रोहतक में स्टेडियम और ट्रेनिंग सेंटर देखकर देश की खेल व्यवस्था का अंदाजा सहज ही लग जाता है. खेलों में राजनीति और राजनीति में खेल का घालमेल भी समझ में आता है और ये भी कि नौनिहाल तो अपने ही बूते पर खेलते हैं और मेडल जीतते हैं.
रोहतक स्टेडियम में सुविधाओं का अभाव
खेल की नीति बनाने वाले बड़े-बड़े स्पोर्ट्स एसोसिएशन के चेयरमैन, डायरेक्टर की पद पर नेता काबिज हो जाते हैं और AC में बैठकर फैसले लेते हैं, जबकि खिलाड़ी ऊमस में प्रैक्टिस करने को मजबूर हैं. खिलाड़ियों की अधिक ऊर्जा तो मौसम से लड़ने में ही खर्च हो जाती है, प्रतिद्वंद्वी तो बाद में सामने आता है. संघर्ष की राह में न तो सरकार और ना ही समाज साथ देती है. लेकिन जब तमगे मिलते हैं तब ढोल सरकार अपना बजवाती है और समाज लड्डू बांटता है. सरकारें जीतने पर ही लाखों करोड़ों खर्च कर वाहवाही लूटती है, लेकिन संघर्ष कर रहे खिलाड़ियों को बेहतर सुविधा देने के नाम पर आना-कानी होती है.
कुश्ती वालों से मैट्स मांगकर जिम्नास्टिक ट्रेनिंग
रोहतक के सर छोटूराम स्टेडियम के जिम्नास्टिक ट्रेनिंग उधार के मैट्स पर चल रही है. कुश्ती वालों से मैट्स उधार मांगकर उसपर प्रैक्टिस कर रहे हैं. जी जान से प्रैक्टिस में जुटी लड़कियां और उनकी कोच से सुविधाओं की बाबत पूछा गया तो उनके चेहरे ने ही सबकुछ कह दिया. उन्होंने एक सुर में कहा कि सुविधाएं हों तो हमारा 100 फीसदी एफर्ट और निखरेगा, स्टैमिना सही दिशा में जाएगा. अभी तो अभाव का निदान करने में ही ऊर्जा खर्च हो जाती है.
जूडो खिलाड़ी अभाव के मारे
जूडो के सेंटर में 50 खिलाड़ियों की क्षमता वाले हॉल में 75 से ज्यादा बच्चे प्रैक्टिस करने को मजबूर हैं. खिड़कियों के शीशे न जाने कब से टूटे पड़े हैं. सर्दी बरसात यों ही मुंह चिढ़ा कर निकल जाते हैं. न सरकार सुध लेती है ना ही एसोसिएशन, सबको केवल मेडल जीतने का इंतजार है. साक्षी की ट्रेनिंग के दौरान न तो सरकार को खिलाड़ियों की सुविधा की सुध थी न DTC को और न ही रेलवे को. ये तो जज्बे से ओलंपिक मेडल जीत लाई. पीवी सिंधू हो या साक्षी राखी तो पदक वाली देश की कलाई पर बांध दी. लेकिन कई खिलाड़ियों को अभी भी मदद का इंतजार है ताकि वो देश का नाम ऊंचा कर सके.