लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की गुजरात इकाई के अध्यक्ष सीआर पाटिल को नवसारी सीट से जीत मिली और वह भी 7.77 लाख वोटों के भारी-भरकम अंतर से. सीआर पाटिल की जीत से ज्यादा चर्चे अंतर को लेकर हो रहे हैं. इसके पीछे वजह पाटिल का हर चुनाव में जीत का अंतर पिछली बार से अधिक होते जाना है. गुजरात बीजेपी अध्यक्ष ने पिछले तीन चुनाव तो 5.5 लाख वोट से भी अधिक के अंतर से जीते हैं. गुजरात से तमाम कद्दावर नेता निकले लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई लगातार तीन बार पांच लाख वोट से अधिक के अंतर से जीतकर संसद पहुंचा हो. महाराष्ट्र के जलगांव में जन्मे सीआर पाटिल की हर चुनाव में बड़ी जीत के पीछे कौन से फैक्टर हैं? इससे पहले सीआर पाटिल के सियासी सफर की चर्चा भी जरूरी है.
1989 से सियासत में हैं पाटिल
साल 1989 में जब नरेंद्र मोदी बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे, सीआर पाटिल तब सियासत में आए थे. पीएम मोदी के करीबियों में गिने जाने वाले सीआर पाटिल ने आईटीआई करने के बाद गुजरात पुलिस में कॉन्स्टेबल की नौकरी भी की. 1984 में गुजरात पुलिस की नौकरी छोडकर पाटिल ने अपना व्यवसाय शुरू किया. समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय रहे सीआर पाटिल को गुजरात में बीजेपी सरकार आने के बाद गुजरात एग्रो निगम का चेयरमैन भी बनाया गया था. सूरत और दक्षिण गुजरात में बीजेपी की मजबूती के पीछे पाटिल का बड़ा योगदान माना जाता है.
2009 में लड़ा था पहला चुनाव
सीआर पाटिल ने साल 2009 में अपने सियासी जीवन का पहला चुनाव लड़ा. वह गुजरात की नवसारी सीट से सांसद निर्वाचित हुए और जीत का अंतर 1 लाख 32 हजार रहा था. सीआर पाटिल 2014, 2019 और अब 2024 में भी इसी सीट से सांसद चुने गए और हर बार जीत का अंतर बढ़ता ही चला गया. पिछले तीन चुनाव में तो उनकी जीत का अंतर 5 लाख 50 हजार से भी अधिक का रहा है. सीआर पाटिल 2014 में 5 लाख 58 हजार, 2019 में 6 लाख 89 हजार वोट से जीत हासिल की थी. 2019 में उनकी जीत का अंतर देश में सबसे ज्यादा था. पाटिल इस बार 7.77 लाख वोट के अंतर से जीते हैं. नवसारी लोकसभा क्षेत्र में नवसारी के साथ ही सूरत जिले की विधानसभा सीटें भी आती हैं.
इस क्षेत्र में टेक्सटाइल इंडस्ट्री, चीनी मिल हैं. पीएम मोदी की अगुवाई वाली सरकार जब जीएसटी लागू करने की तैयारी में थी, सूरत के व्यापारियों में बहुत अधिक नाराजगी थी. तब व्यापारियों को मनाने की जिम्मेदारी सीआर पाटिल और पीयूष गोयल को दी गई थी. जीएसटी लागू होने के बाद सूरत में बीजेपी को कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ा तो उसके लिए भी पार्टी नेताओं ने पाटिल को श्रेय दिया था.
पाटिल की जीत की वजहें क्या
एक-दो चुनाव जीतने के बाद जहां नेताओं को एंटी इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ता है तो वहीं सीआर पाटिल के मामले में आंकड़े उलट कहानी बयां करते हैं. हर बार बढ़ते अंतर के पीछे कोई पाटिल की सुलभता को वजह बताता है तो कोई मददगार नेता वाली इमेज को. बीजेपी से जुड़े लोगों की मानें तो सीआर पाटिल ने 54 काम चिह्नित कर रखे हैं. उनके पास बुजुर्गों की अलग सूची है और उन बुजुर्गों को चिट्ठी भेजकर नियमित अंतराल पर हालचाल लिया जाता है. सीआर पाटिल के कार्यालय में करीब चार दर्जन लोगों का स्टाफ है जिसकी ड्यूटी बुजुर्गों को चिट्ठी लिखकर हाल-चाल लेने से लेकर लोगों की अलग-अलग समस्याओं के समाधान के लिए काम करना है. दावों के मुताबिक सीआर पाटिल के कार्यालय से हर महीने करीब 2.5 लाख चिट्ठियां संसदीय क्षेत्र के लोगों को लिखी और भेजी जाती हैं.
सीआर पाटिल पहले सांसद हैं जिनका संसदीय कार्यालय आईएसओ:2009 सर्टिफाइड है. पाटिल के कार्यालय को यह प्रमाणपत्र सरकारी सुविधाओं के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए साल 2015 में ही मिल गया था. वह आईएसओ: 9001 सर्टिफाइड कार्यालय वाले इकलौते सांसद भी हैं.
चुनावों में बीजेपी के एक वोटबैंक की खास चर्चा होती है. वह वोटबैंक है लाभार्थी वोटबैंक. इस वोटबैंक के कॉन्सेप्ट के पीछे भी सीआर पाटिल प्रमुख नाम हैं. सीआर पाटिल ने लाभार्थियों की सूची के लिए ऐप बनवा रखा है. इसमें इसकी डिटेल भी है कि किस लाभार्थी को किस सरकारी योजना का लाभ मिला है. लोगों के जन्मदिन से लेकर शादी की सालगिरह तक, लोगों को पाटिल की टीम की ओर से बधाई संदेश भी भेजे जाते हैं.
नवसारी लोकसभा क्षेत्र के दूर-दराज के गांवों के लोगों को शहर न आना पड़े, इसके लिए भी पाटिल ने खास इंतजाम किया है. हफ्ते में एक दिन यह मोबाइल ऑफिस वैन नवसारी की एक विधानसभा क्षेत्र में जाती है.