हरियाणा के लिए मंगलवार का दिन बदलाव की बड़ी बयार लेकर आया. सूबे में सरकार की तस्वीर बदल गई है तो साथ ही बदला है गठबंधनों का गणित भी. मनोहर लाल खट्टर की जगह सरकार की कमान अब नायब सिंह सैनी के हाथों में है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) का चार साल पुराना गठबंधन चुनावी साल में आकर टूट गया है. बीजेपी-जेजेपी गठबंधन टूटने की खबर ऐसे समय में आई है जब पिछले कुछ दिनों से एक के बाद साथ छोड़कर जा चुके पुराने और नए सहयोगियों की एनडीए में एंट्री की खबरें आ रही थीं.
बीजेपी जहां 'अबकी बार, 400 पार' के टारगेट तक पहुंचने के लिए नए-नए सहयोगियों को जोड़ रही है. वहीं, अब हरियाणा में दो गठबंधन सहयोगियों की राहें अलग हो रही हैं. इसका लोकसभा और इसी साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या प्रभाव पड़ेगा? किसे नफा होगा और किसे नुकसान? इन सबको लेकर भी चर्चा छिड़ गई है. कहा जा रहा है कि सत्तारूढ़ गठबंधन में हुई टूट का सीधा नुकसान विपक्षी कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है. अब सवाल यह भी है कि टूट सत्ताधारी गठबंधन में हुई तो फिर नुकसान विपक्ष को कैसे?
कांग्रेस को नुकसान कैसे?
सत्ताधारी गठबंधन में टूट विपक्ष के लिए झटका कैसे है? इसे समझने के लिए हरियाणा के सामाजिक समीकरणों के साथ ही सियासी मिजाज की भी चर्चा करनी होगी. हरियाणा में करीब 22 फीसदी जाट आबादी है. नए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी जिस ओबीसी वर्ग से आते हैं, उस वर्ग की आबादी करीब 30 से 32 फीसदी है. सैनी समाज की आबादी तीन फीसदी के आसपास होने के अनुमान हैं. हरियाणा की 90 में से करीब 40 विधानसभा सीटों और 10 में से करीब तीन से चार सीटों पर जाट वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
जाटलैंड में बीजेपी की कोशिश सैनी के जरिए ओबीसी पॉलिटिक्स की पिच मजबूत करने की है. इसके भी दो कारण बताए जा रहे हैं. हरियाणा की सत्ता के शीर्ष पर लंबे समय तक जाट चेहरे काबिज रहे हैं. चौटाला परिवार की इंडियन नेशनल लोक दल हो या भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सहारे कांग्रेस पार्टी, दोनों ही दलों की राजनीति का आधार जाट ही रहे हैं. पार्टी का फोकस गैर जाट पॉलिटिक्स के साथ ही कांग्रेस की ओर से जातिगत जनगणना की पिच पर घेरने की रणनीति की काट की भी है.
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बीजेपी ने 2014 के चुनाव में जीत के बाद जब गैर जाट मनोहर लाल खट्टर को सरकार की कमान सौंपी, तब इसे लेकर भी खूब हो-हल्ला भी हुआ. 2019 के चुनाव में बीजेपी बहुमत के आंकड़े से छह सीट पीछे रह गई तो इसके पीछे भी गैर जाट सीएम और जाट आरक्षण को लेकर जाट वोटर्स की नाराजगी एक वजह बताई गई. 2024 के चुनाव से पहले भी जाट नाराज बताए जा रहे हैं. किसान आंदोलन के समय पंजाब के बाद हरियाणा दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा था. किसान कुछ दिन पहले भी एमएसपी से संबंधित कानून की मांग को लेकर सड़क पर उतर आए थे. कांग्रेस को माहौल अपने मुफीद लग रहा था लेकिन अब तस्वीर बदल गई है.
जेजेपी के अलग लड़ने से बंटेंगे जाट वोट
बीजेपी ने दुष्यंत चौटाला की पार्टी से गठबंधन तोड़ कर यह संदेश दे दिया है कि वह हरियाणा में गैर जाट राजनीति की उसी लाइन पर आगे बढ़ेगी जो उसने 2014 में खींची थी. पिछले कुछ समय से हरियाणा कांग्रेस जाट पॉलिटिक्स की पिच पर खुद को मजबूत करने में जुटी थी. चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे और हिसार से बीजेपी सांसद बृजेंद्र चौधरी के कांग्रेस में जाने को भी इन सबसे जोड़कर ही देखा जा रहा था. आईएनएलडी की जाट वोट बैंक पर पकड़ भी दुष्यंत के अलग पार्टी बना लेने के बाद कमजोर पड़ी है.
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बीजेपी के साथ गठबंधन में रहते हुए जेजेपी को कहीं ना कहीं यह डर भी सता रहा था कि जाट वोट उससे छिटक न जाए. जेजेपी के नेता दुष्यंत के सामने भी यह चिंता जता रहे थे कि बीजेपी के साथ होने से पार्टी को जाट समाज की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है. चर्चा तो यह भी है कि गठबंधन तोड़ना कहीं दोनों दलों की सोची-समझी रणनीति तो नहीं? हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप डबास इस तरह के कयासों को खारिज करते हुए कहते हैं कि अगर ऐसा होता तो जेजेपी में टूट की नौबत नहीं आती. बीजेपी, जेजेपी के कई विधायकों के संपर्क में होने का दावा कर रही है. दुष्यंत ने दिल्ली में विधायक दल की बैठक बुलाई थी और जेजेपी के कई विधायक चंडीगढ़ में थे.
कांग्रेस को एकमुश्त जाट वोट की थी उम्मीद
आईएनएलडी की पकड़ कमजोर होने, जेजेपी के बीजेपी के साथ होने से कांग्रेस को जाट समाज से एकमुश्त समर्थन की उम्मीद थी. अब गठबंधन टूटने के बाद जेजेपी की रणनीति भी जाट वोटर्स के सामने खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने की होगी. जेजेपी अगर अपनी रणनीति में सफल रहती है और जाट वोट बैंक में सेंध लगा पाती है तो जाहिर है नुकसान कांग्रेस को को ही होगा. एंटी वोट बंटने का सीधा लाभ सत्ताधारी बीजेपी को मिल सकता है.