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100 साल का हुआ रांची का मदरसा इस्लामिया और अंजुमन इस्लामिया

इन चार सालों के  दौरान अधिकतर समय वे नजरबंदी में भी रहे. खास बात यह है कि मदरसा इस्लामिया अबुल कलाम आजाद द्वारा बनाई गयी इकलौती ईमारत है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

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रांची का मदरसा इस्लामिया और अंजुमन इस्लामिया इस साल अपनी स्थापना का 100वीं सालगिरह मना रहा है. देश के पहले शिक्षा मंत्री और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक मौलाना अबुल कलाम आजाद का रांची से विशेष जुड़ाव था. आजाद ने रांची में साल 1916 से 1920 के बीच अपने निवास के दौरान इनकी स्थापना की थी. अंजुमन इस्लामिया की स्थापना 15 अगस्त 1917 में की गयी थी. जबकि 16 नवंबर 1917 से मदरसा इस्लामिया की प्रारंभिक कक्षाएं शुरू हुई.

इन चार सालों के  दौरान अधिकतर समय वे नजरबंदी में भी रहे. खास बात यह है कि मदरसा इस्लामिया अबुल कलाम आजाद द्वारा बनाई गयी इकलौती ईमारत है. इसके निर्माण में सभी धर्म के लोगों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया था. बताया जाता है कि मदरसा इस्लामिया की स्थापना के लिए आहूत सभा में मशहूर क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल भी शामिल हुए थे.

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तत्कालीन बंगाल सरकार ने निकाला था

मौलाना अबुल कलाम आजाद के रांची आने की भी अपनी अलग दास्तां है. मौलाना अबुल कलाम आजाद 1916 के पहले भी दो बार रांची आ चुके थे. लेकिन जब मौलाना ने अपने अखबारों अलहिलाल और अलबलाग में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता  और नागरिक अधिकारों पर लिखे अपने लेखों से ब्रिटिश सरकार के नाक में दम कर दिया . तब तत्कालीन बंगाल सरकार ने इसे हुकूमत के लिए खतरा मानते हुए डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट-1915 की धारा-3 (ए) के तहत उन्हें बंगाल से बाहर जाने का हुक्म सुना दिया. तब उन्होंने के दूसरे प्रांतो में जाने की कोशिश भी की, लेकिन कामयाब नहीं हुए. उसके बाद 05 अप्रैल 1916 को मौलाना आजाद रांची आ गये.

रोजाना पुलिस स्टेशन में देनी पड़ती थी हाजिरी

अपने रांची प्रवास के दौरान मौलाना आजाद को हर दिन पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी पड़ती थी. जानकारों के मुताबिक पहले उन्होंने डिप्टी पाड़ा में एक डाक बंगले को अपना ठिकाना बनाया था. वहां कुछ समय रहने के बाद उन्होंने अपना ठिकाना बदल लिया और वर्तमान में अंजुमन इस्लामिया की बिल्डिंग के पीछे बने एक मकान में रहने लगे.

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