना किनारे पूर्वी व दक्षिण दिल्ली में उगाई जाने वाली सब्जियों में उच्च मात्रा में धातु सामग्री और मलीय पदार्थ होते हैं जिन्हें खाने से पेट की गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.
इस एक साल तक चलने वाले अध्ययन की शुरुआत पिछले साल जून में की गई थी और हर तीन महीने में नमूने इकट्ठे करके टेस्ट किए जाते हैं. दिसंबर में हुए टेस्ट के अनुसार निजामुद्दीन पुल के पास प्रति 100 मिली लीटर पानी में 9.3 करोड़ मलीय कॉलिफोर्म पाए गए. ओखला बैराज के पास सबसे कम मलीय सामग्री पाई गई और यह प्रति 100 मिली लीटर 5.2 करोड़ थी. इससे पहले सीपीसीबी की जांच में यह 57 लाख और 30 लाख प्रति 100 मिली लीटर पायी गई थी.
मलीय कॉलिफोर्म सीवर से आता है और सीवर को सीधे यमुना में छोड़ दिया जाता है. ज्यादातर लोगों को तो इस बात जानकारी भी नहीं है कि इससे उनकी सेहत पर कितना बुरा असर पड़ता है. यही नहीं यमुना के पानी में ज्यादातर जगहों पर ऑक्सीजन शून्य पायी गई, इसका मतलब यह हुआ कि इस पानी में कोई जीव जीवित नहीं रह सकता.
दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज के कैमिस्ट्री विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर विनोद कुमार के अनुसार जब यमुना पल्ला से दिल्ली में आती है तो पानी की गुणवत्ता बेहतर है. विनोद कुमार के साथ इस अध्ययन में कैमिस्ट्री और बॉटनी विभाग से डॉ. महावीर और डॉ. राजकुमारी सनमैया भी शामिल हैं. उन्होंने बताया कि यमुना के पानी में अगर कोई जीवित है तो वह जलकुंभी है, जिसे कुछ साल पहले प्रदूषण को अवशोषित करने के लिए लगाया गया था.
इसके अलावा यमुना का पानी अब सीवर के पानी से किसी भी सूरत में बेहतर नहीं है. यमुना के इसी पानी को सब्जियां व फल उगाने, मंडियों में सब्जियां धोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जहां से इन्हें शहर के अन्य हिस्सों में बेचने के लिए भेजा जाता है. यमुना के पानी में उगी सब्जियों का धड़ल्ले से व्यापार हो रहा है. उदाहरण के लिए ओखला मंडी में आने वाली सब्जियां और और फल ओखला बैराज के आसपास और वजीराबाद में यमुना नदी के पास उगाई जाने वाली सब्जियां आजादपुर मंडी में बिकती हैं.
मलीय सामग्री सीवर के पानी के साथ बढ़ती रहती है और दिल्ली के विभिन्न इलाकों से सीवर का पानी सीधे यमुना में छोड़ दिया जाता है. टॉक्सिक्स लिंक के संस्थापक रवि अग्रवाल कहते हैं कि मलीय सामग्री निजामुद्दीन पुल के बाद शिखर पर पहुंच जाते हैं. यहां से आगे उगने वाली सब्जियां ओखला मंडी से दक्षिण दिल्ली, फरीदाबाद और गुडगांव के बाजारों में बिकती हैं. डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि सभी सब्जियों को विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही पकाएं ताकि बैक्टीरिया आपके पेट के साथ खेल न पाएं. इस तरह का भोजन करना उल्टी, डायरिया, पेट में जलन, रक्त संक्रमण, डिहाइड्रेशन, मूत्र संक्रमण और किडनी रोगों का कारण बन सकता है.
डॉक्टरों के अनुसार इस तरह के मरीजों की संख्या हाल ही में तेजी से बढ़ी है. हरी पत्तेदार सब्जियों को बार-बार धोकर पकाना चाहिए और कच्ची सब्जियां खाने से बचना चाहिए. यहां तक कि पूर्वी दिल्ली में बिक रहे अमरूद और सलजम को भी यमुना के पानी में धोया जा रहा है. निजामुद्दीन और गीता कॉलोनी में लोग इन सब्जियों को खरीदते हुए मिल जाएंगे. हालांकि पकाकर खाने से मलीय सामग्री अच्छे से नष्ट हो जाती है लेकिन लोग इन्हें कच्चा भी खाते हैं.