गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल का गुरुवार को निधन हो गया. वे गुजरात में बीजेपी की सियासत के दिग्गज नेता और दो बार मुख्यमंत्री रहे. बीजेपी की सियासी जमीन तैयार करने में केशुभाई पटेल की खास भूमिका रही. 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद 1995 में हुए गुजरात विधान सभा चुनाव में बीजेपी केशुभाई पटेल के चेहरे को आगे कर मैदान में उतरी और कांग्रेस का सफाया कर दिया था. यहीं से गुजरात में पटेल राजनीति बीजेपी के करीब आई तो फिर वापस नहीं लौटी और बीजेपी का एकछत्र राज तब से लेकर अब तक कायम है.
केशुभाई पटेल ने अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत शून्य से की थी. वे इससे बड़े उतार-चढ़ाव देख चुके थे. जूनागढ़ के विस्वादर तालुके में 24 जुलाई 1928 को पैदा हुए केशुभाई पटेल महज 7वीं कक्षा तक पढ़ पाए थे. केशुभाई पटेल के तीन बेटे और दो बेटियां हैं. उनके दो बेटे भारत पटेल और महेश पटेल बीजेपी के सदस्य हैं. इसके अलावा एक बेटा प्रवीण पटेल, जो अमेरिका में बस गए थे, 9 सितंबर 2017 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी असामयिक मृत्यु हो गई थी.
केशुभाई पटेल ने जो कुछ भी राजनीति में सीखा सड़कों पर चप्पल घिसकर सीखा था. 1945 में आरएसएस से जुड़े और उसके प्रचारक बन गए. 1960 में जनसंघ की स्थापना के साथ उनकी राजनीतिक पारी की शुरुआत हुई. एक दौर में वे और शंकर सिंह वाघेला संघ और जनसंघ के संगठन को मजबूत बनाने के लिए गांव-गांव भटका करते थे. इसी के दम पर उन्होंने गुजरात की सियासत में अपनी जगह बनाई. 1977 में केशुभाई पटेल राजकोट से लोकसभा के लिए चुने गए थे. बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और बाबूभाई पटेल की जनता मोर्चा सरकार में 1978 से 1980 तक कृषि मंत्री रहे.
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गुजरात में कांग्रेस के दिग्गज नेता चिमनभाई पटेल की मौत के बाद पटेल बिरादरी का चेहरा बनकर उभरे केशुभाई पटेल. केशुभाई पटेल के नेतृत्व में 1995 के चुनाव में 182 में से 121 सीटों पर बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रही. कांग्रेस महज 45 के आंकड़े पर सिमट गई. यहां तक कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. सत्ता मिलते ही केशुभाई पटेल ने एक कुशल राजनेता की तरह पार्टी पर अपना एकछत्र राज कायम किया. उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में ऐसे किसी भी विधायक को जगह नहीं दी गई, जो शंकर सिंह वाघेला के करीबी माने जाते थे. वहीं, नरेंद्र मोदी इस समय बीजेपी के केंद्रीय संगठन में आ गए थे.
हालांकि, सियासत ने ऐसे करवट ली कि उन्हें महज 6 महीने के बाद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ गई, क्योंकि शंकर सिंह बघेला 47 विधायकों के साथ मध्य प्रदेश आ गए. ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें साधने की कवायद की, जिसके तहत केशुभाई पटेल की सत्ता से विदाई हुई और सुरेश मेहता मुख्यमंत्री बने. यह केशुभाई पटेल की बतौर मुख्यमंत्री पहली पारी का अवसान था लेकिन एक पारी अभी और बाकी थी. शंकर सिंह बघेला अपनी पार्टी बनाकर मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुत दिनों तक सत्ता पर काबिज नहीं रह सके.
साल 1998 के विधानसभा चुनाव हुए, केशुभाई पटेल के सामने पार्टी के भीतर कोई चुनौती नहीं रही. ऐसे में केशुभाई पटेल ने बीजेपी को सियासी जीत दिलाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. बीजेपी ने इस चुनाव में 182 में से 117 सीटों पर अपना परचम लहराया. वहीं कांग्रेस 60 सीटों पर सिमट गई. 4 मार्च 1998 को केशुभाई ने दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. हालांकि, इस बार उनके सामने तब संकट खड़ा हुआ तब दो उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली और कांग्रेस ने जीत दर्ज की.
ऐसे में केशुभाई पटेल की राजनीतिक क्षमता पर सवाल खड़े होने लगे थे. इसके बाद हाईकमान ने केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंप देने के लिए कहा. छह अक्टूबर को केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री की कुर्सी से विदा हुए और उनकी जगह नरेंद्र मोदी की गुजरात सीएम के रूप में ताजपोशी हुई. नरेंद्र मोदी ने सत्ता पर काबिज होने के बाद ऐसे मजबूत तरीके से अपने पैर जमाए कि उन्हें कोई उखाड़ नहीं सका.
केशुभाई पटेल गुजरात में साइडलाइन हो गए. जिसके चलते उन्होंने गुजरात परिवर्तन पार्टी का गठन कर 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाया, लेकिन कोई सियासी मुकाम हासिल नहीं कर सके. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को जबरदस्त जीत मिली. चुनाव नतीजे के बाद नरेंद्र मोदी ने केशुभाई पटेल से जाकर मुलाकात की. इसके बाद 2014 में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय बीजेपी में कर दिया और अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफ़ा दे दिया. केशुभाई पटेल ने गुजरात में बीजेपी के लिए जो नींव रखी थी आज भी पार्टी उसपर मजबूती से कायम है.