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श्रीनगर से 16 किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में बुर्जहोम नाम का गांव है जिसका पुरातात्विक महत्व है. इसके अवशेषों से 3000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के बीच इंसानों की रिहाइश से जुड़े कल्चरल सीक्वेंस के संकेत मिलते हैं. यह जगह कालखंड में कई बार बर्बरता का शिकार हुई. आज की तारीख में यह साइट अपनी उपेक्षा की कहानी खुद ही बयां करती है.
पूर्ववर्ती राज्य जम्मू और कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह ने 1904 में पुरातत्व विभाग की स्थापना की. बाद में इसे फ्रंटियर सर्किल बनाने के लिए 1958 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के साथ मिलाया गया. टीएन खजान्ची को इसका प्रमुख बनाया गया. एएसआई संभवतः 1989 तक प्रभावी था और बाद में श्रीनगर में जिस तरह की स्थिति उभरी, उसे देखते हुए इसे जम्मू में स्थानांतरित किया गया. 1989 में आतंकवाद के पैर जमाने के बाद, जम्मू-कश्मीर में खासकर घाटी में एएसआई का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ.
इंडिया टुडे ओपन सोर्स इंटेलीजेंस टीम (OSINT) ने बुर्जहोम पर बारीकी से नजर डाली और यह जानना चाहा कि कैसे इसे स्थानीय लोगों और प्रशासन की अनदेखी का शिकार होना पड़ा.
बुर्जहोम पुरातात्विक स्थल
इस साइट की खोज का श्रेय 1936 के येल-कैम्ब्रिज अभियान को दिया जाता है. 1960-71 तक एएसआई के फ्रंटियर सर्कल की ओर से विस्तृत खुदाई और जांच की गई. सिरेमिक बर्तन, गमले, हड्डियां और पत्थर से बने औजारों की खोज नवपाषाण (Neothilic) से अखंड (Monothilic) युग के आवासों का संकेत देती है. तब लोग कुत्तों और बकरियों को पालतू पशुओं के तौर पर साथ रखते थे और मृतकों को गड्ढों में दबाते थे, जिसके ऊपर चूना डाला जाता था. ये भूमिगत रिहाइश के सबूत सिंधु घाटी सभ्यता के साथ तुलनात्मक हैं. यहां पांच पत्थर के खंभे (Monoliths) खड़े थे, लेकिन सितंबर 2020 की ताजा गूगल अर्थ हाई रिजोल्यूशन तस्वीरों में अब एक ही खंभा दिखता है.
संभावित विश्व धरोहर साइट
इस साइट को 2014 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (वर्ल्ड हैरिटेज साइट) के रूप में मान्यता के लिए नामित किया गया था, और इस प्रस्ताव को मंजूरी का इंतजार है. साइट के यूनिवर्सल महत्व के औचित्य के साथ इसकी जानकारियां यूनेस्को की संभावित साइट्स की सूची में देखी जा सकती हैं. ये ज्ञात नहीं है कि यूनेस्को की टीम ने इस साइट का दौरा किया था या नहीं. सैटेलाइट तस्वीरें 10 सितंबर 2014 के बाद से साइट पर कई बड़े तम्बू और दो बड़े ट्रांसपोर्ट वाहनों को दिखाती हैं.
ये तंबू संभवतः यूनेस्को के कर्मचारियों के हो सकते थे जिन्हें निरीक्षण के लिए साइट पर रहने की अनुमति दी गई या उसी अवधि के दौरान उस क्षेत्र में किसी बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग के क्रू मेंबर्स थे. स्थिति कोई भी हो लेकिन किसी यूनिवर्सल महत्व के पुरातात्विक स्थल पर 11 दिनों से अधिक समय तंबू गाढ़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए.
क्रिकेट प्रशंसकों की ओर से दुर्व्यवहार
बुर्जहोम गांव के लोग पहले के वर्षों में जो छोटे क्रिकेट मैच खेला करते थे, वो बुर्जहोम टी-20 के नाम से बडी टी-20 चैंपियनशिप में बदल चुके हैं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों में 30 टीमों ने राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में इस कप के लिए प्रतिस्पर्धा की. जमीनी तस्वीरों में यहां खड़े अकेले खम्भे (मोनोलिथ) की बेकद्री देखी जा सकती है जहां सफेद पेंट से बड़ा ‘टी-20’ लिख दिया गया.
