गुजरात के 6 नगर निगमों में हुए चुनाव में सूरत में तो कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई तो वहीं राजकोट में महज 4 सीटों पर सिमट कर रह गई. अहमदाबाद नगर निगम में जहां कांग्रेस 2015 के चुनाव में 42 सीटों पर जीती थी तो इस बार महज 25 सीटों पर ही सिमट कर रह गई है.
एक बार फिर यह सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस गुजरात में अपने अस्तित्व को बचा पाएगी. क्या वजह है कि एक वक्त पर विधानसभा में 148 सीट हासिल करने वाली कांग्रेस अब धीरे-धीरे गुजरात में नगर निगम के चुनाव भी हार रही है. दूसरी ओर आम आदमी पार्टी (AAP) और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम जैसी पार्टी धीरे-धीरे गुजरात में दस्तक दे रही है. सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष भी नहीं दे पा रही है.
सबसे ज्यादा पार्टी के नेता जिम्मेदार
गुजरात कांग्रेस की हार के लिए खुद गुजरात कांग्रेस के ही नेता जिम्मेदार हैं. कांग्रेस के नेता ही नगर निगम में पार्टी की हार के लिए कहीं ना कहीं जिम्मेदार हैं. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि जिस तरह से टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस में घमासान छिड़ा हुआ था, साथ ही कुछ नेता इस तरीके से बर्ताव कर रहे थे कि वह किसे और कभी भी टिकट दिला सकते हैं. इसी का नतीजा है कि आज कांग्रेस को इतनी बुरी हार का सामना करना पड़ा.
कांग्रेस के ही एक अन्य नेता का कहना है कि लोकसभा 2019 में भी गुजरात में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी जिसके लिए गुजरात के 36 सदस्यों वाली कोआर्डिनेशन टीम ही जिम्मेदार है, जिसमें राजीव सातव, परेश धनानी, अर्जुन मोढवाडिया, अमित चावड़ा, भरत सिंह सोलंकी और सिद्धार्थ पटेल जैसे नेता सालों से अपनी कुर्सी पर बैठे हुए हैं वह उन्हें ही टिकट देते हैं जो उनके चमचे हैं जबकि ग्राउंड पर काम करने वाले कांग्रेस के कार्यकर्ता को कभी टिकट नहीं मिलता.
यहां सभी नेता, कार्यकर्ता कोई नहीं
कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि यहां सभी नेता हैं और कार्यकर्ता कोई नहीं. एनएसयूआई के जो नए छात्र कांग्रेस में अपना भविष्य देख कर आते हैं तो उनको भी कांग्रेस के सीनियर नेताओं के जरिए हराने का प्रयास किया जाता है. यहां तक की गुटबाजी इतनी ज्यादा हो जाती है कि खुद कांग्रेस के नेता ही पार्टी के दूसरे नेताओं को हराने के लिए मैदान में उतर जाते हैं.
कांग्रेस में फिलहाल जो अध्यक्ष हैं अमित चावड़ा, वह कहीं ना कहीं फैसले लेने में ही असमर्थ है. कांग्रेस के नेता इस तरह के आरोप भी लगाते आए हैं. माना जाता है कि कांग्रेस के अध्यक्ष रहे भरत सोलंकी को हटाने के बाद उन्हीं के रिश्तेदार अमित चावड़ा को अध्यक्ष बनाया गया जो कि शैडो अध्यक्ष के तौर पर काम करते हैं. टिकट बंटवारे से लेकर पार्टी में किस को क्या पद देना है यह सारे फैसले भरत सिंह सोलंकी के जरिए लिए जाते हैं.
अपनों को ही टिकट
कांग्रेस में नेता अपने ही लोगों को या अपनी जाति के लोगों को ही टिकट देते हैं और जातिवादी राजनीति करते हैं जिसका नतीजा हार के तौर पर सामने आता है. इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है अहमदाबाद. अहमदाबाद नगर निगम के चुनाव में इस बार माना जा रहा है कि भरत सिंह सोलंकी के कहने पर 18 वार्ड में ठाकुर उम्मीदवारों को टिकट दिया गया जबकि उनका बहुमत सिर्फ दो वार्ड में ही है.
कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह अहमद पटेल की गैरमौजूदगी को भी माना जा रहा है. माना जा रहा है कि अहमद पटेल लघुमति इलाके में जो निर्दलीय उम्मीदवार खड़े होते थे या अन्य कोई पार्टी के उम्मीदवार खड़े होते थे तो उनके साथ बात कर कर सिर्फ कांग्रेस को ही वोट मिले, इस तरीके की रणनीति बनाते थे. लेकिन इस बार चुनाव में अहमद पटेल नहीं रहे तो कांग्रेस के नेता भी रणनीति बनाने में निष्फल रहे.
युवा नेताओं पर भरोसा नहीं
वहीं कांग्रेस के सीनियर नेताओं को अपने युवा नेताओं पर बिल्कुल भरोसा नहीं है. कहीं ना कहीं वे मानते हैं कि अगर युवाओं के हाथ में कमान सौंपी जाएगी तो सीनियर नेताओं की खुद की राजनीति खत्म हो जाएगी. यही वजह है कि हार्दिक पटेल जैसे युवा नेता उनके साथ होने के बावजूद हार्दिक ने जिन लोगों के लिए टिकट मांगा था उन्हें टिकट नहीं दिया गया और सूरत में आम आदमी पार्टी को पाटीदारों ने अपना समर्थन दे दिया.
हार्दिक पटेल और एनएसयूआई के दूसरे नेता जिनका पार्टी को सबसे ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए, उन्हीं को पार्टी लगातार साइडलाइन करती रहती है. यही वजह है कि कांग्रेसी अपनी अंदरूनी लड़ाई और एक-दूसरे की गुटबाजी को लेकर इतनी परेशान है कि चुनाव में जीत तो दूर लेकिन विपक्ष में भी बैठने के लायक नहीं रह गई.
गुजरात कांग्रेस के लिए सवाल यह भी खड़ा होता है कि 2022 में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में आम आदमी पार्टी सूरत में दूसरे नंबर की पार्टी उभर कर आई है और एआईएमआईएम ने भी गुजरात में अपना खाता खोल दिया है. अब अगर कांग्रेस को खुद का अस्तित्व बचाना है तो सीनियर नेताओं को युवाओं के साथ मिलकर राजनीति करनी होगी. वरना तय है कि 2017 में जितनी मजबूत कांग्रेस बनी थी उतनी ही 2022 में विफल साबित होगी.