साइट की सैटेलाइट तस्वीरें इसे विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची में रखे जाने के बाद साफ रूप से दिखाती हैं कि कैसे क्रिकेट प्रशंसक इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल का नियमित रूप से दुरुपयोग और यहां तोड़फोड़ कर रहे हैं. यहां बाकायदा एक क्रिकेट पिच बनाई गई है और बाउंड्री मार्किंग खुदे गए क्षेत्रों से गुजरती है.
सैटेलाइट तस्वीरों में देखा जा सकता है कि विभिन्न दिनों में, साइट पर कम से कम दो से तीन बड़े आकार के टेंट लगे होते हैं और कई कारें और मोटरसाइकिलें खड़ी होती हैं. यहां 35 मीटर लम्बा और 5 मीटर चौड़े आकार का एक बड़ा सफेद कपड़ा देखा जा सकता है जिसका संभवत: पिच कवर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. एक तस्वीर में इसे फोल्डेड देखा जा सकता है. संभावित विश्व धरोहर स्थल की उपेक्षा करते हुए यहां तक वाहनों को लाने के लिए नई सड़क का निर्माण किया गया है.
अवैध उत्खनन और अतिक्रमण
साइट के चारों ओर अवैध उत्खनन के स्पष्ट संकेत हैं. 2014 के बाद ये और बढ़ गए. जबकि उसी वर्ष यह साइट यूनेस्को के साथ सूचीबद्ध होने के कारण सुर्खियों में आई थी.
इस साइट पर विशेष सुरक्षा प्रबंध तो दूर इसे सही तरीके से संरक्षित भी नहीं किया गया है. बीते दो दशक में ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में से किसी में भी यहां सुरक्षा बाड़ लगी नहीं दिखी. 29 अक्टूबर 2011 को साइट पर 20 बड़ी बसें देखी गईं, जो साइट पर करीब 600 लोगों को लाने के लिए पर्याप्त थीं.
ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के लिए अनिवार्य बफर जोन अभी तक नहीं बनाए गए हैं. वास्तव में, 2005 में पेड़ लगाकर परिसर के भीतर एक बाग बनाया गया जो पूरी तरह से विकसित हो चुका है. इसे ताजा सैटेलाइट तस्वीरों में देखा जा सकता है. अवैध रूप से पहले खोदे गए क्षेत्रों में हाल ही में तीन बड़े बंगलों के निर्माण से अतिक्रमण किया गया है. सैटेलाइट तस्वीरों से पहचाना जा सकता है कि इन अतिक्रमणों के लिए निर्माण 2018 में किया गया हो सकता है.
धरोहर वाली जगहों पर इस तरह की बर्बरता और अतिक्रमण से सरकार को सख्ती से निपटना चाहिए. इस स्थान के आसपास एक उचित सुरक्षा व्यवस्था की जानी चाहिए. साथ ही कंट्रोल्ड गाइडेड टूर यहां से राजस्व भी ला सकते हैं.
बॉलीवुड की ओर से शोषण
हेरिटेज साइट्स का फिल्मों के दृश्यों और गीतों की शूटिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. फिल्म "हैदर" का "बिस्मिल" गीत सीक्वेंस अनंतनाग शहर के पास मार्तंड सूर्य मंदिर में शूट किया गया था, जो एएसआई का संरक्षित मॉन्यूमेंट हैं.
एक महीने तक चली शूटिंग के दौरान की ग्राउंड तस्वीरें दिखाती हैं कि कैसे एक महीने तक साइट के परिसर पर बॉलीवुड क्रू और स्थानीय लोगों ने कब्जा कर लिया था. स्थानीय लोग शूटिंग देखने की आपाधापी में दीवारों पर अव्यवस्थित ढंग से बैठे रहते थे वो जगह जो पहले ही खंडहर में तब्दील हो चुकी है. उस दौरान की सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि साइट के बफर जोन में कई बड़े तम्बू लगाए गए थे.